हाल के दिनों में फर्जी नंबर प्लेट और नंबर प्लेट क्लोनिंग के मामलों ने वाहन पंजीकरण व्यवस्था को फिर चर्चा में ला दिया है। ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि गाड़ियों पर नंबर प्लेट लगाने की शुरुआत कब हुई, इसका उद्देश्य क्या था और समय के साथ इसमें क्या बदलाव हुए।
फर्जी नंबर प्लेट पर बढ़ी सख्ती
देश के कई हिस्सों में पुलिस फर्जी नंबर प्लेट, क्लोनिंग और वाहन पहचान से छेड़छाड़ करने वाले मामलों पर लगातार कार्रवाई कर रही है। इसी क्रम में हैदराबाद पुलिस ने 4 जून को शहरभर में विशेष अभियान चलाया।
‘ऑपरेशन कवच’ के तहत रात 10 बजे से आधी रात तक चली इस कार्रवाई में 2,100 से अधिक फर्जी नंबर प्लेट वाले वाहन जब्त किए गए। पुलिस के अनुसार, इस दौरान नंबर प्लेट क्लोनिंग, धोखाधड़ी, एक ही नंबर का दो वाहनों में इस्तेमाल और नकली नंबर प्लेट लगाने जैसे मामलों का खुलासा हुआ।
पुलिस कमिश्नर वीसी सज्जनार ने स्पष्ट किया कि वाहन के पंजीकरण नंबर से किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ यातायात नियमों का उल्लंघन है और ऐसे मामलों में आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।

वाहन का रजिस्ट्रेशन नंबर क्यों जरूरी है?
मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 41(6) के अनुसार, परिवहन विभाग (RTO) द्वारा किसी वाहन को आवंटित आधिकारिक संख्या उसका रजिस्ट्रेशन नंबर कहलाती है।
यह नंबर वाहन की पहचान का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम होता है। कानून के अनुसार वाहन के आगे और पीछे नंबर प्लेट स्पष्ट रूप से दिखाई देना अनिवार्य है।
वहीं, मोटर वाहन अधिनियम की धारा 39 के तहत बिना वैध रजिस्ट्रेशन नंबर के किसी भी मोटर वाहन का सार्वजनिक सड़क पर चलना अपराध माना जाता है।
नंबर प्लेट से क्या जानकारी मिलती है?
वाहन की नंबर प्लेट केवल एक पहचान संख्या नहीं होती बल्कि इसमें कई महत्वपूर्ण जानकारियां छिपी होती हैं।
उदाहरण के तौर पर TN 06 AB 1234 जैसे नंबर में—
राज्य का कोड
पहले दो अक्षर उस राज्य की पहचान बताते हैं जहां वाहन पंजीकृत है।
आरटीओ का कोड
इसके बाद आने वाले दो अंक संबंधित जिले या आरटीओ कार्यालय का संकेत देते हैं।
पंजीकरण सीरीज
बीच के अंग्रेजी अक्षर उस समय की रजिस्ट्रेशन सीरीज को दर्शाते हैं।
यूनिक नंबर
अंतिम चार अंक वाहन की विशिष्ट पहचान संख्या होते हैं, जो किसी दूसरे वाहन को आवंटित नहीं किए जाते।
दुनिया में नंबर प्लेट की शुरुआत कब हुई?
वाहनों के लिए नंबर प्लेट को कानूनी रूप से लागू करने वाला पहला देश फ्रांस माना जाता है। सबसे पहले पेरिस में वाहनों के लिए पहचान प्लेट का नियम बनाया गया, जिसमें वाहन संख्या के साथ मालिक का नाम और पता भी दर्ज किया जाता था।
इसके बाद 1896 में जर्मनी ने पूरे देश में नंबर प्लेट व्यवस्था लागू की। वहीं, 1898 में नीदरलैंड्स ने राष्ट्रीय स्तर पर एक समान ट्रैफिक कानून बनाकर नंबर प्लेट प्रणाली को व्यवस्थित किया।
अमेरिका में न्यूयॉर्क ने 1901 में लाइसेंस प्लेट को अनिवार्य किया, जबकि 1903 में मैसाचुसेट्स सरकार ने आधिकारिक नंबर प्लेट जारी करना शुरू किया।
भारत में नंबर प्लेट की शुरुआत कैसे हुई?
भारत में वाहनों के लिए नंबर प्लेट का आधिकारिक प्रावधान 1914 में ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू किए गए भारतीय मोटर वाहन अधिनियम, 1914 के तहत किया गया।
हालांकि, इससे पहले भी बॉम्बे (1901), बंगाल (1903), मद्रास (1907), पंजाब (1907) और बर्मा (1906) जैसे क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानीय कानूनों के तहत वाहन पंजीकरण की व्यवस्था मौजूद थी।
1914 के बाद इन सभी व्यवस्थाओं को एक राष्ट्रीय कानून के अंतर्गत लाया गया।
बढ़ती वाहन संख्या को देखते हुए बाद में 1939 का मोटर वाहन अधिनियम लागू किया गया, जिसने पंजीकरण व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाया।
मौजूदा नंबर प्लेट सिस्टम कब लागू हुआ?
आज भारत में उपयोग होने वाला नंबर प्लेट प्रारूप मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 41 तथा केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 50 के अनुसार लागू है।
इन नियमों के तहत प्रत्येक राज्य को दो अक्षरों का अलग कोड दिया गया है, जैसे TN (तमिलनाडु), BR (बिहार) और UP (उत्तर प्रदेश)।

नंबर प्लेट के रंग का क्या मतलब होता है?
वर्तमान नियमों के अनुसार—
- निजी वाहनों के लिए सफेद नंबर प्लेट।
- व्यावसायिक वाहनों के लिए पीली नंबर प्लेट।
- इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए हरी नंबर प्लेट।
इन सभी प्लेटों पर काले रंग से वाहन संख्या लिखी जाती है ताकि वह स्पष्ट दिखाई दे।
HSRP और BH Series क्यों शुरू की गई?
फर्जी नंबर प्लेट और वाहन चोरी पर रोक लगाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने हाई सिक्योरिटी रजिस्ट्रेशन प्लेट (HSRP) लागू की।
इन एल्यूमिनियम प्लेटों में क्रोमियम आधारित होलोग्राम और लेजर-एनकोडेड नंबर होते हैं, जिससे इनके साथ छेड़छाड़ करना कठिन हो जाता है।
इसके अलावा 2021 में केंद्र सरकार ने BH (भारत) Series रजिस्ट्रेशन शुरू किया। यह व्यवस्था उन लोगों के लिए बनाई गई है जिन्हें नौकरी या अन्य कारणों से अक्सर अलग-अलग राज्यों में स्थानांतरण करना पड़ता है।
BH Series का सबसे बड़ा लाभ यह है कि दूसरे राज्य में जाने पर वाहन का दोबारा रजिस्ट्रेशन कराने की आवश्यकता नहीं होती। साथ ही ऐसे वाहन को देश के किसी भी राज्य में आसानी से बेचा जा सकता है।
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Conclusion
वाहनों की नंबर प्लेट केवल पहचान का माध्यम नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा, कानून व्यवस्था और वाहन पंजीकरण प्रणाली की महत्वपूर्ण कड़ी है। समय के साथ इसमें कई बदलाव किए गए हैं ताकि वाहन चोरी, फर्जी पंजीकरण और धोखाधड़ी जैसे मामलों पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके। आज HSRP और BH Series जैसी व्यवस्थाएं इसी दिशा में उठाए गए महत्वपूर्ण कदम हैं।







