मध्य प्रदेश के जबलपुर में आयोजित एक धार्मिक समारोह के दौरान प्रसिद्ध कथावाचक मोरारी बापू ने ऐसा बयान दिया जिसने न केवल स्थानीय श्रद्धालुओं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा छेड़ दी। बापू ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भगवद्गीता और रामायण केवल किसी एक धर्म के ग्रंथ नहीं, बल्कि मानवता को दिशा देने वाले वैश्विक साहित्य हैं। साथ ही उन्होंने देश में बढ़ती मतांतरण गतिविधियों पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि यह केवल धार्मिक प्रश्न नहीं, बल्कि सांस्कृतिक व सामाजिक स्थिरता का विषय है।

मोरारी बापू का संदेश: ग्रंथों की सार्वभौमिकता
जबलपुर की पवित्र भूमि पर आयोजित कथा कार्यक्रम में हजारों लोग मौजूद थे। मोरारी बापू ने अपने प्रवचन में कहा कि दुनिया के कई देशों में कहानियों और धार्मिक ज्ञान के माध्यम से लोगों को जीवन-मूल्य सिखाए जाते हैं। उनका कहना था कि गीता और रामायण को केवल हिंदू धर्म तक सीमित करना इन ग्रंथों के महत्व को छोटा करना है। ये ग्रंथ मानव चिंतन, कर्तव्य, नैतिकता और प्रेम की ऐसी व्याख्या करते हैं जो हर इंसान के जीवन में लागू होती है।उन्होंने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि इन ग्रंथों को राजनीति की दृष्टि से नहीं, बल्कि मानव-कल्याण के प्रकाशपुंज के रूप में पढ़ा और समझा जाए। बापू का तर्क था कि जैसे दुनिया होमर की इलियड, कन्फ्यूशियस के विचार, या बाइबल के अध्याय को वैश्विक साहित्य मानती है, उसी तरह गीता और रामायण को भी मानव सभ्यता की साझी धरोहर के रूप में देखा जाना चाहिए।
पाठ्यक्रम में शामिल करने की वकालत
अपने संबोधन के दौरान मोरारी बापू ने यह भी कहा कि देश की शिक्षा व्यवस्था को ऐसे ग्रंथों से जोड़ना जरूरी है, जो बच्चों में मूल्य, साहस, सत्य और करुणा का भाव विकसित करें।उन्होंने सुझाव दिया कि गीता और रामायण को ऐतिहासिक, नैतिक व साहित्यिक दृष्टिकोण से पढ़ाया जा सकता है। उन्हें धार्मिक अनुष्ठान के रूप में पढ़ाने की आवश्यकता नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण के साधन के रूप में शामिल करने की जरूरत है।
उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया के कई देशों में उनके धार्मिक ग्रंथ स्कूलों में नैतिक शिक्षा के रूप में पढ़ाए जाते हैं, तो भारत जैसे देश में—जो इन ग्रंथों की जन्मभूमि है—ऐसी शिक्षा को लेकर विवाद होना समझ से परे है।
मतांतरण पर चिंता: सामाजिक एकता का प्रश्न
मोरारी बापू ने अपने वक्तव्य के अगले हिस्से में देश में बढ़ते मतांतरण और धर्मांतरण पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने या बदलने का अधिकार संविधान देता है, लेकिन जब लालच, छल या दबाव के आधार पर लोगों को धर्म बदलने के लिए प्रेरित किया जाए, तो यह सीधे-सीधे समाज की एकता और सांस्कृतिक जड़ों को प्रभावित करता है।
उन्होंने कहा कि कई ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में यह समस्या तेजी से फैल रही है, जिससे स्थानीय संस्कृति, रीति-रिवाज और सामाजिक संतुलन पर असर पड़ रहा है। बापू का कहना था कि भारत की पहचान उसकी विविधता में है, लेकिन विविधता तब तक ही सुंदर है जब तक उसके मूल स्वरूप को कमजोर करने की कोशिश न की जाए।
धर्म, संस्कृति और सह-अस्तित्व का संदेश
मोरारी बापू अपने प्रवचनों में हमेशा शांति, सहिष्णुता और परस्पर सम्मान पर जोर देते रहे हैं। जबलपुर में भी उन्होंने यही संदेश दोहराया।
उन्होंने कहा कि धर्म किसी को जोड़ने का माध्यम होना चाहिए, न कि बांटने का। उनके अनुसार, गीता और रामायण ऐसे ग्रंथ हैं जो बिना किसी भेदभाव के हर मानव को सही राह दिखाने का सामर्थ्य रखते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि समाज के भीतर नैतिक शक्ति और सांस्कृतिक स्थिरता तभी संभव है जब लोग अपनी जड़ों से जुड़े हों। आज के समय में उन ग्रंथों की व्याख्या करना बेहद जरूरी है जो व्यक्ति को संयम, सत्य, साहस और करुणा की राह दिखाते हैं।
राजनीतिक बहस से बचने की अपील
मोरारी बापू ने अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें ग्रंथों को राजनीतिक बहस का हिस्सा बनते देख दुख होता है। उनका कहना था कि हर बार जब गीता या रामायण की बात की जाती है, तो उसे सांप्रदायिक, धार्मिक या राजनीतिक कोण से तौलना उचित नहीं है। ये ग्रंथ समूची मानव सभ्यता के सदियों पुराने अनुभव, संघर्ष और ज्ञान का संग्रह हैं, जिन्हें किसी एक खांचे में सीमित करना उनके वास्तविक स्वरूप के साथ अन्याय है। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी जड़ों से जुड़ा रहे, परंतु धर्म को राजनीति का हथियार न बनाए।
बापू ने आग्रह किया कि शिक्षा और संस्कृति को राजनीति से अलग रखा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इन ग्रंथों की महत्ता को सही अर्थों में समझ सकें।
जबलपुर में श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया
जबलपुर में हजारों की संख्या में मौजूद लोगों ने बापू के वक्तव्य का स्वागत किया। कई लोगों ने कहा कि ऐसे समय में जब समाज विभिन्न तनावों से गुजर रहा है, तब बापू जैसे संतों का मार्गदर्शन आवश्यक है।
काफी लोगों ने इस बात पर सहमति जताई कि गीता और रामायण को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़ना बच्चों में आत्मविश्वास, नैतिकता और आध्यात्मिक स्थिरता ला सकता है।
वहीं कुछ लोगों ने यह भी कहा कि बापू का मतांतरण को लेकर चिंता जताना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मुद्दा अब केवल धर्म तक सीमित नहीं रह गया |
आधुनिक समाज में ग्रंथों की प्रासंगिकता
जबलपुर में मोरारी बापू का यह संदेश आज के दौर में बेहद प्रासंगिक है। गीता और रामायण जैसे ग्रंथ किसी खास समुदाय की पहचान भर नहीं, बल्कि मानव मन, नैतिकता और जीवन की जटिलताओं को समझने का वैश्विक मार्गदर्शन हैं।
इन्हें संकुचित दृष्टिकोण से देखने के बजाय मूल्य-आधारित शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक एकता के रूप में अपनाना समय की मांग है।
बापू द्वारा मतांतरण पर जताई चिंता भी समाज के लिए चेतावनी है कि यदि सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक सद्भाव को कमजोर करने वाली गतिविधियाँ जारी रहीं, तो भविष्य में इसके व्यापक परिणाम दिखाई देंगे। इसलिए, बापू के संदेश का सार यही है,भारत को अपनी आध्यात्मिक जड़ों से जुड़े रहते हुए, आधुनिकता और वैश्विक सोच के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ना होगा।







