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Holika Dahan 2026 – होली पर भद्रा की छाया जानिए कब होगा होलिका दहन सही दिन और शुभ मुहूर्त  

Holika Dahan 2026 - होली पर भद्रा की छाया जानिए कब होगा होलिका दहन सही दिन और शुभ मुहूर्त  
नवजोत कौर सिद्धू
On: फ़रवरी 27, 2026 11:27 पूर्वाह्न
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होलिका दहन सनातन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक पर्व है, जो फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व कई मायनों में विशेष होने वाला है, क्योंकि इस दिन चंद्र ग्रहण और भद्रा जैसे खगोलीय व ज्योतिषीय संयोग बन रहे हैं।

होलिका दहन 2026 – तिथि और शुभ मुहूर्त

हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में होलिका दहन को लेकर कुछ विद्वानों और पंचांगों में दो अलग-अलग मत दिखाई दे रहे हैं। इसका मुख्य कारण पूर्णिमा तिथि का समय और उस दिन लगने वाला चंद्र ग्रहण है।

महत्वपूर्ण तिथियां और समय

  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ –  02 मार्च 2026, शाम 05:55 बजे से।
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त –  03 मार्च 2026, शाम 05:07 बजे तक।
  • होलिका दहन मुख्य तिथि – अधिकांश पंचांगों के अनुसार 03 मार्च 2026 (मंगलवार) को होलिका दहन किया जाएगा।
  • रंगवाली होली (धुलेंडी) –  04 मार्च 2026 (बुधवार)।

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होलिका दहन का खास मुहूर्त (03 मार्च 2026)

शास्त्रों के अनुसार, होलिका दहन प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद) में किया जाना चाहिए, बशर्ते उस समय भद्रा न हो।

शुभ मुहूर्त – शाम 06:22 PM से रात 08:50 PM तक।

कुल अवधि –  लगभग 2 घंटे 28 मिनट।

विशेष नोट –  03 मार्च 2026 को पूर्ण चंद्र ग्रहण भी लग रहा है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, भारत में ग्रहण और सूतक काल का प्रभाव होने के कारण कुछ क्षेत्रों में होलिका दहन 02 मार्च की मध्यरात्रि या 03 मार्च की सुबह (भद्रा समाप्त होने के बाद) करने की सलाह दी जा सकती है। स्थानीय परंपरा और पंचांग का अनुसरण करना उचित होगा।

होलिका दहन क्यों मनाया जाता है? (पौराणिक कथा)

होलिका दहन की कथा ‘बुराई पर अच्छाई की जीत’ का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह कहानी सतयुग के असुर राजा हिरण्यकशिपु और उसके पुत्र प्रह्लाद से जुड़ी है।

  • भक्त प्रह्लाद की भक्ति-हिरण्यकशिपु एक अत्यंत अहंकारी राजा था, जिसे ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था कि उसे न कोई मनुष्य मार सकता है, न पशु; न दिन में, न रात में; न अस्त्र से और न शस्त्र से। इस अहंकार में वह स्वयं को भगवान मानने लगा। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त निकला।
  • होलिका का वरदान और अंत-जब प्रह्लाद ने अपने पिता की पूजा करने से मना कर दिया, तो हिरण्यकशिपु ने उसे मारने के कई प्रयास किए। अंत में, उसने अपनी बहन होलिका की मदद ली। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जल सकती (उसके पास एक विशेष चादर/शाल थी)।

योजना के अनुसार, होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर जलती हुई चिता पर बैठ गई। लेकिन भगवान की कृपा से वह शाल प्रह्लाद के ऊपर आ गई और होलिका जलकर भस्म हो गई, जबकि प्रह्लाद सुरक्षित बाहर निकल आए।

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होलिका दहन का आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व

होलिका दहन केवल लकड़ी जलाने का रिवाज नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन के दोषों को अग्नि में समर्पित करने का प्रतीक है।

  • नकारात्मकता का नाश – होलिका दहन की अग्नि को पवित्र माना जाता है। लोग अपने मन के अहंकार, ईर्ष्या और क्रोध जैसी बुराइयों को इस अग्नि में जलाने का संकल्प लेते हैं।
  • ऋतु परिवर्तन का संकेत –  वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, यह समय वसंत ऋतु के आगमन और सर्दियों की विदाई का होता है। अग्नि के ताप से वातावरण में मौजूद हानिकारक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।
  • कृषि उत्सव – ग्रामीण क्षेत्रों में नई फसल (जैसे गेहूं और चने की बालियां) को इस अग्नि में भूनकर ‘होला’ बनाया जाता है और प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

होलिका दहन की पूजा विधि

होलिका दहन से पहले शाम को विधि-विधान से पूजा की जाती है ताकि घर में सुख-समृद्धि आए:

  • सामग्री –  कच्चा सूत, गोबर के उपले (बड़कुल्ले),  रोली, अक्षत (चावल), फूल, हल्दी की गांठ और एक लोटा जल।
  • पूजा –  होलिका के पास जाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • संकल्प –  जल और अक्षत लेकर अपनी मनोकामना करें।
  • परिक्रमा –  होलिका के चारों ओर कच्चे सूत को लपेटते हुए 3, 5 या 7 बार परिक्रमा करें।
  • अर्घ्य –  अंत में जल अर्पित करें और घर की शांति की प्रार्थना करें।

वर्ष 2026 में विशेष सावधानी (ग्रहण का प्रभाव)

  • चूंकि 2026 में होलिका दहन के समय चंद्र ग्रहण का साया है, इसलिए कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए
  • ग्रहण के सूतक काल से पहले या ग्रहण समाप्त होने के बाद ही धार्मिक अनुष्ठान करें।
  • सूतक काल में भोजन और पूजा से परहेज करने की परंपरा है, अतः मुहूर्त का कड़ाई से पालन करें।

होलिका दहन का सार

होलिका दहन का यह पर्व हमें सिखाता है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, ईश्वर की भक्ति और सत्य की राह पर चलने वाले की ही अंत में विजय होती है। होलिका दहन के पाश्चात्य  होलिका की राख को माथे पर लगाना पवित्र माना जाता है, जो हमें यह याद दिलाता है कि अंत में सब कुछ राख होना है, इसलिए प्रेम और भाईचारे के साथ रहना चाहिए।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment

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