मेघालय के शिलांग में जैसे ही दोपहर के 3.30 बजते है वहां के लोग अपना सारा काम छोड़कर इस परंपरा को निभाने के लिए एक ग्राउंड में सभी इक्कठा हो जाते है। जहां लोगों के लिए तीरंदाजी एक खेल होगा तो वही शिलांग के लोगों के लिए यह एक परंपरा है जो वो लोग वर्षों से निभाते आ रहे है।
कुछ लोगों के लिए तीरंदाजी किसी नंबर पर फोकस कर के उस पर तीर लगाना होगा लेकिन शिलांग के हर परिवार के लिए यह एक परंपरा है जिसे जो भी व्यक्ति इस खेल को जीतता तो उस परिवार के लिए गर्व का विषय होता। यह खेल तीरंदाजी जैसा ही है लेकिन इसके नियम ओलंपिक तीरंदाजी के नियम से भी अलग है। यहां अंतिम के अंक को प्राथमिकता मिलती है। अंतिम के अंक जिस प्रतिभागी के ज्यादा होंगे। वो प्रतिभागी इस खेल का विजेता घोषित होगा।
खेल के नियम
इस खेल के नियम सभी से अलग है। यह खेल दो चरणों में होता है। जहां प्रथम चरण में 50 तीरंदाज भाग लेते है और 30–30 तीर चलाते है तो वही दूसरे चरण में 20 तीर चलाते है। विजेता इस प्रकार घोषित होता है कि टारगेट पर लगे कुल तीरों की संख्या के अंतिम अंकों की गिनती पर अधिक नंबर आएं। उदाहरण के लिए अगर किसी तीरंदाज ने अपने लक्ष्य पर 5623 अंक मारे है तो अंतिम के 23 की ही गिनती होगी और इस प्रकार विजेता की घोषणा होगी।
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लोगो के लिए यह एक परंपरा
मेघालय में अधिकतर लोग जनजाति समुदाय के लोग है। जनजाति समुदाय के लोग वर्षों से चली आ रही परंपरा को उसी प्रकार निभाते है जिस तरीके से उनके पूर्वज निभाते थे। तीर गेम एक प्रकार की परंपरा हीं है उनके लिए। तीर गेम के लिए शिलांग की सड़के खाली हो जाती है। दुकान और अन्य बाजरे भी बंद हो जाते है। सभी लोग अपना काम छोड़कर तीरंदाजी की इस परंपरा के लिए पोलो ग्राउंड में इक्कठा हो जाते है।
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इस खेल के लिए लेना पड़ता है लाइसेंस
अगर किसी आयोजनकर्ता को यह गेम करवाना है तो उसे राज्य कर विभाग से आदेश लेना पड़ेगा। अगर राज्य कर विभाग से आदेश मिल जाता है तब ही इस खेल को आयोजित करने का लाइसेंस आयोजनकर्ता (organiser) मिलेगा। यह खेल मेघालय शासन द्वारा मान्य खेल है इसलिए कोई भी नागरिक इसका विरोध कभी नहीं करता। यह खेल मूलतः सोमवार से शनिवार तक दोपहर 3.30 बजे से प्रारंभ होता है। सभी को इस खेल को देखने के लिए बकायदा टिकट खरीदने के लिए काउंटर में खड़ा होना पड़ता है।
बन रहा है रोजगार का साधन
इस खेल से मेघालय के अधिकतर लोगों को रोजगार प्राप्त है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 2 लाख से अधिक लोगों को रोजगार प्राप्त है। यह खेल एक लॉटरी की तरह है और इस लॉटरी में सभी बोली लगाते है। खेल खेलने वालों को पैसा तो मिलता ही है बल्कि खेल ग्राउंड के आस पास तरह तरह के दुकान खोलने वालों को भी रोजगार मिलता है। खास बात यह है कि 1983 अधिनियम के तहत् यह खेल मेघालय गवर्नमेंट द्वारा पूर्णतः मान्य खेल है। इस परंपरागत खेल को खेलने व देखने के लिए लोग दूर दूर से आते है। मेघालय के खास जनजाति के लोग इस परंपरा को जीवित रखने के किया अपना पूरा प्रयास कर रहे है।







