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मार्च के आंकड़ों ने बढ़ाई धड़कनें- देश में मंहगाई की दर 5.1 पर पहुंची

मार्च के आंकड़ों ने बढ़ाई धड़कनें- देश में मंहगाई की दर 5.1 पर पहुंची
नवजोत कौर सिद्धू
On: अप्रैल 16, 2026 6:19 अपराह्न
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नई दिल्ली। देश में नौकरी की स्थिति को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है। सरकार के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार मार्च 2026 में बेरोजगारी दर बढ़कर 5.1 प्रतिशत हो गई है। फरवरी में यह 4.9 प्रतिशत थी।देश की आर्थिक राजधानी हो या आईटी हब, हर तरफ से एक ही परेशान करने वाली खबर आ रही है—नौकरी मिलना अब और भी मुश्किल हो गया है। मार्च 2026 के आंकड़ों ने सरकार और युवा, दोनों की नींद उड़ा दी है।

शहरी युवाओं का संघर्ष: डिग्री हाथ में, पर काम कहां?

शहरी भारत में रोजगार की स्थिति इस वक्त सबसे ज्यादा नाजुक मोड़ पर है। महानगरों में रहने वाले युवाओं के लिए अब नौकरी पाना केवल मेहनत का काम नहीं, बल्कि किस्मत का खेल भी होता जा रहा है। 

इसका सबसे बड़ा कारण है जॉब मार्केट में बढ़ती भीड़ और उसके मुकाबले पदों की बेहद सीमित संख्या। आज हालात ये हैं कि एक छोटे से क्लर्क या डेटा एंट्री ऑपरेटर के पद के लिए भी हजारों ग्रेजुएट्स और पोस्ट-ग्रेजुएट्स कतार में खड़े मिलते हैं।कंपनियों के भीतर भी एक अजीब सी खामोशी है। बढ़ती लागत और तकनीक के दखल ने इंसानी श्रम की जरूरत को कम कर दिया है। अब कंपनियां एक ही कर्मचारी से तीन लोगों का काम लेने की कोशिश कर रही हैं, जिससे नए लोगों के लिए दरवाजे बंद होते जा रहे हैं। इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन ने उन एंट्री-लेवल नौकरियों को लगभग खत्म सा कर दिया है, जो कभी फ्रेशर्स का सहारा हुआ करती थीं। 

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शहरों में प्रतिस्पर्धा इतनी गलाकाट है कि काबिल होने के बावजूद लोग खुद को बेकार महसूस करने लगे हैं,इस पूरी रिपोर्ट का सबसे दुखद पहलू वह है, जिसे अर्थशास्त्री ‘हतोत्साहित श्रमिक’ (Discouraged Workers) कहते हैं। लगातार रिजेक्शन झेलने के बाद कई युवाओं ने अब नौकरी ढूंढना ही बंद कर दिया है। उन्हें लगता है कि कोशिश करने का कोई फायदा नहीं है।यह स्थिति किसी भी देश के लिए खतरे की घंटी है। जब युवा शक्ति घर बैठ जाती है, तो समाज में तनाव और असुरक्षा का माहौल बनता है। लोग खुद को समाज से कटा हुआ महसूस करने लगते हैं, जिसका असर उनके मानसिक स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली पर पड़ता है।

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गांवों में स्थिति थोड़ी ठीक, लेकिन पूरी तरह नहीं

शहरों के मुकाबले गांवों में बेरोजगारी दर थोड़ी कम जरूर है, लेकिन वहां की अपनी चुनौतियां हैं। गांवों में लोग खेती-बाड़ी या छोटे-मोटे कामों में लगे तो हैं, लेकिन वहां ‘छिपी हुई बेरोजगारी’ बहुत ज्यादा है। यानी काम पर लोग ज्यादा लगे हैं, लेकिन पैदावार और आमदनी उतनी नहीं है कि सबका पेट भर सके।खेती में लगे युवाओं का एक बड़ा हिस्सा अब भी बेहतर भविष्य की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहा है। लेकिन जब शहरों से भी उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ता है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बोझ और बढ़ जाता है। गांवों में स्थाई और अच्छी आय वाली नौकरियों का न होना एक बड़ी ढांचागत समस्या बनी हुई है।

डिग्री और हुनर के बीच का बढ़ता फासला

एक तरफ लाखों युवा बेरोजगार हैं और दूसरी तरफ कंपनियां कहती हैं कि उन्हें ‘सही’ उम्मीदवार नहीं मिल रहे। यह विरोधाभास आज के दौर की सबसे बड़ी चुनौती है। हमारी शिक्षा व्यवस्था आज भी उन पैमानों पर टिकी है जो दशकों पुराने हो चुके हैं। कॉलेजों से निकलने वाले छात्रों के पास बड़ी-बड़ी डिग्रियां तो हैं, लेकिन जब उनसे किसी आधुनिक समस्या का समाधान मांगा जाता है, तो वे पिछड़ जाते हैं।

कंपनियों को आज ऐसे लोगों की जरूरत है जो तकनीकी रूप से दक्ष हों और बदलती परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढाल सकें। लेकिन हमारे यहां प्रशिक्षण और उद्योग की जरूरतों के बीच कोई तालमेल नहीं दिखता। यही वजह है कि डिग्री होने के बावजूद युवाओं को या तो बेहद कम वेतन पर काम करना पड़ता है या फिर महीनों तक खाली हाथ बैठना पड़ता है। कौशल विकास की योजनाएं अभी भी उस स्तर तक नहीं पहुंच पाई हैं जहां वे हर स्नातक को रोजगार के लायक बना सकें।

सरकार के सामने क्या चुनौती है

सरकार की तरफ से कई कदम उठाए गए हैं, लेकिन वे समुद्र में एक बूंद की तरह लग रहे हैं। केवल सरकारी नौकरियों के भरोसे इस बड़ी आबादी को रोजगार देना मुमकिन नहीं है। निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करना और छोटे उद्योगों (MSMEs) को मजबूत करना ही एकमात्र रास्ता है। सूक्ष्म और लघु उद्योगों को अगर सस्ती बिजली, कम ब्याज पर कर्ज और आसान नियम मिलें, तो वे करोड़ों नौकरियां पैदा करने की क्षमता रखते हैं।

इसके साथ ही, शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार की जरूरत है। व्यावसायिक शिक्षा को मुख्यधारा का हिस्सा बनाना होगा ताकि छात्र सिर्फ पास होने के लिए नहीं, बल्कि काम सीखने के लिए पढ़ें। अगर हम अब भी नहीं संभले, तो 5.1 प्रतिशत का यह आंकड़ा भविष्य में और भी भयावह रूप ले सकता है।

वक्त है संभलने का

मार्च के ये आंकड़े महज कागज का टुकड़ा नहीं हैं, बल्कि यह उन करोड़ों युवाओं की आवाज है जो एक सम्मानजनक भविष्य की तलाश में हैं। 5.1 प्रतिशत की यह दर हमें आगाह कर रही है कि अगर हमने आज रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं किए, तो कल की राह और भी कठिन हो सकती है। अब देखना यह है कि आने वाले महीनों में सरकार और कॉर्पोरेट जगत इस चुनौती से निपटने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment

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