भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच हाल के वर्षों में तेज़ी से गहराता रक्षा और रणनीतिक सहयोग केवल द्विपक्षीय हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीतिक संरचना का भी संकेत देता है। इसी संदर्भ में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत–यूएई समझौता, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच उभरते रक्षा सहयोग का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष जवाब माना जा सकता है। इसका उत्तर “हाँ या नहीं” की सरल रेखा में नहीं, बल्कि बहुस्तरीय रणनीतिक यथार्थ में छिपा है।
बदलता मध्य-पूर्व और भारत–यूएई की रणनीतिक नज़दीकी
भारत और यूएई का संबंध लंबे समय तक व्यापार, प्रवासी श्रमिकों और ऊर्जा आपूर्ति तक सीमित रहा। परंतु पिछले एक दशक में यह रिश्ता सुरक्षा, रक्षा प्रशिक्षण, खुफिया सहयोग, आतंकवाद-रोधी प्रयासों और समुद्री सुरक्षा तक विस्तृत हो चुका है। यूएई, जो कभी पाकिस्तान का पारंपरिक सैन्य साझेदार माना जाता था, अब भारत को भी समान स्तर पर रणनीतिक भागीदार के रूप में स्वीकार कर रहा है।
इस बदलाव का प्रमुख कारण यह है कि यूएई अब अपनी विदेश नीति को केवल धार्मिक या ऐतिहासिक समीकरणों पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के आधार पर तय कर रहा है। भारत, एक स्थिर लोकतंत्र, विशाल बाजार और उभरती सैन्य शक्ति के रूप में यूएई के लिए भरोसेमंद साझेदार बनता जा रहा है।
दूसरी ओर, भारत के लिए यूएई पश्चिम एशिया में एक ऐसा द्वार है, जो ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों की रक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग में अहम भूमिका निभा सकता है। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियाँ और कट्टरपंथी नेटवर्क की मौजूदगी, दोनों देशों को एक साझा मंच पर लाती हैं।
पाकिस्तान–सऊदी रक्षा संबंध और उसकी सीमाएँ
पाकिस्तान और सऊदी अरब के संबंध दशकों से रक्षा और सैन्य सहयोग पर आधारित रहे हैं। पाकिस्तानी सैन्य प्रशिक्षक, सऊदी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण देते रहे हैं और कई बार संकट के समय पाकिस्तान ने सऊदी सुरक्षा को समर्थन दिया है। धार्मिक समानता और ऐतिहासिक समीकरण इस रिश्ते की नींव रहे हैं।
परंतु हाल के वर्षों में इस रिश्ते में कुछ व्यवहारिक सीमाएँ भी सामने आई हैं। सऊदी अरब अब अपनी विदेश नीति में विविधता ला रहा है। वह केवल पाकिस्तान पर निर्भर रहने के बजाय कई देशों के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग बढ़ा रहा है। इसके साथ ही पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट ने उसकी रणनीतिक विश्वसनीयता को कुछ हद तक प्रभावित किया है।
इसी पृष्ठभूमि में सऊदी अरब और पाकिस्तान का रक्षा सहयोग आज भी महत्वपूर्ण है, पर वह पहले जैसा एकतरफा और निर्णायक प्रभाव नहीं रखता। यह सहयोग अब अधिक संतुलित और सीमित दायरे में संचालित हो रहा है।
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क्या भारत–यूएई समझौता एक रणनीतिक संतुलन है?
भारत–यूएई रक्षा समझौते को पाकिस्तान–सऊदी डिफ़ेंस डील का “जवाब” कहने से पहले यह समझना आवश्यक है कि आधुनिक कूटनीति अब प्रतिक्रिया से अधिक संतुलन पर आधारित है। भारत ने यूएई के साथ समझौता किसी एक देश के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने दीर्घकालिक सुरक्षा हितों को ध्यान में रखकर किया है।
हालाँकि, यह भी सत्य है कि इस समझौते से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर प्रभाव पड़ता है। पाकिस्तान लंबे समय तक यह मानता रहा कि खाड़ी देशों में उसकी विशेष रणनीतिक स्थिति है, परंतु भारत–यूएई की बढ़ती नज़दीकी उस धारणा को चुनौती देती है। इससे यह संदेश जाता है कि भारत अब केवल दक्षिण एशिया तक सीमित शक्ति नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया की सुरक्षा संरचना का भी एक महत्वपूर्ण भागीदार बन चुका है।
यूएई के लिए भारत के साथ रक्षा सहयोग यह दर्शाता है कि वह क्षेत्रीय राजनीति को केवल धार्मिक या पारंपरिक मित्रताओं से नहीं, बल्कि बहुआयामी हितों से देखता है। यह रुख अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान की रणनीतिक एकाधिकार भावना को कमजोर करता है, भले ही इसका उद्देश्य सीधे पाकिस्तान को चुनौती देना न हो।
भविष्य की दिशा और क्षेत्रीय राजनीति
आने वाले वर्षों में भारत–यूएई सहयोग केवल सैन्य अभ्यास या रक्षा समझौतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रक्षा उत्पादन, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष सहयोग और समुद्री निगरानी जैसे क्षेत्रों तक विस्तारित हो सकता है। यह साझेदारी भारत को पश्चिम एशिया में एक विश्वसनीय सुरक्षा भागीदार के रूप में स्थापित करती है।
वहीं पाकिस्तान और सऊदी अरब का रिश्ता भी बना रहेगा, पर वह अब एकमात्र विकल्प नहीं रहेगा। खाड़ी देशों की रणनीति बहु-ध्रुवीय होती जा रही है, जहाँ वे एक साथ कई देशों से संतुलित संबंध रखना चाहते हैं।
इस पूरे परिदृश्य में भारत–यूएई समझौता किसी एक डील का प्रत्यक्ष जवाब कम, और बदलती वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती भूमिका का संकेत अधिक है। यह भारत के आत्मविश्वास, कूटनीतिक परिपक्वता और रणनीतिक विस्तार का प्रतीक है।
भारत और यूएई का समझौता पाकिस्तान–सऊदी डिफ़ेंस डील का सीधा जवाब नहीं, बल्कि उससे कहीं व्यापक रणनीतिक सोच का परिणाम है। यह समझौता भारत की उस नीति को दर्शाता है, जिसमें वह प्रतिक्रिया से अधिक संतुलन, और विरोध से अधिक साझेदारी को महत्व देता है। यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिश्ते स्थायी नहीं, बल्कि हित स्थायी होते हैं। और भारत, इन हितों की नई परिभाषा गढ़ते हुए, धीरे-धीरे वैश्विक मंच पर एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभर रहा|
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