राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के एक हालिया आयोजन में जब बॉलीवुड के जाने-माने सितारे मंच पर और दर्शक दीर्घा में नजर आए तो यह दृश्य अपने आप में खास बन गया। आमतौर पर मनोरंजन जगत और वैचारिक संगठनों को अलग-अलग खांचों में देखा जाता रहा है लेकिन इस कार्यक्रम में फिल्मी दुनिया की मौजूदगी ने एक नए संवाद की ओर इशारा किया। यह आयोजन केवल औपचारिक सहभागिता तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसमें संस्कृति, समाज और राष्ट्र से जुड़े विषयों पर गंभीर चर्चा भी देखने को मिली।
बॉलीवुड सितारों की भागीदारी ने कार्यक्रम की ओर आम लोगों और युवाओं का ध्यान खींचा। कई कलाकारों को पारंपरिक परिधान में देखा गया जो भारतीय सांस्कृतिक पहचान के प्रति सम्मान का प्रतीक माना गया। मंच से दिए गए संबोधनों और अनौपचारिक बातचीत में यह बात उभरकर सामने आई कि कला और संस्कृति समाज को जोड़ने का माध्यम बन सकती है और यही विचार इस आयोजन की आत्मा में भी दिखाई दिया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दो दिवसीय संघ शताब्दी वर्ष में बालीवुड सितारों के आने से हलचल मच गई है जहां पहले दिन ही बाॅलीवुड की महान हस्ती सलमान खान और रणबीर कपूर जैसी हस्तियों ने शिरकत की तो वही दूसरे दिन विकी कौशल और अन्नया पाण्डेय जैसे युवा कलाकारों ने भी आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत की स्पीच भी ध्यान सुना। आरएसएस के 100 वर्ष पूर्ण होने पर यह शताब्दी समारोह में शामिल हुए
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सांस्कृतिक मंच और फिल्मी दुनिया का संवाद
इस आयोजन में RSS के सांस्कृतिक दृष्टिकोण और बॉलीवुड की रचनात्मक अभिव्यक्ति के बीच संवाद का माहौल नजर आया। कार्यक्रम के दौरान कला, सिनेमा और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषयों पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि फिल्में केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं बल्कि वे समाज की सोच और मूल्यों को आकार देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
बॉलीवुड से जुड़े कलाकारों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि भारतीय समाज की विविधता और परंपराएं सिनेमा के लिए प्रेरणा का बड़ा स्रोत रही हैं। उन्होंने यह भी माना कि जब फिल्मों में जड़ों से जुड़ी कहानियां दिखाई जाती हैं तो दर्शकों के साथ गहरा भावनात्मक संबंध बनता है। इस संदर्भ में RSS के सांस्कृतिक कार्यक्रमों को एक ऐसे मंच के रूप में देखा गया जहां परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन पर बात हो सकती है।
कार्यक्रम में लोक कला, संगीत और नाट्य प्रस्तुतियों ने भी दर्शकों को आकर्षित किया। इन प्रस्तुतियों के बीच फिल्मी सितारों की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि लोकप्रिय संस्कृति और पारंपरिक कला एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं। इस संवाद ने युवाओं को भी यह सोचने पर मजबूर किया कि सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक माध्यमों से कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है।
सामाजिक सरोकार और सार्वजनिक संदेश
RSS के इस आयोजन में केवल सांस्कृतिक चर्चा ही नहीं बल्कि सामाजिक सरोकारों पर भी विशेष ध्यान दिया गया। शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। बॉलीवुड के सितारों ने भी इन मुद्दों पर अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार करते हुए कहा कि सार्वजनिक जीवन में होने के कारण उनकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
कुछ कलाकारों ने यह विचार साझा किया कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए कला और सिनेमा को संवेदनशील विषयों को जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत करना चाहिए। उन्होंने यह भी माना कि लोकप्रियता का इस्तेमाल सामाजिक जागरूकता बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। इस दृष्टिकोण से RSS जैसे संगठनों के साथ संवाद को उन्होंने एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा।
दर्शकों के बीच यह चर्चा भी रही कि इस तरह के आयोजनों से विभिन्न क्षेत्रों के बीच संवाद बढ़ता है और आपसी समझ मजबूत होती है। राजनीतिक या वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर जब संस्कृति और समाज की बात होती है तो नए दृष्टिकोण सामने आते हैं। यही वजह रही कि इस कार्यक्रम को केवल एक संगठनात्मक आयोजन न मानकर व्यापक सामाजिक संवाद के रूप में देखा गया।
बदलते संकेत और भविष्य की दिशा RSS के आयोजन में बॉलीवुड
सितारों की मौजूदगी को कई लोग बदलते समय का संकेत मान रहे हैं। पहले जहां फिल्मी दुनिया और वैचारिक संगठनों के बीच दूरी की बात होती थी, वहीं अब संवाद और सहभागिता की तस्वीर सामने आ रही है। यह बदलाव न तो अचानक है और न ही एकतरफा, बल्कि यह समाज में चल रहे व्यापक विमर्श का हिस्सा माना जा रहा है।
इस आयोजन ने यह भी दिखाया कि भारतीय समाज में संस्कृति, कला और विचारधारा के बीच संबंध बहुआयामी हैं। जब विभिन्न पृष्ठभूमियों से आए लोग एक मंच पर संवाद करते हैं, तो नए विचार जन्म लेते हैं। भविष्य में ऐसे आयोजनों से यह उम्मीद की जा रही है कि कला और संस्कृति के माध्यम से सामाजिक एकता और संवाद को और मजबूत किया जा सकेगा।
कुल मिलाकर RSS के इस आयोजन में बॉलीवुड सितारों की मौजूदगी ने यह स्पष्ट किया कि सिनेमा और समाज के बीच का रिश्ता केवल पर्दे तक सीमित नहीं है। जब कला, विचार और सामाजिक जिम्मेदारी एक साथ आती हैं तो वे समाज को नई दिशा देने की क्षमता रखती हैं। यही संदेश इस कार्यक्रम से उभरकर सामने आया जिसने दर्शकों और प्रतिभागियों दोनों को सोचने के लिए नई दृष्टि दी।
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