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भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर सियासी संग्राम- कॉटन किसान और टेक्सटाइल सेक्टर को लेकर सरकार पर राहुल गांधी का हमला

भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर सियासी संग्राम- कॉटन किसान और टेक्सटाइल सेक्टर को लेकर सरकार पर राहुल गांधी का हमला
नवजोत कौर सिद्धू
On: फ़रवरी 15, 2026 2:06 अपराह्न
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डेलीबार्ता,नई दिल्ली-भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर देश की राजनीति गरमा गई है। कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि यह डील देश के कपास किसानों और टेक्सटाइल निर्यातकों के हितों के खिलाफ जा सकती है। उनका दावा है कि इस समझौते की शर्तें भारतीय कृषि और वस्त्र उद्योग दोनों को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

नई दिल्ली में दिए गए अपने बयान और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर व्यापार नीति को लेकर पारदर्शिता न रखने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार ने इस समझौते से जुड़े अहम पहलुओं को जनता और संसद से छिपाने की कोशिश की है।

टैरिफ विवाद बना राजनीतिक मुद्दा

राहुल गांधी ने अपने आरोपों के केंद्र में अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ (आयात शुल्क) का मुद्दा रखा। उनके अनुसार, भारतीय गारमेंट्स यानी रेडीमेड कपड़ों के निर्यात पर अमेरिका में लगभग 18 प्रतिशत टैरिफ लगाया जा रहा है, जबकि बांग्लादेश को इसी सेक्टर में शून्य प्रतिशत टैरिफ का लाभ मिल रहा है।

उन्होंने कहा कि यह अंतर भारतीय टेक्सटाइल उद्योग के लिए प्रतिस्पर्धा को कठिन बना देगा। उनके मुताबिक, अगर भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाजार में ऊंचे शुल्क के साथ प्रवेश करना पड़ेगा, तो उनके उत्पाद महंगे हो जाएंगे और वैश्विक बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर पड़ सकती है।

बांग्लादेश को मिली रियायत पर उठाए सवाल

राहुल गांधी ने दावा किया कि अमेरिका ने बांग्लादेश को गारमेंट्स निर्यात पर 0% टैरिफ का फायदा इस शर्त पर दिया है कि वह अमेरिकी कपास का आयात करे। उन्होंने कहा कि संसद में जब उन्होंने इस विषय पर सवाल उठाया, तो सरकार की ओर से यह संकेत दिया गया कि भारत को भी समान लाभ चाहिए तो अमेरिकी कपास आयात बढ़ाना होगा।

उनके अनुसार, यही वह बिंदु है जहां भारतीय किसानों के हित प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने सवाल किया कि यदि भारत बड़े पैमाने पर विदेशी कपास आयात करता है, तो घरेलू कपास उत्पादकों की मांग घट सकती है, जिससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ेगा।

‘आगे कुआं, पीछे खाई’ जैसी स्थिति का दावा

राहुल गांधी ने इस पूरी स्थिति को “आगे कुआं, पीछे खाई” जैसा बताते हुए कहा कि भारत के सामने दो कठिन विकल्प खड़े किए जा रहे हैं। उनके मुताबिक यदि भारत अमेरिकी कपास आयात करता है, तो देश के अपने कपास किसानों को नुकसान होगा। और यदि आयात नहीं करता, तो भारतीय टेक्सटाइल उद्योग को उच्च टैरिफ के कारण वैश्विक प्रतिस्पर्धा में नुकसान झेलना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि ऐसी व्यापार नीति देश को रणनीतिक रूप से कमजोर कर सकती है और दीर्घकाल में कृषि तथा उद्योग दोनों क्षेत्रों पर दबाव बढ़ा सकती है।

कपास किसान और टेक्सटाइल उद्योग की अहमियत

भारत दुनिया के प्रमुख कपास उत्पादक देशों में शामिल है। देश के कई राज्यों महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और पंजाब में लाखों किसान कपास की खेती पर निर्भर हैं। वहीं टेक्सटाइल और गारमेंट उद्योग भारत के सबसे बड़े रोजगार देने वाले क्षेत्रों में से एक है।

राहुल गांधी ने कहा कि इन दोनों सेक्टरों पर असर पड़ने का मतलब सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका पर संकट खड़ा होना है। उनके अनुसार, यदि निर्यात घटता है या घरेलू उत्पादन कमजोर पड़ता है, तो इसका सीधा असर रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

सरकार की नीति पर पारदर्शिता का सवाल

कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि सरकार ने व्यापार समझौते की शर्तों को स्पष्ट रूप से सार्वजनिक नहीं किया। उन्होंने कहा कि इतने बड़े आर्थिक फैसले पर संसद और उद्योग जगत के साथ व्यापक चर्चा होनी चाहिए थी।

राहुल गांधी का कहना है कि एक दूरदर्शी सरकार ऐसी नीति बनाती जो किसानों और निर्यातकों दोनों के हितों की रक्षा करती। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा समझौता संतुलित रणनीति की बजाय दबाव में लिया गया निर्णय प्रतीत होता है।

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संभावित आर्थिक प्रभावों को लेकर चिंता

राहुल गांधी ने चेतावनी दी कि यदि स्थिति नहीं सुधरी तो इसका असर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है-

  • घरेलू कपास की मांग घटने से किसानों की आय प्रभावित हो सकती है।
  • टेक्सटाइल निर्यात महंगा होने से अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर कम हो सकते हैं।
  • छोटे और मध्यम उद्योगों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।
  • रोजगार के अवसरों में कमी आ सकती है।

उन्होंने कहा कि टेक्सटाइल सेक्टर पहले ही वैश्विक प्रतिस्पर्धा और लागत बढ़ने जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसे में अतिरिक्त टैरिफ का बोझ उद्योग के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

सरकार बनाम विपक्ष-नीति पर अलग-अलग नजरिया

हालांकि सरकार की ओर से आधिकारिक रूप से यह कहा जाता रहा है कि भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को मजबूत करना देश की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है और इससे निवेश व निर्यात के नए अवसर पैदा होंगे। सरकार का तर्क है कि वैश्विक व्यापार समझौते अक्सर दीर्घकालिक लाभ को ध्यान में रखकर किए जाते हैं।

विपक्ष का आरोप है कि यदि समझौते में घरेलू उद्योगों और किसानों की सुरक्षा के पर्याप्त प्रावधान नहीं होंगे, तो इसका फायदा दूसरे देशों को मिल सकता है जबकि भारत को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

आर्थिक कूटनीति बनाम घरेलू हितों की बहस

यह विवाद सिर्फ एक व्यापार समझौते तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की आर्थिक कूटनीति और घरेलू हितों के बीच संतुलन की बहस को भी सामने लाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ देशों को ऐसे समझौते करने पड़ते हैं, लेकिन साथ ही घरेलू उद्योगों की सुरक्षा भी जरूरी होती है।

राहुल गांधी ने इसी संतुलन की कमी का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार को ऐसा मॉडल अपनाना चाहिए था, जिससे किसानों और निर्यातकों दोनों को समान लाभ मिल सके।

आगे क्या?

भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर राजनीतिक बयानबाजी अभी और तेज होने की संभावना है। आने वाले समय में संसद, उद्योग संगठनों और किसान संगठनों के बीच इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा हो सकती है।

फिलहाल यह स्पष्ट है कि व्यापार समझौता सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का भी बड़ा मुद्दा बन चुका है। एक ओर सरकार इसे वैश्विक अवसर के रूप में पेश कर रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष इसे किसानों और उद्योग के हितों के लिए संभावित खतरा बता रहा है।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment

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