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Vande Mataram Debate in Parliament— संसद में वन्दे मातरम् पर विशेष चर्चा

संसद में वन्दे मातरम् पर विशेष चर्चा
नवजोत कौर सिद्धू
On: दिसम्बर 9, 2025 6:46 अपराह्न
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भारत की संसद में आज का दिन ऐतिहासिक और भावनात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। वन्दे मातरम्—जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक और राष्ट्रीय चेतना का स्त्रोत रहा है—उस पर संसद के दोनों सदनों में विशेष चर्चा आयोजित की गई। यह चर्चा न केवल राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थी, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रभक्ति की भावना को भी केंद्र में लेकर आई।

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संसद में वन्दे मातरम्: इतिहास, विवाद और राष्ट्रभावना का सवाल

आज संसद के शीतकालीन सत्र में “वन्दे मातरम्” के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर एक विशेष चर्चा आयोजित की गई। यह चर्चा न केवल एक साहित्यिक और सांस्कृतिक मुद्दा थी, बल्कि यह राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील रही, क्योंकि वन्दे मातरम् देश की राष्ट्रीय पहचान और स्वाभिमान से जुड़ा हुआ है।

वन्दे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों की आवाज और प्रेरणा रहा। रवींद्रनाथ टैगोर, अरविंदो, तिलक, लाला लाजपत राय जैसे अनेक नेताओं ने इसे राष्ट्रीय प्रतिरोध का प्रतीक माना। बंगाल के विभाजन के समय आंदोलनकारियों की रैलियाँ इसी गीत की आवाज से गूंज उठती थीं।

आज जब इस गीत के 150 वर्ष पूरे हुए, तो संसद में इसके महत्व को याद करने और इसे राष्ट्रीय पहचान के केंद्र में पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया गया।

चर्चा का केंद्र: भावनाएँ बनाम राजनीति

संसद में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान विभिन्न दलों ने अपनी-अपनी राय रखी।

सत्तापक्ष का पक्ष

सत्तापक्ष ने कहा कि वन्दे मातरम् भारत की संस्कृति, इतिहास और राष्ट्रभक्ति का शाश्वत प्रतीक है।

  • यह केवल साहित्य नहीं, बल्कि देशभक्ति की जड़ें मजबूत करने वाली एक धरोहर है।
  • प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि यह गीत “भारत माता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता” का भाव है।
  • उन्होंने यह भी कहा कि आज की पीढ़ी को इस गीत के ऐतिहासिक महत्व से दोबारा परिचित करवाना ज़रूरी है।

विपक्ष की प्रतिक्रिया

विपक्ष ने भी इस गीत के महत्व को स्वीकार किया, लेकिन इसे “राजनीतिक रंग देने” पर आपत्ति जताई।

  • विपक्षी दलों का कहना था कि वन्दे मातरम् एक सांस्कृतिक विरासत है, जिसे किसी एक विचारधारा या दल का नहीं बनाया जाना चाहिए।
  • कुछ सदस्यों ने यह भी कहा कि सरकार को सामाजिक समरसता की भावना के तहत इस विषय पर संवाद बढ़ाना चाहिए।

इस तरह, चर्चा में दोनों पक्षों की सहमति और असहमति का संतुलन देखने को मिला।

वन्दे मातरम् और धर्मनिरपेक्षता का सवाल

चूंकि वन्दे मातरम् का पहला भाग भारत का राष्ट्रगीत है, लेकिन इसके आगे के कुछ अंशों को लेकर लंबे समय से विवाद होते रहे हैं।

कुछ समूह इस गीत के कुछ हिस्सों को धार्मिक आधार पर आपत्तिजनक मानते हैं, क्योंकि इसमें माता सरस्वती और देवी-देवताओं का वर्णन आता है।

हालाँकि, संसद के बड़े हिस्से का मानना था कि—

  • वन्दे मातरम् भारत भूमि के प्रति सम्मान का प्रतीक है
  • यह धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी गीत है
  • इसे विभाजनकारी दृष्टि से देखने की बजाय एकता के प्रतीक के रूप में अपनाया जाना चाहिए

शिक्षा और युवा पीढ़ी में वन्दे मातरम् की भूमिका

चर्चा में यह भी प्रस्ताव रखा गया कि देशभर के स्कूल और कॉलेजों में वन्दे मातरम् के इतिहास और उसके योगदान को पढ़ाया जाना चाहिए।

  • यह गीत युवाओं में राष्ट्रभक्ति का उत्साह जगाता है
  • यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है
  • आने वाली पीढ़ी को यह ज्ञात होना चाहिए कि उनके पूर्वजों ने इस गीत के साथ किस प्रकार संघर्ष किया

साथ ही, कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया कि

  • विद्यालयों में सप्ताह में कम से कम एक बार वन्दे मातरम् गाया जाए
  • सांस्कृतिक गतिविधियों में इसे शामिल किया जाए
  • इसके साहित्यिक और ऐतिहासिक पहलुओं पर व्याख्यान आयोजित किए जाएँ

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

वन्दे मातरम् भारतीय संस्कृति में एक पवित्र स्थान रखता है। इसके शब्द केवल गीत नहीं, बल्कि एक गहरी भावनात्मक अनुभूति पैदा करते हैं—

  • इसमें भारत के प्राकृतिक सौंदर्य, नदियों, खेत-खलिहानों और मातृभूमि की महिमा का वर्णन है
  • यह किसान, मजदूर, युवा और सैनिक सभी को एक सूत्र में जोड़ता है
  • यह राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है

संसद में कई सदस्यों ने यह भी कहा कि वन्दे मातरम् भारतीय आत्मा की आवाज है, जो समय बदलने के बावजूद आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

निष्कर्ष: विरासत को संजोने का संकल्प

आज संसद में हुई चर्चा केवल एक ऐतिहासिक स्मरण नहीं, बल्कि आधुनिक भारत को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रयास भी था।

वन्दे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर यह संदेश दिया गया कि—

  • यह गीत राजनीति से परे है
  • यह भारतीय अस्मिता का आधार है
  • और इसे आने वाली पीढ़ियों तक उसी गर्व और सम्मान के साथ पहुँचाना हमारी जिम्मेदारी है

संसद में हुई चर्चा ने स्पष्ट कर दिया कि वन्दे मातरम् भारत की आत्मा में बसा हुआ है, और यह देश की एकता, स्वतंत्रता और गौरव का शाश्वत प्रतीक बना रहेगा।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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