व्यापारभारतविदेशी समाचारखेलजीवन शैलीराजनीतिधर्मभौगोलिकसेलिब्रेटीज़शिक्षास्वास्थ्य

राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ अब राष्ट्रगान से पहले खड़े होना अनिवार्य करने के फैसले पर सियासी बहस तेज

राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ अब राष्ट्रगान से पहले खड़े होना अनिवार्य करने के फैसले पर सियासी बहस तेज
नवजोत कौर सिद्धू
On: फ़रवरी 11, 2026 6:06 अपराह्न
Follow Us:

 समय-समय पर चर्चा होती रही है। हाल ही में सरकार द्वारा एक नया प्रावधान तय किए जाने की खबर ने व्यापक बहस को जन्म दिया है। प्रस्तावित नियम के अनुसार, सार्वजनिक और सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगान “जन गण मन” से पहले “वंदे मातरम्” बजाया जाएगा और दोनों के दौरान उपस्थित सभी लोगों के लिए खड़े होना अनिवार्य होगा। इस निर्णय ने राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक स्तर पर कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

यह विषय केवल एक प्रशासनिक निर्देश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक पहचान, संवैधानिक मर्यादाओं और नागरिक कर्तव्यों से भी जुड़ा हुआ है। आइए इस मुद्दे को विस्तार से समझते हैं।

1. नया नियम क्या कहता है और उसका उद्देश्य

प्रस्तावित दिशा-निर्देशों के अनुसार, सरकारी समारोहों, शैक्षणिक संस्थानों के विशेष कार्यक्रमों और कुछ सार्वजनिक आयोजनों में “वंदे मातरम्” को राष्ट्रगान से पहले प्रस्तुत किया जाएगा। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि दोनों गीतों के दौरान सभी उपस्थित व्यक्तियों को सम्मान के तौर पर खड़ा होना होगा।

सरकार का तर्क है कि यह कदम राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाया गया है। “वंदे मातरम्” स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक प्रेरणास्रोत रहा है और इसे राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है। ऐसे में इसे औपचारिक कार्यक्रमों में अधिक प्रमुख स्थान देना राष्ट्रीय गौरव को बढ़ाने का प्रयास बताया जा रहा है।

अधिकारियों का कहना है कि इस नियम का मकसद किसी पर दबाव डालना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान की भावना को प्रोत्साहित करना है। सरकार का यह भी कहना है कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दोनों ही देश की अस्मिता के प्रतीक हैं, इसलिए इनके प्रति समान आदर दिखाना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

हालांकि, इस घोषणा के बाद कई लोगों ने यह सवाल भी उठाया है कि क्या इस प्रकार का अनिवार्य प्रावधान संविधान के अनुरूप है या नहीं।

2. संवैधानिक और कानूनी पहलू

भारत का संविधान राष्ट्रगान “जन गण मन” को औपचारिक रूप से मान्यता देता है, जबकि “वंदे मातरम्” को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है। दोनों का ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्व अलग-अलग संदर्भों में स्थापित है।

कानूनी दृष्टि से राष्ट्रगान के दौरान सम्मान दिखाना अपेक्षित है और इससे संबंधित दिशा-निर्देश पहले से मौजूद हैं। लेकिन राष्ट्रगीत के संदर्भ में अनिवार्यता को लेकर स्पष्ट कानूनी प्रावधान सीमित हैं। यही कारण है कि इस नए नियम पर संवैधानिक बहस छिड़ गई है।

कुछ विधि विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सांस्कृतिक या राष्ट्रीय प्रतीक के सम्मान को कानूनी बाध्यता में बदलना सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए। यदि इसे अनिवार्य बनाया जाता है, तो यह सुनिश्चित करना होगा कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के दायरे में संतुलित रहे।

दूसरी ओर, समर्थकों का तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 51A में नागरिकों के मूल कर्तव्यों का उल्लेख है, जिसमें राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना भी शामिल है। ऐसे में यह नियम उसी भावना को सुदृढ़ करता है।

इस मुद्दे ने न्यायपालिका की संभावित भूमिका पर भी चर्चा को जन्म दिया है। यदि इस निर्णय को चुनौती दी जाती है, तो अदालतों को यह तय करना पड़ सकता है कि यह प्रावधान संवैधानिक संतुलन के अनुरूप है या नहीं।

3. राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं

सरकार के इस निर्णय पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग रही हैं। सत्तापक्ष के नेताओं ने इसे देशभक्ति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का कदम बताया है। उनका कहना है कि इससे युवाओं में राष्ट्रीय चेतना मजबूत होगी और स्वतंत्रता संग्राम की विरासत को सम्मान मिलेगा।

विपक्षी दलों ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा है कि देशभक्ति को अनिवार्य नियमों से नहीं, बल्कि स्वैच्छिक भावना से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि यदि किसी नागरिक को किसी कारणवश खड़े होने में कठिनाई है, तो उसे कानूनी या सामाजिक दबाव का सामना नहीं करना चाहिए।

सामाजिक स्तर पर भी इस विषय पर व्यापक चर्चा हो रही है। एक वर्ग इसे सकारात्मक पहल मानता है, जबकि दूसरा वर्ग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में हस्तक्षेप के रूप में देखता है। शैक्षणिक संस्थानों में भी इस नियम के संभावित प्रभाव पर विचार किया जा रहा है—क्या इससे छात्रों में अनुशासन और सम्मान की भावना बढ़ेगी, या फिर यह अनावश्यक विवाद को जन्म देगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर व्यापक संवाद और स्पष्ट दिशा-निर्देश जरूरी होते हैं, ताकि किसी प्रकार की गलतफहमी या टकराव की स्थिति न बने। 

सम्मान, संवेदनशीलता और संतुलन की जरूरत

“वंदे मातरम्” और “जन गण मन” दोनों ही भारतीय इतिहास और भावनाओं से गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि सरकार इन दोनों को औपचारिक कार्यक्रमों में एक विशेष क्रम में प्रस्तुत करने का निर्णय लेती है, तो उसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना हो सकता है।

हालांकि, किसी भी नियम को लागू करते समय संवैधानिक मर्यादा, व्यक्तिगत अधिकार और सामाजिक विविधता का ध्यान रखना आवश्यक है। सम्मान की भावना तभी स्थायी होती है, जब वह स्वैच्छिक और आत्मसात हो, न कि केवल नियमों के कारण प्रदर्शित की जाए।

यह निर्णय आने वाले समय में किस दिशा में जाएगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इसे किस प्रकार लागू किया जाता है और समाज इसे किस नजर से देखता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़ा कोई भी कदम केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक विमर्श का विषय बन जाता है।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment