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नाले में गिरा ‘सम्मान’ खेतों में खड़ा ‘अन्नदाता’

नाले में गिरा ‘सम्मान’ खेतों में खड़ा ‘अन्नदाता’
नवजोत कौर सिद्धू
On: जनवरी 5, 2026 12:33 अपराह्न
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धान उपार्जन केंद्र की अव्यवस्था ने सरकारी दावों की परतें उधेड़ीं-जिन धान उपार्जन केंद्रों को सरकार किसानों के लिए राहत और भरोसे का ठिकाना बताती है, वहीं मध्य प्रदेश के शहडोल जिले का जैतपुर उपार्जन केंद्र आज बदहाली, लापरवाही और संवेदनहीनता की प्रतीक तस्वीर बनकर खड़ा है। यहां की अव्यवस्था सिर्फ व्यवस्थागत विफलता नहीं, बल्कि अन्नदाता के सम्मान और संवैधानिक गरिमा—दोनों पर लगे सवालों की गूंज है। नाले में पड़ी प्रधानमंत्री की तस्वीर और खुले आकाश के नीचे इंतज़ार करता किसान—ये दो दृश्य, मानो पूरे तंत्र का आईना बन गए हों।

काग़ज़ी दावों की चमक, ज़मीनी हकीकत की धूल

सरकारी बयानों में उपार्जन केंद्रों पर पानी, शौचालय, प्राथमिक उपचार, बैठने की व्यवस्था और अनाज की सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ामों की बात होती है। निरीक्षण की नियमितता का भरोसा दिलाया जाता है। लेकिन जैतपुर केंद्र पर कदम रखते ही ये दावे धूल में मिलते नज़र आते हैं। न पीने का पानी भरोसेमंद है, न शौचालय, न प्राथमिक उपचार—और न ही किसानों के बैठने की कोई मानवीय व्यवस्था। घंटों धूप-ठंड में खड़े किसान, प्रशासनिक उदासीनता का मौन बयान बन जाते हैं।

नाले में मिली तस्वीर, सवालों में घिरी संवैधानिक मर्यादा

इस अव्यवस्था के बीच एक दृश्य पूरे मामले को और गंभीर बना देता है,उपार्जन केंद्र परिसर में लगा| प्रधानमंत्री का फ्लैक्स नाले में पड़ा|  यह केवल एक तस्वीर नहीं, बल्कि उस पद की गरिमा का प्रतीक है, जिस पर देश की आस्था टिकी है। ऐसी स्थिति में तस्वीर का यूं अपमानित होना अनजानी भूल थी या लापरवाही का परिणाम—यह सवाल अब प्रशासन के सामने है। मर्यादा का यह पतन व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाता है।

किसान बेहाल, प्रक्रिया बेजान धान की तौल और खरीदी में देरी,  अनाज के सुरक्षित भंडारण का अभाव, खाली या अनुपयोगी पानी की टंकी—ये सब जैतपुर केंद्र की रोज़मर्रा की तस्वीर है। खुले में पड़ा धान खराब होने के खतरे से जूझ रहा है, और किसान समय, श्रम व सम्मान—तीनों की कीमत चुका रहा है। काग़ज़ों में चलती व्यवस्थाएं ज़मीन पर दम तोड़ती दिखती हैं।

महिला स्व-सहायता समूह: नाम में सशक्तिकरण, काम में संदेह

रिकॉर्ड में संचालन ‘मां नर्मदा महिला स्व-सहायता समूह’ के नाम है, जिसकी मुखिया प्रतिभा दुबे बताई जाती हैं। महिला सशक्तिकरण की सरकारी कथा यहीं से शुरू होती है, पर स्थानीय आरोप इसी कथा पर विराम लगा देते हैं। कहा जा रहा है कि समूह की भूमिका काग़ज़ों तक सीमित है; वास्तविक निर्णय किसी और के हाथ में हैं। यदि ऐसा है, तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन, बल्कि सशक्तिकरण की भावना के साथ छल भी है।

पर्दे के पीछे की परछाइयां

सूत्रों में एक नाम उभरता है—अभयानंद। आरोप है कि संचालन की असली डोरें उसी के हाथ में हैं और सहकारिता विभाग से उसका पुराना विवादित नाता रहा है। काग़ज़ों और ज़मीन की इस दोहरी कहानी ने पारदर्शिता को कठघरे में खड़ा कर दिया है।

निरीक्षण—हकीकत या औपचारिकता?

अधिकारियों के नियमित निरीक्षण के दावे, जैतपुर की हालत देखकर खोखले लगते हैं। क्या निरीक्षण में नाले में पड़ी तस्वीर नहीं दिखी? खाली टंकी, खुले में पड़ा धान और परेशान किसान नज़र नहीं आए? या फिर निरीक्षण सिर्फ फाइलों की शोभा बनकर रह गया?

सम्मान, संवेदनशीलता और जवाबदेही

प्रधानमंत्री की तस्वीर का अपमान किसी एक विचारधारा का नहीं, संवैधानिक मर्यादा का प्रश्न है। किसान की पीड़ा किसी एक केंद्र की नहीं, व्यवस्था की आत्मा का सवाल है। मांग साफ़ है—महिला स्व-सहायता समूह की वास्तविक भूमिका की जांच हो, पर्दे के पीछे सक्रिय लोगों की पहचान तय हो, तस्वीर के अपमान पर स्पष्ट जवाबदेही तय की जाए, और किसानों को तुरंत मूलभूत सुविधाएं मिलें।

प्रशासन के सामने परीक्षा

अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं। क्या यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा, या ज़मीन पर सुधार उतरेगा? जैतपुर का उपार्जन केंद्र आज केवल एक स्थान नहीं, बल्कि उस खाई का प्रतीक है जो दावों और हकीकत के बीच बढ़ती जा रही है। यदि समय रहते जवाबदेही तय नहीं हुई, तो टूटेगा किसान का भरोसा—और उसके साथ व्यवस्था की विश्वसनीयता भी। सवाल यही है: क्या अन्नदाता को उसका हक़ और सम्मान मिलेगा, या तस्वीरों और दावों के बीच सच यूं ही नाले में बहता रहेगा 

Swati Pandey

A versatile writer mainly works on trending news, daily updates from politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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