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एडॉप्टिव मदर्स (दत्तक माताओं) के लिए ​सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला गोद लेने वाली माताओं के लिए मातृत्व अवकाश

एडॉप्टिव मदर्स (दत्तक माताओं) के लिए ​सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
नवजोत कौर सिद्धू
On: मार्च 18, 2026 2:02 अपराह्न
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​भारतीय न्यायपालिका ने हमेशा से कार्यस्थल पर महिलाओं की भागीदारी और उनके मातृत्व अधिकारों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मातृत्व का अर्थ केवल जैविक जन्म देना नहीं है बल्कि एक बच्चे का पालन-पोषण करना है। इसी आधार पर एडॉप्टिव मदर्स (गोद लेने वाली माताओं) को भी मातृत्व अवकाश का अधिकार मिलना अनिवार्य है।

​ फैसले की मुख्य पृष्ठभूमि

​भारत में मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के तहत कामकाजी महिलाओं को अवकाश मिलता है। 2017 के संशोधन के बाद जैविक माताओं को 26 सप्ताह की छुट्टी मिलती है जबकि गोद लेने वाली माताओं के लिए यह अवधि 12 सप्ताह तय की गई थी।

​हालांकि इसमें एक विवादास्पद शर्त थी कि बच्चा 3 महीने से कम उम्र का होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में इस ‘उम्र की सीमा’ को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने माना कि यदि कोई मां 3 महीने से बड़े बच्चे को गोद लेती है, तो उसे अवकाश न देना न केवल मां के साथ भेदभाव है बल्कि बच्चे के विकास के अधिकार का भी उल्लंघन है।

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​ कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

​माननीय उच्चतम न्यायालय ने इस मुद्दे पर विचार करते हुए कई महत्वपूर्ण बातें कहीं

  • माता-बच्चे का बंधन –  कोर्ट ने कहा कि एक बड़े बच्चे को नए परिवार में ढलने के लिए और भी अधिक समय और भावनात्मक जुड़ाव (Bonding) की आवश्यकता हो सकती है।
  • समानता का अधिकार –  अनुच्छेद 14 के तहत कानून को जैविक और गोद लेने वाली माताओं के बीच ऐसा भेदभाव नहीं करना चाहिए जो मातृत्व के उद्देश्य को ही खत्म कर दे।
  • बच्चे का कल्याण – छुट्टी का उद्देश्य केवल रिकवरी नहीं बल्कि बच्चे की देखभाल सुनिश्चित करना है।

​ मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम के तहत नियम

​वर्तमान कानूनी ढांचे के अनुसार गोद लेने वाली माताओं के लिए नियम निम्नलिखित हैं

श्रेणीअवकाश की अवधिशर्त
जैविक माता26 सप्ताहपहले दो बच्चों के लिए
गोद लेने वाली माता (Commissioning Mother)12 सप्ताहबच्चा कानूनी रूप से गोद लिया गया हो
सरोगेसी माता12 सप्ताहकानूनी प्रक्रिया पूरी होने पर

विशेष नोट –  सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब कई राज्यों और संस्थाओं में इस ‘उम्र की सीमा’ (3 महीने वाली शर्त) को शिथिल करने या हटाने की प्रक्रिया चल रही है ताकि किसी भी उम्र के बच्चे को गोद लेने पर मां को अवकाश मिल सके।

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​इस फैसले का व्यापक प्रभाव

​यह निर्णय समाज और कार्यप्रणाली पर गहरा प्रभाव डालता है

  • ​गोद लेने की प्रक्रिया को प्रोत्साहन – ​जब कामकाजी महिलाओं को पता होता है कि उन्हें बच्चे के साथ समय बिताने के लिए छुट्टी मिलेगी तो वे गोद लेने की प्रक्रिया (Adoption) के प्रति अधिक सकारात्मक होती हैं। यह उन हजारों अनाथ बच्चों के लिए उम्मीद की किरण है जो परिवार की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
  • लैंगिक समानता (Gender Equality) – यह फैसला यह संदेश देता है कि महिलाओं का करियर उनके मां बनने के फैसले के कारण बाधित नहीं होना चाहिए। यह कॉर्पोरेट जगत को अधिक ‘Inclusive’ बनने के लिए प्रेरित करता है।
  • ​मनोवैज्ञानिक लाभ – ​मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, गोद लिया गया बच्चा चाहे किसी भी उम्र का हो उसे नए वातावरण में सुरक्षा महसूस करने के लिए प्राथमिक देखभालकर्ता (Primary Caregiver) की निरंतर उपस्थिति की आवश्यकता होती है। 12 सप्ताह का यह समय उस नींव को मजबूत करता है।

​सुप्रीम कोर्ट का यह दृष्टिकोण कि “मातृत्व एक भावना है, केवल जैविक प्रक्रिया नहीं”, आधुनिक भारत की प्रगतिशील सोच को दर्शाता है। 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव का विस्तार बिना किसी उम्र की पाबंदी के करना एक मानवीय और संवैधानिक कदम है।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment

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