डेलीबार्ता, विशेष- भारत की न्यायिक व्यवस्था के इतिहास में साल 2025 एक बेहद अहम पड़ाव बनकर दर्ज हो गया है। केरल की रहने वाली महज 24 साल की थान्या नाथन सी. ने वह कर दिखाया, जो अब तक बहुत कम लोगों के लिए संभव माना जाता था। 100 प्रतिशत दृष्टिबाधित होने के बावजूद थान्या नाथन ने 2025 सिविल जज (जूनियर डिविजन) परीक्षा में पहला स्थान हासिल कर इतिहास रच दिया। यह उपलब्धि न केवल उनकी व्यक्तिगत जीत है, बल्कि यह भारत में दिव्यांग अधिकारों, न्यायिक समानता और समावेशी सोच की दिशा में एक बड़ा कदम भी मानी जा रही है।
केरल की पहली और देश की दूसरी पूरी तरह ब्लाइंड जज
थान्या नाथन अब केरल की पहली पूर्ण रूप से दृष्टिबाधित महिला जज बनने जा रही हैं। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो वह 2019 में राजस्थान के ब्रह्मानंद शर्मा के बाद देश की दूसरी पूरी तरह ब्लाइंड जज हैं।
उनकी यह सफलता बताती है कि शारीरिक सीमाएं किसी की योग्यता, क्षमता और संकल्प को सीमित नहीं कर सकती हैं।
जानिए कौन हैं थान्या नाथन? एक सामान्य परिवार से असाधारण मुकाम तक का सफर
थान्या नाथन सी. का जन्म केरल में हुआ। बचपन से ही वह 100 प्रतिशत दृष्टिबाधित हैं, लेकिन पढ़ाई और सीखने की जिज्ञासा में उन्होंने कभी अपनी इस चुनौती को बाधा नहीं बनने दिया।
उन्होंने कन्नूर यूनिवर्सिटी से 2024 में लॉ की पढ़ाई पूरी की, और उसी वर्ष वकील के रूप में प्रैक्टिस शुरू की। बहुत कम समय में उन्होंने यह तय कर लिया था कि उनका लक्ष्य सिर्फ वकालत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वह न्याय की कुर्सी तक पहुंचना चाहती हैं।
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वकालत के साथ जज बनने की तैयारी, आसान नहीं था सफर
थान्या नाथन ने बताया कि 2024 में वकील बनने के बाद ही उन्होंने सिविल जज परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी थी।
खास बात यह रही कि उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ अपनी वकालत भी जारी रखी। उनके मुताबिक, “दोनों काम एक साथ करने से कभी दबाव महसूस नहीं हुआ, लेकिन मन में कई शंकाएं जरूर थीं।”
ये शंकाएं सिर्फ पढ़ाई को लेकर नहीं थीं, बल्कि सिस्टम को लेकर थीं कि क्या उन्हें परीक्षा में बैठने दिया जाएगा?
क्या दृष्टिबाधित होना जज बनने में बाधा बनेगा?
क्या कानून की दुनिया उन्हें स्वीकार करेगी?
