नई दिल्ली:दुनियाभर के फुटबॉल प्रेमियों के लिए फीफा वर्ल्ड कप किसी त्योहार से कम नहीं होता। चार साल का लंबा इंतजार अब खत्म होने को है, क्योंकि 11 जून 2026 से अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको की धरती पर फुटबॉल का सबसे बड़ा मेला लगने जा रहा है। लेकिन भारत के करोड़ों प्रशंसकों के लिए एक ऐसी खबर सामने आ रही है, जो उनका दिल तोड़ सकती है।
टूर्नामेंट शुरू होने में अब बहुत कम समय बचा है, लेकिन अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि भारत में इन मैचों का सीधा प्रसारण किस चैनल पर होगा। अगर जल्द ही कोई समाधान नहीं निकला, तो शायद इस बार भारतीय फैंस को अपने पसंदीदा सितारों को लाइव खेलते देखने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा।
अधिकारों को लेकर क्यों फंसा है पेच?
किसी भी बड़े खेल आयोजन को टीवी पर दिखाने के लिए ब्रॉडकास्टिंग राइट्स यानी प्रसारण अधिकार खरीदने होते हैं। भारत में इस रेस में रिलायंस और डिज्नी (वॉयकॉम 18) को सबसे आगे माना जा रहा था। खबर है कि इन दोनों कंपनियों ने मिलकर करीब 166 करोड़ रुपये की भारी-भरकम बोली भी लगाई थी।
आम तौर पर यह रकम कम नहीं होती, लेकिन इस बार फीफा की उम्मीदें काफी ज्यादा हैं। फीफा ने इस बोली को बहुत कम बताते हुए ठुकरा दिया है। फीफा का मानना है कि भारत जैसे बड़े देश में, जहाँ फुटबॉल की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है, उसे और भी बेहतर डील मिलनी चाहिए। इसी खींचतान की वजह से बातचीत फिलहाल बंद पड़ी है।
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सोनी ने भी मोड़ा मुंह, बढ़ गई अनिश्चितता
रिलायंस के बाद सबकी उम्मीदें सोनी स्पोर्ट्स नेटवर्क पर टिकी थीं। सोनी का फुटबॉल दिखाने का पुराना अनुभव रहा है और फैंस भी इसके प्रेजेंटेशन को काफी पसंद करते हैं। कंपनी ने शुरुआत में तो दिलचस्पी दिखाई, लेकिन जब बोली लगाने का वक्त आया तो उसने हाथ पीछे खींच लिए। बाजार के जानकारों का कहना है कि सोनी इस समय भारी-भरकम खर्च करने के मूड में नहीं है। कंपनी को लगता है कि विज्ञापन से होने वाली कमाई शायद इतनी न हो कि इस महंगी डील की भरपाई की जा सके। सोनी जैसे बड़े खिलाड़ी के मैदान छोड़ने के बाद अब ब्रॉडकास्टिंग के बाजार में सन्नाटा पसरा हुआ है।
आखिर कंपनियां निवेश करने से क्यों डर रही हैं?
अब सवाल यह उठता है कि आखिर भारतीय कंपनियां फुटबॉल के इतने बड़े वर्ल्ड कप से दूर क्यों भाग रही हैं? इसके पीछे कुछ कड़वी सच्चाई और व्यावहारिक कारण हैं। सबसे बड़ी समस्या है समय का अंतर। वर्ल्ड कप अमेरिका और मेक्सिको में हो रहा है, जिसका मतलब है कि भारत में मैच देर रात 2 बजे या सुबह 4-5 बजे प्रसारित होंगे। इस समय पर दर्शक कम होते हैं और जब दर्शक कम होंगे, तो बड़ी कंपनियाँ विज्ञापन देने से कतराती हैं।दूसरा बड़ा कारण है भारत में क्रिकेट का दबदबा। हमारे यहाँ विज्ञापनों का अधिकांश पैसा आईपीएल और टीम इंडिया के मैचों पर खर्च हो जाता है। ऐसे में फुटबॉल वर्ल्ड कप के लिए करोड़ों रुपये दांव पर लगाना कंपनियों को घाटे का सौदा लग रहा है।
48 टीमें और 104 मैच: फिर भी सन्नाटा
इस बार का वर्ल्ड कप ऐतिहासिक होने वाला है क्योंकि फीफा ने टीमों की संख्या 32 से बढ़ाकर 48 कर दी है। यानी मैचों की संख्या भी अब 104 हो जाएगी। ज्यादा मैच होने का मतलब है ज्यादा खर्च, और यही बात भारतीय ब्रॉडकास्टर्स को परेशान कर रही है। उन्हें लगता है कि इतने ज्यादा मैचों का खर्चा उठाना और फिर उनसे कमाई करना बहुत मुश्किल होगा। उधर फीफा अपनी जिद्द पर अड़ा है कि वह कम कीमत पर अधिकार नहीं बेचेगा।
क्या अंतिम समय में दूरदर्शन बचाएगा लाज
जब निजी कंपनियां पीछे हट जाती हैं, तो अक्सर सरकार से उम्मीद की जाती है। खेल गलियारों में चर्चा है कि अगर कोई प्राइवेट चैनल आगे नहीं आता है, तो प्रसार भारती (दूरदर्शन) इस मामले में हस्तक्षेप कर सकता है। हालांकि, दूरदर्शन के लिए भी इतनी बड़ी रकम चुकाना आसान नहीं होगा। लेकिन चूंकि यह करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि सरकार बीच का कोई रास्ता निकाल सकती है ताकि कम से कम भारत के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लोग मुफ्त में इन मैचों का आनंद ले सकें।
क्या निकलेगा रास्ता?
अभी भी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। अक्सर देखा गया है कि वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट्स के लिए अंतिम समय में कोई न कोई डील फाइनल हो ही जाती है। हो सकता है कि फीफा अपनी शर्तों में थोड़ी ढील दे या फिर कोई कंपनी डिजिटल अधिकारों के लिए ही समझौता कर ले। लेकिन फिलहाल की स्थिति यही है कि भारतीय फैंस के लिए ‘वेट एंड वॉच’ वाला माहौल है। अब देखना होगा कि 11 जून की सुबह जब मेक्सिको के मैदान पर फुटबॉल की पहली किक लगेगी, तो क्या भारतीय दर्शकों के टीवी सेट पर उसका सीधा प्रसारण हो रहा होगा या उन्हें बस स्कोर अपडेट से ही संतोष करना पड़ेगा।







