डेलीबार्ता,नई दिल्ली। जिन हिमालयी राज्यों में सर्दियों के मौसम में बर्फबारी आम बात हुआ करती थी, वहां अब जंगलों की आग चिंता का सबसे बड़ा कारण बनती जा रही है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में दशकों से यह देखा जाता रहा है कि जंगलों में आग मुख्य रूप से गर्मियों के महीनों में लगती है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यह स्थापित चक्र पूरी तरह टूटता नजर आ रहा है।
इस बार सर्दियों में ही पहाड़ों के जंगल धधक रहे हैं। वैज्ञानिकों और वन अधिकारियों का कहना है कि यह कोई असामान्य या इक्का-दुक्का घटना नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के कारण बदलते पारिस्थितिक तंत्र का गंभीर और खतरनाक संकेत है।
उत्तराखंड में सबसे ज्यादा फायर अलर्ट
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) के ताजा आंकड़े इस बदलते पैटर्न की गंभीरता को साफ तौर पर दिखाते हैं। सर्दियों का मौसम शुरू होने के बाद 1 नवंबर से अब तक उत्तराखंड में देश में सबसे ज्यादा 1,756 फायर अलर्ट दर्ज किए गए हैं। यह आंकड़ा इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि उत्तराखंड ने इस मामले में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों को पीछे छोड़ दिया है, जिन्हें पारंपरिक रूप से जंगल की आग के लिए ज्यादा संवेदनशील माना जाता रहा है।
वन अधिकारियों के अनुसार, आमतौर पर नवंबर से फरवरी के बीच उत्तराखंड के जंगलों में आग की घटनाएं बेहद कम होती थीं, लेकिन इस बार स्थिति पूरी तरह उलट है।
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जंगल की आग अब बनती जा रही सामान्य घटना
देशभर में जंगल की आग के बदलते स्वरूप पर पांच साल तक अध्ययन करने वाले देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान (FRI) के वरिष्ठ वैज्ञानिक अमित कुमार वर्मा का कहना है कि जंगल की आग को अब केवल मौसमी घटना मानकर नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार,“जंगल की आग एक हद तक प्राकृतिक चक्र का हिस्सा है, लेकिन जलवायु परिवर्तनशीलता ने इस चक्र को न केवल छोटा कर दिया है, बल्कि इसे कहीं ज्यादा तीव्र और खतरनाक बना दिया है।”
वैज्ञानिकों का मानना है कि सर्दियों में लगने वाली आग इस बात का संकेत है कि हिमालयी क्षेत्र तेजी से सूख रहा है, जो भविष्य के लिए बेहद चिंताजनक है।
हिमाचल प्रदेश में भी बढ़ी आग की घटनाएं
उत्तराखंड की तरह ही हिमाचल प्रदेश में भी जंगलों में आग का तांडव देखने को मिल रहा है। पिछले साल अक्टूबर के पहले सप्ताह से राज्य के अधिकांश हिस्सों में बारिश लगभग न के बराबर हुई है। कुल्लू, मंडी, शिमला और चंबा जैसे प्रमुख सेब उत्पादक इलाकों में इस बार हिमपात बेहद कम दर्ज किया गया। बर्फबारी की कमी के कारण जंगलों में नमी नहीं बन पाई और सूखी पत्तियां तथा घास आग के लिए अनुकूल ईंधन बन गईं।
शिमला वन क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित
राज्य वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में सबसे ज्यादा जंगल की आग की घटनाएं शिमला वन क्षेत्र में दर्ज की गई हैं।
- शिमला वन क्षेत्र – 62 घटनाएं
- रामपुर – 16
- मंडी – 8
- ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क (कुल्लू) – 6
- चंबा और कुल्लू – 4-4
- बिलासपुर और वन्यजीव (दक्षिण) क्षेत्र – 2-2
इन आंकड़ों से साफ है कि राज्य के लगभग हर वन क्षेत्र पर आग का खतरा मंडरा रहा है।
कश्मीर में भी कम हुई बर्फबारी
जम्मू-कश्मीर की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। कश्मीर घाटी में इस बार औसत से करीब 40 प्रतिशत कम बर्फबारी दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बर्फबारी न केवल पानी का स्रोत होती है, बल्कि यह जंगलों में नमी बनाए रखने का भी काम करती है। बर्फ की कमी के कारण जंगलों की जमीन जल्दी सूख रही है, जिससे आग लगने का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
अत्यधिक सूखापन:-जंगल में आग लगने का सबसे बड़ा कारण
