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एमपी को मिली बड़ी सौगात- जंगली बिल्लियों के संरक्षण के लिए शुरू होगा स्पेशल प्रोजेक्ट

जंगली बिल्लियों के संरक्षण के लिए शुरू होगा स्पेशल प्रोजेक्ट
नवजोत कौर सिद्धू
On: जनवरी 19, 2026 12:36 अपराह्न
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मध्यप्रदेश एक बार फिर वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में देशभर के लिए मिसाल बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। टाइगर स्टेट के रूप में पहचान बना चुके प्रदेश ने जहां चीता प्रोजेक्ट के जरिए वैश्विक स्तर पर ध्यान खींचा, वहीं अब सरकार ने जंगली बिल्लियों के संरक्षण के लिए एक विशेष परियोजना शुरू करने का बड़ा फैसला लिया है। यह प्रोजेक्ट विशेष रूप से स्याहगोश (Caracal) जैसी दुर्लभ और कम ज्ञात प्रजातियों पर केंद्रित होगा, जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में “लेसर नोन स्पीशीज” कहा जाता है।

राष्ट्रीय सम्मेलन में हुआ बड़ा ऐलान

यह महत्वपूर्ण घोषणा लेसर नोन स्पीशीज पर आधारित चौथे राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान की गई। पर्यावरण परिसर, भोपाल में आयोजित इस संगोष्ठी में चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन शुभरंजन सेन ने बताया कि मध्यप्रदेश वन विभाग जल्द ही स्याहगोश यानी जंगली बिल्ली के संरक्षण और पुनरुत्थान के लिए एक विशेष प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है। यह प्रोजेक्ट प्रदेश के गांधी सागर अभयारण्य से प्रारंभ किया जाएगा।

केंद्रीय भारत की जैव विविधता पर मंथन

सेंट्रल इंडिया में पाई जाने वाली लेसर नोन स्पीशीज पर केंद्रित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में वन्यजीव संरक्षण के नए उपायों, चुनौतियों और संभावनाओं पर गहन चर्चा हुई। सम्मेलन का शुभारंभ मध्यप्रदेश वन विभाग के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख वीएन अम्बाड़े, चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन शुभरंजन सेन, मध्यप्रदेश बायोडायवर्सिटी बोर्ड के अध्यक्ष अजय यादव और भारतीय वन प्रबंधन संस्थान (IIFM) के निदेशक डॉ. के. रविचंद्रन ने संयुक्त रूप से किया।

इस अवसर पर भारतीय वन प्रबंधन संस्थान के पूर्व प्रोफेसर बीसी चौधरी भी विशेष रूप से उपस्थित रहे। विशेषज्ञों ने माना कि लेसर नोन स्पीशीज पर ध्यान दिए बिना जैव विविधता संरक्षण अधूरा है।

लेसर नोन स्पीशीज पर क्यों जरूरी है फोकस

सम्मेलन में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि आमतौर पर बाघ, हाथी और चीता जैसी करिश्माई प्रजातियों पर तो ध्यान दिया जाता है, लेकिन छोटी और कम चर्चित प्रजातियां संरक्षण की दौड़ में पीछे छूट जाती हैं। यही कारण है कि कई प्रजातियां धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी हैं।

प्रधान मुख्य वन संरक्षक वीएन अम्बाड़े ने कहा कि लेसर नोन स्पीशीज में केवल जीव-जंतु (Fauna) ही नहीं, बल्कि वनस्पति (Flora) को भी शामिल करना चाहिए। उन्होंने विकास कार्यों के दौरान घोंसले वाले पेड़ों को हटाने से होने वाले नुकसान पर चिंता जताई और कहा कि ऐसे पेड़ों को हटाने की प्रक्रिया डीसीएफ की निगरानी में ही होनी चाहिए, ताकि पक्षियों और अन्य जीवों को क्षति न पहुंचे।

गोडावण और लेसर फ्लोरिकन का उदाहरण

वीएन अम्बाड़े ने अपने प्रशासनिक अनुभव साझा करते हुए गोडावण और लेसर फ्लोरिकन जैसे पक्षियों के संरक्षण की चुनौतियों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि यदि समय रहते ठोस कदम न उठाए जाएं, तो कई महत्वपूर्ण प्रजातियां हमेशा के लिए गायब हो सकती हैं।

श्याहगोश प्रोजेक्ट: वन्यजीव संरक्षण की नई उम्मीद

सम्मेलन का सबसे बड़ा आकर्षण स्याहगोश (Caracal) पर आधारित विशेष प्रोजेक्ट की घोषणा रही। चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन शुभरंजन सेन ने कहा कि मध्यप्रदेश में स्याहगोश को लेकर पहले से ही कुछ सकारात्मक प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन अब इन्हें एक संगठित और वैज्ञानिक परियोजना का रूप दिया जाएगा।

उन्होंने बताया कि यह प्रोजेक्ट गांधी सागर अभयारण्य में शुरू होगा, जहां स्याहगोश के अनुकूल प्राकृतिक आवास मौजूद हैं। इस परियोजना के तहत स्याहगोश की जनसंख्या का आकलन, उनके आवास की सुरक्षा, भोजन श्रृंखला का संरक्षण और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के उपाय किए जाएंगे।

