नई दिल्ली। दुनिया के सबसे संवेदनशील जलमार्ग ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) में पिछले कई दिनों से जारी सांसें रोक देने वाले तनाव के बीच भारत के लिए राहत की पहली बड़ी खेप पहुँच गई है। पश्चिम एशिया के बारूदी समंदर में फंसे भारतीय ध्वज वाले एलपीजी (LPG) टैंकरों में से दो जहाज सुरक्षित रूप से ‘डेंजर ज़ोन’ से बाहर निकलने में सफल रहे हैं। लेकिन राजधानी दिल्ली के गलियारों में अभी जश्न का माहौल नहीं है, क्योंकि यह केवल एक आंशिक जीत है। समंदर के उस पार अब भी भारत की ऊर्जा सुरक्षा के 15 से अधिक पहरेदार (टैंकर) मौत और अनिश्चितता के साये में खड़े हैं।
हॉर्मुज- जहाँ से गुजरती है दुनिया की रगों का ‘खून’
यह समझना जरूरी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए क्यों इतना अहम है। यह वह संकरा रास्ता है जो ओमान की खाड़ी और फारस की खाड़ी को जोड़ता है। दुनिया के कुल कच्चे तेल का लगभग 20 प्रतिशत और वैश्विक एलएनजी आपूर्ति का एक तिहाई हिस्सा इसी 21 मील चौड़े रास्ते से होकर गुजरता है। भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए 80 प्रतिशत से अधिक आयात पर निर्भर है, यह रास्ता किसी ‘लाइफलाइन’ से कम नहीं है।
ताजा समुद्री ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, जो दो टैंकर बाहर निकले हैं, उन्होंने अपनी जीपीएस लोकेशन अब सुरक्षित जोन में दिखाई है। इन जहाजों के कप्तानों ने जिस सूधी-बुझी आक्रामकता और धैर्य का परिचय दिया, वह काबिले तारीफ है। उन्हें ऐसे समय में रास्ता पार करना पड़ा जब खाड़ी में ड्रोन हमले और समुद्री डकैती जैसे खतरे चरम पर थे।
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15 जहाज और अनिश्चितता का समंदर- क्या है मौजूदा स्थिति?
भले ही दो जहाज निकल आए हों, लेकिन असली चुनौती उन 15 टैंकरों को लेकर है जो अभी भी फंसे हुए हैं। इनमें केवल एलपीजी ही नहीं, बल्कि भारी मात्रा में कच्चा तेल भी लदा है। ये जहाज फिलहाल अलग-अलग ‘एन्करेज पॉइंट्स’ पर खड़े हैं और हरी झंडी का इंतजार कर रहे हैं।भारतीय नौसेना का ‘मिशन डिप्लोमेसी’ यहाँ पर्दे के पीछे काम कर रहा है।
सूत्रों की मानें तो भारतीय नौसेना के युद्धपोत ‘आईएनएस तलवार’ और अन्य निगरानी पोत खाड़ी क्षेत्र में ‘ऑपरेशन संकल्प’ के तहत मुस्तैद हैं। वे लगातार इन फंसे हुए जहाजों के कप्तानों के संपर्क में हैं। संकट यह है कि यदि तनाव और बढ़ता है, तो बीमा कंपनियां इन जहाजों का ‘रिस्क कवर’ बढ़ा देंगी, जिससे भारत में गैस और तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।
घरेलू मोर्चे पर सरकार की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’- आम आदमी की रसोई पर आंच नहीं
जब समंदर में संकट गहराया, तो दिल्ली के शास्त्री भवन (पेट्रोलियम मंत्रालय) में बैठकों का दौर शुरू हुआ। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि क्या इस कमी का असर आम आदमी की रसोई तक पहुँचने दिया जाए? जवाब था—कतई नहीं।सरकार ने एक बेहद रणनीतिक फैसला लेते हुए “इंडस्ट्री सेकंड, किचन फर्स्ट” की नीति अपनाई है।
इसके तहत-
- औद्योगिक कटौती- स्टील, फर्टिलाइजर और कांच जैसी भारी गैस खपत वाली इकाइयों की आपूर्ति में अस्थायी कटौती की गई है।
