भारतीय रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में IIT मद्रास (IIT Madras) द्वारा विकसित किया गया 155 mm रैमजेट पावर्ड आर्टिलरी शेल (Ramjet Powered Artillery Shell) एक क्रांतिकारी उपलब्धि है। यह न केवल भारतीय सेना की मारक क्षमता को बढ़ाएगा, बल्कि भविष्य के युद्धक्षेत्र में भारत को एक रणनीतिक बढ़त भी दिलाएगा।
यह किसके द्वारा बनाई गई है? (सहयोग और विकास)
यह परियोजना किसी एक संस्था का परिणाम नहीं है, बल्कि यह ‘मेक इन इंडिया’ के तहत एक त्रिकोणीय सहयोग का परिणाम है|
- IIT मद्रास – डिजाइन और अनुसंधान का मुख्य केंद्र।
- मुनिशन्स इंडिया लिमिटेड (Munitions India Limited – MIL) – यह रक्षा मंत्रालय के तहत सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है जो गोला-बारूद बनाने में विशेषज्ञ है।
- IIT मद्रास का एरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग – यहाँ के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने रैमजेट इंजन को एक छोटे गोले (Shell) के भीतर फिट करने की जटिल चुनौती को हल किया।
इसे कैसे बनाया गया है? (तकनीकी संरचना)
पारंपरिक आर्टिलरी गोले केवल गन पाउडर (Propellant) के विस्फोट से मिलने वाली गतिज ऊर्जा पर निर्भर करते हैं। लेकिन रैमजेट गोले का निर्माण अलग है|
- रैमजेट इंजन (Ramjet Engine) – इसमें कोई चलायमान पुर्जा (Moving parts) नहीं होता। यह गोले की तेज रफ्तार का उपयोग करके हवा को ‘स्कूप’ (खींचता) करता है, उसे संकुचित (Compress) करता है और फिर ईंधन जलाकर थ्रस्ट पैदा करता है।
- ठोस ईंधन (Solid Fuel) – गोले के भीतर एक विशेष प्रकार का ठोस ईंधन रखा जाता है जो हवा के साथ मिलकर जलता है।
- स्मार्ट नेविगेशन – इसमें iNautix जैसे स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम का उपयोग किया गया है, जो हवा में रहने के दौरान अपनी दिशा को सटीक बनाए रखता है।
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इसे लगाने से कैसे बढ़ गई क्षमता (विज्ञान और रेंज)
रैमजेट इंजन लगने से गोले की क्षमता में तीन मुख्य सुधार हुए हैं|
- रेंज में वृद्धि (Range Boost) – साधारण 155 mm गोला लगभग 24 से 30 किमी तक जाता है। ERFB (Extended Range Full Bore) गोले 40-45 किमी तक जाते हैं। IIT मद्रास का यह रैमजेट गोला 60 किमी से 90 किमी और भविष्य में 100 किमी+ तक की दूरी तय करने में सक्षम है। यह रेंज में लगभग 50% से 100% तक की वृद्धि है।
- निरंतर गति (Sustained Velocity) – साधारण गोले हवा के घर्षण (Drag) के कारण धीमे हो जाते हैं। रैमजेट इंजन हवा के घर्षण का उपयोग करके ही उसे ईंधन में बदल देता है जिससे गोला लक्ष्य तक पहुँचने तक अपनी उच्च गति बनाए रखता है।
- सटीकता (Precision) – लंबी दूरी पर निशाना चूकने का डर रहता है इसलिए इसमें ‘गाइडेड’ तकनीक का उपयोग किया गया है जिससे यह एक “मिसाइल” की तरह व्यवहार करता है।
भारतीय तोपखानों के लिए क्यों है यह विशेष
भारतीय सेना के लिए यह निम्नलिखित कारणों से एक ‘गेम चेंजर’ है|
- सीमा सुरक्षा (LoC और LAC) – हिमालयी क्षेत्रों में जहाँ दुश्मन ऊँचाई पर बैठा हो सकता है, 100 किमी की रेंज का मतलब है कि भारतीय तोपें अपनी सीमा के काफी अंदर सुरक्षित रहकर दुश्मन के कमांड सेंटरों को तबाह कर सकती हैं।
- मिसाइल का सस्ता विकल्प – एक मिसाइल की कीमत करोड़ों में होती है। रैमजेट गोले मिसाइल जैसी रेंज और सटीकता प्रदान करते हैं लेकिन इनकी लागत मिसाइल की तुलना में बहुत कम होती है।
- मौजूदा तोपों के साथ अनुकूलता – यह गोला भारत की मौजूदा K9-वज्र, धनुष और शारंग जैसी 155 mm तोपों से दागा जा सकता है। इसके लिए नई तोपें खरीदने की आवश्यकता नहीं है।
- रणनीतिक स्वायत्तता – अब तक भारत को लंबी दूरी के ‘एक्सकैलिबर’ जैसे गोलों के लिए अमेरिका या अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। अब भारत स्वयं इनका निर्यातक बन सकता है।
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मुख्य विशेषताएं एक नजर में
| विशेषता | साधारण गोला | रैमजेट गोला (IIT मद्रास) |
| अधिकतम रेंज | 30-40 किमी | 60 – 100 किमी |
| प्रौद्योगिकी | बैलिस्टिक प्रक्षेपवक्र | रैमजेट संचालित (Sustained Flight) |
| सटीकता | कम (दूरी के साथ घटती है) | उच्च (GPS/NavIC गाइडेड) |
| उपयोग | पारंपरिक गोलाबारी | सर्जिकल स्ट्राइक/लंबी दूरी के लक्ष्य |
भविष्य की संभावनाएं और निष्कर्ष
IIT मद्रास और MIL का लक्ष्य इस तकनीक को इतना परिष्कृत करना है कि भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बने जिसके पास ‘स्वदेशी रैमजेट गाइडेड आर्टिलरी’ का बड़ा जखीरा हो। यह तकनीक न केवल रक्षा क्षेत्र में भारत की धाक जमाएगी, बल्कि वैश्विक हथियार बाजार में भारत के ‘मुनिशन्स इंडिया लिमिटेड’ को एक बड़ी बढ़त दिलाएगी।







