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वंदे मातरम: पीएम मोदी और प्रियंका गांधी ने नेहरू पर क्या कहा, ओवैसी बोले—वफ़ादारी का सर्टिफ़िकेट न मांगा जाए

नवजोत कौर सिद्धू
On: दिसम्बर 10, 2025 7:11 अपराह्न
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वंदे मातरम विवाद ने फिर गरमाया राजनीतिक माहौल

वंदे मातरम को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गर्म हो गई है। संसद से लेकर सड़कों तक इस मुद्दे पर बयानबाज़ी तेज़ हो गई है। मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, प्रियंका गांधी और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अलग-अलग संदर्भों में इसे लेकर प्रतिक्रिया दी। नेहरू के ऐतिहासिक रुख से लेकर आज की राजनीतिक टिप्पणियों तक, यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गया है।

वंदे मातरम पीएम मोदी और प्रियंका गांधी

पीएम मोदी का सीधा निशाना: “नेहरू ने वंदे मातरम को कमजोर किया”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि देश की आज़ादी के आंदोलन में वंदे मातरम की भूमिका को कभी नकारा नहीं जा सकता, लेकिन स्वतंत्रता के बाद इसे वह स्थान नहीं दिया गया, जिसका यह हकदार था।

पीएम मोदी ने अपने भाषण में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का संदर्भ देते हुए कहा कि नेहरू और तत्कालीन नेतृत्व की हिचक ने वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा मिलने से रोक दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय राजनीतिक कारणों से राष्ट्र की भावनाओं को पर्याप्त सम्मान नहीं दिया गया। मोदी का बयान इस ओर संकेत करता है कि वर्तमान सरकार वंदे मातरम को सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी पहचान के महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में लगातार आगे बढ़ाना चाहती है।

प्रियंका गांधी की प्रतिक्रिया: “वंदे मातरम पर कोई विवाद नहीं, नेहरू को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है”

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने मोदी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम कांग्रेस के नेताओं की प्रेरणा का स्रोत रहा है और पार्टी की विचारधारा के केंद्र में हमेशा से देशभक्ति रही है। प्रियंका गांधी ने यह भी कहा कि नेहरू को बार-बार गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। उनके अनुसार, नेहरू न सिर्फ वंदे मातरम का सम्मान करते थे, बल्कि आज़ादी के दिनों में इसे लेकर कई कार्यक्रमों में शामिल भी रहे। प्रियंका ने कहा कि देश को बांटने वाली राजनीति करने के बजाय सत्ताधारी दल को यह स्वीकार करना चाहिए कि भारत की स्वतंत्रता का संघर्ष एक साझा प्रयास था, जिसमें सभी ने अपना योगदान दिया।

ओवैसी का बयान: “देशभक्ति का सर्टिफ़िकेट लेना या देना बंद होना चाहिए”

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस बहस में एक अलग रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम का सम्मान हर नागरिक करता है, लेकिन इसे किसी की देशभक्ति की कसौटी बनाना गलत है। ओवैसी ने कहा कि भारत का संविधान हर धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को सम्मान देता है, और किसी नागरिक से वफादारी का सर्टिफ़िकेट मांगना लोकतांत्रिक मूल्य को कमजोर करता है। ओवैसी ने इस बहस को अनावश्यक बताया और कहा कि सरकार को जरूरी मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए, न कि राष्ट्रवाद के नाम पर समाज में विभाजन पैदा करना चाहिए।
उनके बयान के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई, जहां लोग दोनों पक्षों में अपनी राय रख रहे हैं।

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वंदे मातरम का ऐतिहासिक संदर्भ फिर चर्चा में

इन बयानों के बीच वंदे मातरम का ऐतिहासिक महत्व भी चर्चा में है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत बंगाल के नवजागरण से लेकर 1905 के स्वदेशी आंदोलन तक एक बड़ी प्रेरणाशक्ति रहा।

आजादी के संघर्ष में वंदे मातरम ने लाखों क्रांतिकारियों को एकजुट किया। कई इतिहासकार इस बात पर जोर देते हैं कि भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में वंदे मातरम और गांधीजी के नेतृत्व में गाए जाने वाले अन्य देशभक्ति गीतों ने जनता को सशक्त बनाया और स्वतंत्रता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को मजबूत किया।

लेकिन स्वतंत्रता के बाद इसे राष्ट्रगीत का दर्जा देने पर संशय और राजनीतिक हिचकिचाहट ने इसे आधिकारिक रूप से दूसरे स्थान पर रखा, जबकि जनमानस में इसकी भावनात्मक ताकत आज भी बरकरार है।

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राजनीतिक दलों की अपनी-अपनी व्याख्याएँ

बीजेपी का दावा है कि वंदे मातरम भारतीय संस्कृति का मूल है और इसे लेकर संकोच दिखाना राजनीतिक मजबूरी का परिणाम है। पार्टी राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने के लिए इसका व्यापक प्रचार करती है।

हीं कांग्रेस का मानना है कि बीजेपी इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करती है और नेहरू जैसे नेताओं की भूमिका को कमतर दिखाने की कोशिश करती है। कांग्रेस यह तर्क देती है कि नेहरू के विचार बहुलतावाद और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित थे, और वे किसी भी प्रतीक को धार्मिक विवादों में उलझा कर नहीं देखना चाहते थे। ओवैसी और अन्य विपक्षी दल इसे सत्ता पक्ष की राजनीतिक रणनीति बताते हैं, जिसमें राष्ट्रीय मुद्दों को भावनात्मक चश्मे से दिखाकर जनता का ध्यान वास्तविक समस्याओं से हटाने की कोशिश की जाती है।

सोशल मीडिया पर तेज बहस

पीएम मोदी, प्रियंका गांधी और ओवैसी के बयानों के बाद सोशल मीडिया पर यह मुद्दा ट्रेंड करने लगा। कुछ लोग मानते हैं कि वंदे मातरम को राजनीति से ऊपर उठाकर देखा जाना चाहिए, जबकि कुछ का कहना है कि इसे राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बनाना चाहिए, न कि विवाद का विषय। समर्थक और आलोचक दोनों ही विचार रख रहे हैं कि राष्ट्रवाद के मुद्दों पर राजनीति की तीव्रता बढ़ने से समाज में नए तनाव पैदा हो सकते हैं। जहां एक वर्ग मोदी के रुख को सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में कदम बताता है, वहीं अन्य इसे चुनावी नैरेटिव बताकर खारिज कर रहा है।

आगे क्या? बहस के कई आयाम

वंदे मातरम को लेकर चल रही यह बहस आने वाले दिनों में और भी तेज हो सकती है, क्योंकि इसे केवल सांस्कृतिक प्रतीक नहीं बल्कि राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना दिया गया है। आने वाले चुनावों के मद्देनजर यह मुद्दा कई मंचों पर सुर्खियों में रहने की पूरी संभावना है।
विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों ही इसे अपने-अपने तरीके से जनता तक पहुंचाने की कोशिश करेंगे। एक तरफ बीजेपी इसे राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक गौरव से जोड़कर पेश कर सकती है, वहीं विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों के दृष्टिकोण से उठाने की कोशिश करेगा।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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