अन्य प्रजातियों पर भी रहेगा फोकस

चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन शुभरंजन सेन ने यह भी स्पष्ट किया कि स्याहगोश के अलावा घड़ियालों की नेस्टिंग साइट को संरक्षित करने, महाशीर मछली, विभिन्न पक्षियों और तितलियों के संरक्षण के लिए भी विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश का उद्देश्य केवल बड़ी प्रजातियों का संरक्षण नहीं, बल्कि पूरे इकोसिस्टम को संतुलित रखना है।

ज्ञान के अंतर को पाटने में अहम भूमिका

मध्यप्रदेश बायोडायवर्सिटी बोर्ड के अध्यक्ष अजय यादव ने कहा कि लेसर नोन क्षेत्रों में क्या हो रहा है, यह जानना बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि प्रदेश में कई प्रजातियां संकटग्रस्त हैं, लेकिन उनके बारे में पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। कई बार यह भी स्पष्ट नहीं होता कि किसी प्रजाति की मौजूदा स्थिति क्या है और उसके आवास को किन खतरों का सामना करना पड़ रहा है। अजय यादव के अनुसार, इस तरह के सम्मेलन शोधकर्ताओं, वन अधिकारियों और नीति निर्माताओं के बीच संवाद स्थापित करने का माध्यम बनते हैं और ज्ञान के इस अंतर को भरने में अहम भूमिका निभाते हैं।

क्या है स्याहगोश (Caracal)

स्याहगोश, जिसे अंग्रेजी में Caracal कहा जाता है, एक मध्यम आकार की जंगली बिल्ली है। यह अपनी फुर्ती, शर्मीले स्वभाव और लंबे, काले गुच्छेदार कानों के लिए जानी जाती है। ‘काला कान’ (Black Ear) अर्थ वाले इस नाम के कारण ही इसे स्याहगोश कहा जाता है। यह प्रजाति भारत में बेहद दुर्लभ और विलुप्तप्राय मानी जाती है। स्याहगोश आमतौर पर शुष्क, झाड़ीदार और अर्ध-रेगिस्तानी इलाकों में पाई जाती है। इसकी लंबी और पतली टांगें, छोटी पूंछ और रेतीला-भूरा या लाल-भूरा फर इसे अन्य बिल्लियों से अलग पहचान देता है।

रात्रिचर और अकेली जीवनशैली

स्याहगोश मुख्य रूप से रात्रिचर होती है, यानी यह रात में सक्रिय रहती है। यह अकेले रहना पसंद करती है और अपने क्षेत्र की रक्षा के लिए जानी जाती है। इसकी सबसे खास विशेषता इसकी असाधारण फुर्ती है। यह इतनी ऊंची छलांग लगा सकती है कि उड़ते हुए पक्षियों को हवा में ही पकड़ लेती है।

भारत में स्याहगोश की स्थिति

भारत में स्याहगोश की संख्या बेहद सीमित मानी जाती है। यह प्रजाति मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। तेजी से घटते प्राकृतिक आवास, शिकार और मानव गतिविधियों के कारण इसकी संख्या में लगातार गिरावट आई है।

गांधी सागर अभयारण्य क्यों है उपयुक्त

विशेषज्ञों के अनुसार, गांधी सागर अभयारण्य स्याहगोश प्रोजेक्ट के लिए उपयुक्त स्थान है। यहां का शुष्क वन क्षेत्र, झाड़ीदार इलाका और पर्याप्त शिकार प्रजातियां स्याहगोश के अनुकूल वातावरण प्रदान करती हैं। साथ ही, अभयारण्य में पहले से चल रहे संरक्षण कार्यक्रम इस नई परियोजना को मजबूती देंगे।

संरक्षण के साथ जागरूकता भी जरूरी

सम्मेलन में इस बात पर भी जोर दिया गया कि संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय समुदायों में जागरूकता फैलाना बेहद जरूरी है। जब तक ग्रामीण और स्थानीय लोग वन्यजीवों के महत्व को नहीं समझेंगे, तब तक किसी भी प्रोजेक्ट की सफलता अधूरी रहेगी।

मध्यप्रदेश बनेगा लेसर नोन स्पीशीज का मॉडल स्टेट

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्याहगोश प्रोजेक्ट सफल होता है, तो मध्यप्रदेश लेसर नोन स्पीशीज के संरक्षण के लिए देश का मॉडल राज्य बन सकता है। यह न केवल जैव विविधता संरक्षण को मजबूती देगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने में भी अहम भूमिका निभाएगा।

वन जीव संरक्षण में नया अध्याय

लेसर नोन स्पीशीज पर चौथे राष्ट्रीय सम्मेलन में की गई यह घोषणा मध्यप्रदेश के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ती है। स्याहगोश जैसी दुर्लभ जंगली बिल्ली के लिए विशेष प्रोजेक्ट शुरू करने का निर्णय न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह दर्शाता है कि प्रदेश सरकार और वन विभाग अब संरक्षण के हर पहलू पर गंभीरता से काम कर रहे हैं। आने वाले समय में यह पहल भारत के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों को नई दिशा दे सकती है।

Swati Pandey

A versatile writer mainly works on trending news, daily updates from politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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