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Uddhav Thackeray Political Crisis: दूसरी बगावत के बाद कितनी कमजोर हुई उद्धव ठाकरे की सियासत?

Uddhav Thackeray Political Crisis: दूसरी बगावत के बाद कितनी कमजोर हुई उद्धव ठाकरे की सियासत?
नवजोत कौर सिद्धू
On: जून 22, 2026 4:12 अपराह्न
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महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा बदलाव देखने को मिला है। शिवसेना (यूबीटी) के छह लोकसभा सांसदों के अलग होकर एकनाथ शिंदे का साथ देने से उद्धव ठाकरे की राजनीतिक स्थिति पर नए सवाल खड़े हो गए हैं। इस घटनाक्रम का असर केवल उनकी पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि महाविकास अघाड़ी (MVA) के भीतर शक्ति संतुलन पर भी पड़ सकता है।

दूसरी बगावत ने बढ़ाई उद्धव ठाकरे की मुश्किलें

2022 में एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद उद्धव ठाकरे को सत्ता और मूल शिवसेना दोनों से हाथ धोना पड़ा था। इसके बाद उन्होंने शिवसेना (यूबीटी) के रूप में संगठन को दोबारा खड़ा किया और 2024 के लोकसभा चुनाव में नौ सीटें जीतने में सफलता हासिल की।

अब पार्टी के नौ में से छह सांसदों के शिंदे गुट के साथ जाने से उद्धव ठाकरे के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है।

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डैमेज कंट्रोल की कोशिश नहीं आई काम

सांसदों के असंतोष की खबरों के बीच उद्धव ठाकरे ने उन्हें मनाने का प्रयास भी किया। बताया गया कि उन्होंने निंबालकर से बातचीत के लिए सांसद कैलास पाटिल और विधायक वरुण सरदेसाई को भेजा था।

हालांकि, निंबालकर ने कहा कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से उद्धव ठाकरे से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने एकनाथ शिंदे के प्रस्ताव पर विचार किया। बाद में वह शिंदे गुट के नेताओं के साथ धाराशिव के लिए रवाना हो गए।

अपने गांव गोवर्धन वाड़ी में समर्थकों से मुलाकात के बाद निंबालकर ने कहा कि विपक्ष में रहकर अपने राजनीतिक विरोधियों का मुकाबला करना कठिन हो गया है क्योंकि उन्हें सत्ताधारी भाजपा का समर्थन प्राप्त है। उन्होंने यह भी कहा कि उनका फैसला सत्ता या धन के लालच में नहीं बल्कि अपने राजनीतिक भविष्य और क्षेत्र के विकास को ध्यान में रखकर लिया गया है।

Uddhav Thackeray

लोकसभा में घटी पार्टी की ताकत

लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी) की संख्या अब काफी कम हो गई है। पहले पार्टी के पास नौ सांसद थे, लेकिन छह सांसदों के अलग होने के बाद अब केवल तीन सांसद ही बचे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी गठबंधन में संख्या बल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में संसद में घटती ताकत का असर भविष्य की राजनीतिक बातचीत और निर्णयों पर भी पड़ सकता है।

महाविकास अघाड़ी में बदल सकते हैं समीकरण

2019 में महाविकास अघाड़ी के गठन के समय उद्धव ठाकरे गठबंधन के प्रमुख नेता थे और मुख्यमंत्री भी बने थे।

हालिया राजनीतिक घटनाक्रम के बाद कांग्रेस को गठबंधन के भीतर अधिक प्रभावशाली भूमिका मिलने की संभावना जताई जा रही है। राष्ट्रीय पार्टी होने के कारण कांग्रेस पहले से अधिक मजबूत स्थिति में दिखाई दे सकती है, जिससे गठबंधन के भीतर उद्धव ठाकरे की राजनीतिक भूमिका प्रभावित हो सकती है।

पहचान और संगठन दोनों बड़ी चुनौती

चुनाव आयोग द्वारा मूल शिवसेना का नाम और ‘तीर-कमान’ चुनाव चिन्ह एकनाथ शिंदे गुट को मिलने के बाद उद्धव ठाकरे को ‘मशाल’ चुनाव चिन्ह के साथ नई शुरुआत करनी पड़ी थी।

सहानुभूति की लहर और नए संगठन के दम पर पार्टी ने लोकसभा चुनाव में नौ सीटें जीतीं, लेकिन अब सांसदों के अलग होने के बाद संगठन को दोबारा मजबूत करना उनके सामने बड़ी चुनौती बन गया है।

मुंबई और कोंकण में भी बढ़ी चुनौती

शिवसेना का पारंपरिक आधार लंबे समय तक मुंबई, ठाणे और कोंकण क्षेत्र रहा है। पहले विधायकों और स्थानीय नेताओं के अलग होने से संगठन को नुकसान हुआ था।

अब सांसदों के अलग होने के बाद इन इलाकों में भी पार्टी की राजनीतिक स्थिति पर असर पड़ने की चर्चा तेज हो गई है। मुंबई उत्तर-पूर्व से सांसद संजय पाटिल का शिंदे गुट के साथ जाना भी उद्धव ठाकरे के लिए एक महत्वपूर्ण झटका माना जा रहा है।

क्या घटेगी उद्धव ठाकरे की Bargaining Power?

गठबंधन की राजनीति में किसी भी दल की ताकत उसके जनाधार और संख्या बल से तय होती है। सांसदों की संख्या घटने के बाद महाविकास अघाड़ी के भीतर उद्धव ठाकरे की राजनीतिक स्थिति पहले की तुलना में कमजोर मानी जा रही है।

हालांकि, उनकी भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आने वाले समय में यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपने समर्थकों की सहानुभूति को चुनावी समर्थन में कितना बदल पाते हैं और संगठन को कितनी मजबूती से फिर खड़ा कर पाते हैं।

Conclusion

शिवसेना (यूबीटी) में दूसरी बड़ी टूट ने महाराष्ट्र की राजनीति को एक बार फिर नई दिशा दे दी है। लोकसभा में घटती संख्या और संगठनात्मक चुनौतियों के बीच उद्धव ठाकरे के सामने अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखना आसान नहीं होगा। आने वाले विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनाव यह तय करेंगे कि वह इस संकट से उबर पाते हैं या नहीं।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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