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला बना उम्मीद की किरण
थान्या नाथन की इस सफलता के पीछे सुप्रीम कोर्ट का 2025 का ऐतिहासिक फैसला एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इस फैसले में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि
“दृष्टिबाधित या दिव्यांग होना किसी भी उम्मीदवार को न्यायिक सेवा से अयोग्य नहीं ठहरा सकता।”
जब ज्यूडिशल सर्विस परीक्षा का नोटिफिकेशन आया, तब थान्या ने बिना हिचक आवेदन कर दिया।
उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने वास्तव में उनके लिए परीक्षा में बैठने का रास्ता खोल दिया।
पढ़ाई की सबसे बड़ी चुनौती,स्टडी मटीरियल की कमी
जहां सामान्य छात्र किताबों, नोट्स और कोचिंग मटीरियल तक आसानी से पहुंच बना लेते हैं, वहीं दृष्टिबाधित छात्रों के लिए यह सफर कहीं ज्यादा कठिन होता है। थान्या बताती हैं कि ब्रेल या ऑडियो फॉर्मेट में स्टडी मटीरियल बेहद सीमित है। कई जरूरी किताबें सुलभ ही नहीं हैं।
ऑनलाइन सामग्री पर अत्यधिक निर्भरता रहती है, जो पर्याप्त नहीं होती उनके शब्दों में,“देखने में सक्षम स्टूडेंट जो चाहें पढ़ सकते हैं, लेकिन हमारे पास विकल्प बहुत सीमित होते हैं।
”फिर भी नहीं मानी हार, अवसरों का किया पूरा उपयोग
इन तमाम सीमाओं के बावजूद थान्या नाथन खुद को खुशकिस्मत मानती हैं कि उन्हें क्लासरूम में बराबरी का मौका मिला अपनी क्षमताओं को निखारने के अवसर मिले। ज्यूडिशल रिक्रूटमेंट प्रोसेस पूरी तरह फेयर लगा। उनका मानना है कि संस्थागत सहयोग और सकारात्मक सोच किसी भी दिव्यांग व्यक्ति के लिए चमत्कार कर सकती है।
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ज्यूडिशल रिक्रूटमेंट प्रोसेस पर क्या कहती हैं थान्या
थान्या नाथन ने केरल ज्यूडिशल सर्विस की भर्ती प्रक्रिया को “फेयर और परफेक्ट” बताया। उनके अनुसार, चयन प्रक्रिया में कहीं भी पक्षपात या भेदभाव महसूस नहीं हुआ। वह कहती हैं कि “नियम और व्यवस्था तभी सफल होती है, जब उसे लागू करने वाले लोग भी संवेदनशील हों।”
दिव्यांग अधिकारों पर बड़ा संदेश, सोच बदले बिना सिस्टम नहीं बदलेगा
थान्या नाथन केवल जज नहीं बनना चाहतीं, बल्कि वह समाज की सोच में बदलाव की पक्षधर भी हैं।
उनका मानना है कि “हम इन्फ्रास्ट्रक्चर बना सकते हैं, लेकिन जब तक लोगों का नजरिया नहीं बदलेगा, तब तक असली बदलाव नहीं आएगा।”
वह कहती हैं कि जीवन के हर क्षेत्र में एक्सेसिबिलिटी होनी चाहिए चाहे वह शिक्षा हो, नौकरी हो या न्याय व्यवस्था।
दिव्यांग वकीलों के लिए प्रेरणा की मिसाल
थान्या नाथन का मानना है कि दिव्यांग वकीलों को न्यायपालिका में आने से डरना नहीं चाहिए। उनकी यह सफलता उन हजारों युवाओं के लिए संदेश है, जो अपनी शारीरिक सीमाओं के कारण अपने सपनों को अधूरा छोड़ देते हैं।
एक व्यक्ति नहीं, एक सोच की जीत
थान्या नाथन की यह कामयाबी सिर्फ एक परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है। यह कहानी है आत्मविश्वास की, संवैधानिक अधिकारों की,और उस भारत की, जो धीरे-धीरे समावेशी बन रहा है। उनकी सफलता साबित करती है कि न्याय की कुर्सी पर बैठने के लिए आंखों से ज्यादा जरूरी है निष्पक्ष दृष्टिकोण।
थान्या नाथन ने बदल दी परिभाषा
थान्या नाथन ने यह साबित कर दिया है कि नज़र का न होना कमजोरी नहीं, अगर नज़रिया मजबूत हो। उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए न केवल प्रेरणा बनेगी, बल्कि यह सवाल भी उठाएगी कि समाज कब तक योग्यता से ज्यादा अक्षमता को देखता रहेगा। थान्या नाथन आज सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि न्याय, समानता और साहस का प्रतीक बन चुकी हैं।
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