नई दिल्ली: देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई के नए डायरेक्टर की नियुक्ति को लेकर सियासत गरमा गई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने चयन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए अपनी असहमति जाहिर की है। उनका कहना है कि जिस तरीके से नए डायरेक्टर का चुनाव किया जा रहा है, वह न तो पारदर्शी है और न ही निष्पक्ष। राहुल गांधी ने साफ तौर पर आरोप लगाया कि इस पूरी प्रक्रिया में विपक्ष की राय को कोई अहमियत नहीं दी गई।
बैठक में क्या हुआ
सीबीआई डायरेक्टर चुनने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एक हाई-लेवल मीटिंग बुलाई गई थी। इस कमेटी में प्रधानमंत्री के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता सदस्य होते हैं। बैठक में कई सीनियर आईपीएस अफसरों के नामों पर चर्चा होनी थी, लेकिन राहुल गांधी ने इस प्रक्रिया पर आपत्ति जताते हुए खुद को इससे अलग कर लिया। उन्होंने कहा कि वह ऐसी किसी भी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनना चाहते जो पहले से तय लगती हो और जिसमें पक्षपात की बू आती हो।
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विपक्ष की भूमिका पर सवाल
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि चयन समिति में विपक्ष के नेता को शामिल करना महज एक औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। राहुल गांधी का तर्क है कि कानून में विपक्ष को इसलिए जगह दी गई है ताकि सरकारी दखलंदाजी कम हो और नियुक्ति में संतुलन बना रहे। उन्होंने अपनी चिट्ठी में कड़े शब्दों में लिखा कि अगर विपक्ष की बात सुननी ही नहीं है, तो फिर उन्हें बैठक में बुलाने का मतलब ही क्या रह जाता है।
दस्तावेजों की उपलब्धता और पारदर्शिता का अभाव
इस पूरे विवाद में राहुल गांधी का सबसे बड़ा तकनीकी और प्रक्रियात्मक आरोप यह है कि चयन समिति के सदस्यों को उम्मीदवारों से संबंधित पर्याप्त जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं कराई गई। राहुल गांधी के मुताबिक, किसी भी महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों की सेवा रिपोर्ट, उनकी उपलब्धियां, पुराने रिकॉर्ड और मूल्यांकन रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन करना जरूरी होता है। आरोप है कि बैठक शुरू होने से ऐन पहले कुछ अधिकारियों के नाम और उनके दस्तावेज सामने रख दिए गए, जिससे सदस्यों को उनके बारे में गहन विचार-विमर्श करने का मौका ही नहीं मिला। राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि जब पर्याप्त जानकारी ही समय पर साझा नहीं की गई, तो इतने कम समय में किसी निष्कर्ष पर कैसे पहुंचा जा सकता है। उनका मानना है कि पारदर्शिता के अभाव में लिया गया कोई भी फैसला निष्पक्षता की कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता।
जल्दबाजी में खत्म हुई मीटिंग
सूत्रों की मानें तो यह पूरी बैठक बहुत ही कम समय में खत्म हो गई। राहुल गांधी ने इसी जल्दबाजी पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि देश की इतनी बड़ी एजेंसी के भविष्य का फैसला इतनी हड़बड़ी में नहीं लिया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, अफसरों की सर्विस रिपोर्ट और उनके पुराने काम को देखने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए था, जो इस बैठक में नहीं दिया गया।
जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का पुराना विवाद
विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सीधे तौर पर केंद्र सरकार पर जांच एजेंसियों के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप भी मढ़ा है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सालों में जिस तरह से सीबीआई और अन्य केंद्रीय एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ एक हथियार के रूप में किया गया है, उसने जनता के बीच इन संस्थाओं की छवि को धूमिल किया है। ऐसी स्थिति में, एजेंसी के नए प्रमुख का चयन पूरी तरह से निष्पक्ष होना और भी अनिवार्य हो जाता है। राहुल गांधी का कहना है कि सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि चयन प्रक्रिया न केवल निष्पक्ष हो, बल्कि वह निष्पक्ष दिखाई भी दे। यदि नियुक्ति की नींव ही विवादों और असंतोष पर टिकी होगी, तो संस्था की स्वायत्तता का दावा खोखला नजर आएगा।
क्या है कांग्रेस का स्टैंड
कांग्रेस पार्टी ने राहुल गांधी के इस रुख का पूरा समर्थन किया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि सरकार जांच एजेंसियों को अपनी मुट्ठी में रखना चाहती है, इसलिए नियुक्ति की प्रक्रिया में विपक्ष को किनारे किया जा रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार पारदर्शिता से डरती है। वहीं दूसरी तरफ, सरकारी सूत्रों का कहना है कि पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत ही पूरी की गई है।
अब इस विवाद के बाद सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति का मामला पूरी तरह राजनीतिक रंग ले चुका है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर विपक्षी दल सरकार को और घेर सकते हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जांच एजेंसियों की आजादी लोकतंत्र के लिए बहुत जरूरी है, और ऐसे विवादों से उनकी छवि को नुकसान पहुंचता है।