विशेषज्ञों और वन अधिकारियों के मुताबिक, इस बार जंगलों में आग लगने का सबसे बड़ा कारण अत्यधिक शुष्कता है।उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में अक्टूबर के बाद से नाममात्र की बारिश कश्मीर में सामान्य से काफी कम बर्फबारी,मिट्टी में नमी की भारी कमी इन हालातों में जंगल में गिरी सूखी पत्तियां और घास बारूद की तरह काम कर रही हैं। ऐसे में एक छोटी सी चिंगारी भी आग को विकराल रूप दे देती है।
मानवीय गतिविधियां भी जिम्मेदार
विशेषज्ञ मानते हैं कि जंगल की आग के पीछे सिर्फ प्राकृतिक कारण ही नहीं, बल्कि मानवीय गतिविधियां भी बड़ी वजह हैं।
कई ऊंचाई वाले इलाकों में शिकारी कस्तूरी मृग जैसे दुर्लभ जानवरों को घेरने के लिए जानबूझकर जंगल में आग लगा देते हैं। यह आग नियंत्रण से बाहर होकर बड़े क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेती है।
खेती और ग्रामीण गतिविधियों का असर
वन अधिकारियों के अनुसार, जंगलों के आसपास रहने वाले कुछ ग्रामीण भी अनजाने में आग फैलाने का कारण बन जाते हैं। इसके पीछे कई वजहें सामने आई हैं।
- जंगल के किनारे स्थित खेतों में पराली जलाना
- जैव-द्रव्यमान और ठोस कचरे को जलाना
- मवेशियों के लिए नई घास उगाने के उद्देश्य से जंगल की जमीन में आग लगाना
- ये छोटी-छोटी आगें सूखे मौसम में तेजी से फैलकर जंगल की आग का रूप ले लेती हैं।
- सर्दियों में आग के घातक परिणाम
वैज्ञानिकों का कहना है कि सर्दियों में लगने वाली आग गर्मियों की तुलना में कहीं ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकती है। इस मौसम में जंगलों में मौजूद कीड़े, छोटे जीव और पौधों की नई कोपलें नष्ट हो जाती हैं, जिससे पूरा पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित होता है। इसके अलावा
- मिट्टी की ऊपरी परत जल जाती है।
- जल स्रोतों पर नकारात्मक असर पड़ता है।
- जैव विविधता को लंबे समय तक नुकसान पहुंचता है।
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हिमालयी पारिस्थितिकी पर खतरा
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि वन प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन पर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया, तो हिमालय का नाजुक पारिस्थितिक तंत्र स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकता है। हिमालय न केवल लाखों लोगों के लिए जल स्रोत है, बल्कि यह पूरे उत्तर भारत की जलवायु को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाता है। जंगलों की लगातार आग इस संतुलन को बिगाड़ सकती है।
वन प्रबंधन पर भी उठ रहे सवाल
लगातार बढ़ती आग की घटनाओं ने वन प्रबंधन की तैयारियों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते मौसम को देखते हुए आग से निपटने की रणनीति में बदलाव जरूरी है।
अब केवल गर्मियों के लिए तैयारियां करना पर्याप्त नहीं होगा। सर्दियों में भी निगरानी, फायर लाइन का रखरखाव और स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी हो गई है।
जलवायु परिवर्तन की स्पष्ट चेतावनी
वैज्ञानिक मानते हैं कि हिमालय में सर्दियों के दौरान जंगलों का जलना जलवायु परिवर्तन की सबसे स्पष्ट चेतावनियों में से एक है। अगर जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में बर्फबारी और बारिश का यह असंतुलन और गहराता जाएगा, जिससे जंगल की आग आम बात बन सकती है।
बदल रहा प्राकृतिक संतुलन
बर्फ से ढके पहाड़ों की जगह जलते जंगलों की तस्वीर हिमालय के बदलते भविष्य की कहानी कह रही है। उत्तराखंड से हिमाचल और कश्मीर तक सर्दियों में फैलती जंगल की आग यह साफ संकेत दे रही है कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है। यह केवल वन विभाग या वैज्ञानिकों की चिंता का विषय नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। यदि समय रहते जलवायु परिवर्तन के असर को समझकर ठोस नीति और प्रभावी वन प्रबंधन नहीं किया गया, तो हिमालय की हरियाली और जैव विविधता गंभीर संकट में पड़ सकती है।







