कोविदार वृक्ष, जिसे आम बोलचाल में कचनार और वैज्ञानिक जगत में बाउहिनिया वैरिएगाटा (Bauhinia variegata) कहा जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप का एक अत्यंत विशिष्ट, मनोहारी और सांस्कृतिक रूप से महत्त्वपूर्ण वृक्ष है। प्राचीन भारतीय समाज में यह वृक्ष केवल वनस्पति विज्ञान का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि धर्म, सौंदर्य, लोकपरंपरा और आध्यात्मिक प्रतीकों का अभिन्न अंग बना रहा। इसे हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान प्राप्त है।

हाल ही में जब अयोध्या के राम जन्मभूमि पर ध्वजा रोहरण का उत्सव आयोजित किया गया तो इस वृक्ष की चर्चा भी खूब हुई क्योंकि यह वृक्ष राम के समय सूर्यवंशी साम्राज्य का राजसी वृक्ष रहा है। इस वृक्ष को अयोध्या राम मंदिर परिसर में स्थापित किया गया है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने उद्भोधन में इस वृक्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि यह वृक्ष कचनार और अपराजिता वृक्ष की बीच की प्रजाति का वृक्ष है। इस वृक्ष में दोनों के ही गुण पाए जाते हैं। यह देववृक्ष है।
असल में आयुर्वेद में कोविदार वृक्ष को बेहद उपयोगी माना गया है। इसके फूल, पत्तियाँ और छाल कई रोगों में महत्वपूर्ण औषधि का काम करते हैं।
अयोध्या में राम मंदिर के शिखर पर केसरिया ध्वज फहरा दिया गया है। इस ध्वज पर सूर्य और कोविदार वृक्ष के प्रतीक अंकित हैं। अब लोगों के मन में सवाल है कि आखिर कोविदार वृक्ष का महत्व क्या है, इसकी क्या कहानी है और क्यों इसे राम मंदिर के धर्म ध्वज पर स्थान दिया गया है।
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आयुर्वेद में कोविदार वृक्ष की अहमियत
असल में आयुर्वेद में कोविदार वृक्ष को बेहद उपयोगी माना गया है। इसके फूल, पत्तियाँ और छाल कई रोगों में महत्वपूर्ण औषधि का काम करते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि कोविदार देवताओं का प्रिय वृक्ष रहा है और इसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है। इसी दिव्यता के कारण धार्मिक अनुष्ठानों और धर्म ध्वज पर कोविदार के प्रतीक को विशेष महत्व दिया जाता है।

कोविदार वृक्ष की कहानी
अयोध्या में राम मंदिर के शिखर पर केसरिया ध्वज फहरा दिया गया है। इस ध्वज पर सूर्य और कोविदार वृक्ष के प्रतीक अंकित हैं। अब लोगों के मन में सवाल है कि आखिर कोविदार वृक्ष का महत्व क्या है, इसकी क्या कहानी है और क्यों इसे राम मंदिर के धर्म ध्वज पर स्थान दिया गया है।
कहां मिलता है कोविदार वृक्ष..?
यह ज्यादातर पहाड़ी, जंगलों, सड़कों के किनारे, और सूखे–उष्ण क्षेत्रों में पाया जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड में भी यह वृक्ष आम है। श्रीलंका और नेपाल में भी इसके वृक्ष दिखाई दे जाते हैं।
त्रेता युग से कोविदार वृक्ष का कनेक्शन
प्रचलित कथाओं में वर्णित है कि त्रेता युग में अयोध्या का राज-चिन्ह कोविदार वृक्ष माना जाता था। जिस समय भगवान श्रीराम अयोध्या के सिंहासन पर विराजमान थे, उस युग में कोविदार केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और आदर्श शासन का द्योतक माना जाता था। इसका उल्लेख कई परंपराओं, लोककथाओं और जनमानस की आस्थाओं में मिलता है।
रामायण में कहां मिलता जिक्र…?
रामायण के एक प्रसंग में यह उल्लेख मिलता है कि जब भरत भगवान राम को वन से वापस लाने गए थे, तब उनके साथ अयोध्या की सेना भी थी। उस सेना की ध्वजा पर भी कोविदार वृक्ष का प्रतीक बना हुआ था। दूर से इसी चिन्ह को देखकर लक्ष्मण ने सेना की पहचान की और भगवान राम को बताया कि अयोध्या से भरत की सेना वन की ओर आ रही है। इससे स्पष्ट होता है कि त्रेता युग से ही कोविदार वृक्ष को राज्य सत्ता, धर्म और विजय के प्रतीक के रूप में सम्मान प्राप्त रहा है।
पीएम मोदी ने क्या बोला…?
पीएम मोदी ने कहा कि यह धर्म ध्वज संकल्प का प्रतीक, संघर्ष से जन्मी विजय की कथा, सदियों पुराने स्वप्न का साकार रूप और संतों की तपस्या व समाज की सामूहिक सहभागिता का पवित्र परिणाम है। इसका भगवा रंग और इस पर रचित सूर्यवंश की ख्याति और अंकित कोविदार वृक्ष राम राज्य की कृति को प्रतिरूपित करता है। ये ध्वज संकल्प, सफलता, सदियों से सपनों के साकार रूप है।

मोहन भागवत ने क्या बोला..?
कचनार (कोविदार) का जिक्र करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि धर्म आधारित जीवन भी इसी सिद्धांत पर चलता है, हमें हर परिस्थिति में, चाहे हालात कितने ही कठिन क्यों न हों, अपने जीवन को ऊंचे आदर्शों तक ले जाने का प्रयास करना चाहिए और इसी को अपने ध्वज की तरह शिखर पर पहुंचाना चाहिए।