- एलपीजी बफर स्टॉक- देश के पास मौजूद एलपीजी के बफर स्टॉक को अब धीरे-धीरे मार्केट में उतारा जा रहा है।
- लॉजिस्टिक्स में सुधार- गैस बॉटलिंग प्लांट्स को 24 घंटे काम करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि वितरण में कोई देरी न हो।
सरकार का यह कदम राजनीतिक रूप से भी अहम है, क्योंकि गैस की किल्लत और महंगाई हमेशा से चुनावी मुद्दा रही है। इसलिए, उद्योग जगत की नाराजगी मोल लेकर भी सरकार ने जनता की थाली को सुरक्षित रखने का फैसला किया है।
छोटे सिलेंडरों का बढ़ता बाजार- एक नया प्रयोग
आपूर्ति के दबाव को संतुलित करने के लिए पेट्रोलियम कंपनियों ने 5 किलो और 10 किलो के छोटे एलपीजी सिलेंडरों की बिक्री पर जोर देना शुरू कर दिया है। यह उन लोगों के लिए एक राहत है जो अचानक आई किल्लत के कारण रिफिल नहीं करा पा रहे थे। इसके अलावा, गैस वितरण व्यवस्था में डिजिटलीकरण को और सख्त किया गया है ताकि ब्लैक मार्केटिंग या जमाखोरी की कोई गुंजाइश न रहे।
विशेषज्ञ विश्लेषण- क्या यह केवल शुरुआत है?
ऊर्जा विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग इस संकट को केवल जहाजों के फंसने के तौर पर नहीं देख रहा है। उनका मानना है कि यह भारत की ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ की परीक्षा है।
- महंगाई का खतरा- यदि 15 जहाज अगले 72 घंटों में बाहर नहीं निकलते, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छू सकती हैं।
- सप्लाई चेन का टूटना- केवल तेल ही नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया से आने वाले अन्य मालवाहक जहाज भी अब रास्ता बदलने पर मजबूर हैं, जिससे ‘फ्रेट चार्ज’ (किराया) 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ गया है।
भारत के लिए सबक- ‘आत्मनिर्भर भारत’ अब विकल्प नहीं, मजबूरी है
पश्चिम एशिया का यह संकट एक बार फिर हमें उसी सवाल पर लाकर खड़ा करता है—हम कब तक खाड़ी देशों के तनाव के बंधक बने रहेंगे?
- विविधीकरण (Diversification)- भारत को अपनी निर्भरता खाड़ी देशों से हटाकर लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और रूस जैसे अन्य विकल्पों पर और अधिक बढ़ानी होगी।
- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार – भारत को अपने भूमिगत तेल भंडारों की क्षमता को दोगुना करने की जरूरत है ताकि ऐसे संकट के समय हम कम से कम 90 दिनों तक बिना आयात के सर्वाइव कर सकें।
- ग्रीन एनर्जी की रफ्तार- सौर, पवन और सबसे महत्वपूर्ण ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ पर निवेश ही भविष्य की सुरक्षा है।
उम्मीद और सावधानी के बीच का रास्ता
दो टैंकरों का बाहर निकलना एक मनोवैज्ञानिक जीत जरूर है, लेकिन भौतिक खतरा अभी टला नहीं है। जब तक आखिरी भारतीय नाविक और आखिरी लीटर तेल सुरक्षित भारतीय बंदरगाहों पर नहीं पहुँच जाता, तब तक सरकार और नौसेना को ‘हाई अलर्ट’ पर रहना होगा।
पश्चिम एशिया की आग शांत होने के संकेत फिलहाल कम ही हैं, लेकिन भारत की कूटनीति और नौसैनिक ताकत ने यह साफ कर दिया है कि वह अपने हितों की रक्षा करना जानता है। आने वाले कुछ दिन न केवल भारतीय ऊर्जा बाजार के लिए, बल्कि भारत की वैश्विक साख के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं।







