भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी के लिए समंदर पार से एक ऐसी खबर आई है जिसने उनकी सारी पुरानी टेंशन खत्म कर दी है। पिछले काफी समय से अडानी ग्रुप अमेरिका में जिन कानूनी लफड़ों और केस-कचहरी के चक्करों में फंसा हुआ था, अब वहां से राहत के साफ संकेत मिल रहे हैं। ताजा चर्चा यह है कि अमेरिकी जांच एजेंसियां अब इन मामलों को और खींचने के मूड में नहीं हैं और बहुत जल्द इस पूरे फसाद को रफा-दफा किया जा सकता है,इस पूरे विवाद की जड़ में सोलर पावर यानी धूप से बनने वाली बिजली के बड़े-बड़े ठेके थे। अमेरिका की जांच एजेंसियों ने पिछले साल अडानी ग्रुप पर यह कहकर उंगली उठाई थी कि इन प्रोजेक्ट्स को हासिल करने के लिए कुछ गड़बड़ की गई है।
आरोप लगा था कि ठेके पाने के चक्कर में कुछ अधिकारियों के साथ गुपचुप लेन-देन हुआ।इसके साथ ही एक और बड़ा इल्जाम यह था कि जब अडानी ग्रुप ने दुनिया भर के अमीरों और बैंकों से पैसा जुटाया, तो उन्होंने इन बातों को पर्दे के पीछे रखा। अमेरिका के कायदे-कानून बहुत सख्त हैं, वहां पाई-पाई का हिसाब और हर बात की जानकारी निवेशकों को देनी पड़ती है। इन्हीं आरोपों ने अडानी ग्रुप की साख पर बट्टा लगा दिया था और पूरी दुनिया में इसकी खूब चर्चा हुई थी। लेकिन अडानी ग्रुप शुरू से ही सीना ठोककर कह रहा था कि हमने कुछ गलत नहीं किया और ये सब सिर्फ उन्हें बदनाम करने की साजिश है।
अब अचानक ऐसा क्या हुआ जो एजेंसियां नरम पड़ गईं
अब सवाल यह है कि जो अमेरिकी एजेंसियां पहले इतनी गरम थीं, वो अब नरम कैसे हो गईं? असल में बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के ऐसे मामलों को कोर्ट में साबित करना पहाड़ चढ़ने जैसा काम होता है। इसमें सालों साल बीत जाते हैं और करोड़ों रुपये वकीलों की जेब में चले जाते हैं। शायद इसीलिए अब वहां की एजेंसियां ‘बीच के रास्ते’ पर विचार कर रही हैं।कहा जा रहा है कि अमेरिकी न्याय विभाग इन केसों को वापस लेने की तैयारी में है। वहीं दूसरी तरफ, वहां का जो बाजार नियामक है, वह कुछ जुर्माना लेकर इस पूरे मामले को हमेशा के लिए फाइल में बंद कर सकता है। अगर ऐसा होता है, तो यह अडानी के लिए किसी बहुत बड़ी जीत से कम नहीं होगा क्योंकि उन्हें कोर्ट की लंबी तारीखों से हमेशा के लिए छुट्टी मिल जाएगी। हालांकि अभी इसकी कोई लिखित चिट्ठी नहीं आई है, लेकिन खबर पक्की मानी जा रही है।
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अडानी ग्रुप और बाजार के लिए इसके क्या मायने हैं
अडानी ग्रुप के लिए यह खबर किसी बूस्टर डोज़ की तरह है। पिछले दो सालों में ग्रुप ने बड़े उतार-चढ़ाव देखे हैं। कभी हिंडनबर्ग की रिपोर्ट ने परेशान किया तो कभी अमेरिका की इन जांचों ने। अब जैसे ही ये कानूनी साये हटेंगे, अडानी ग्रुप फिर से पुराने रसूख के साथ दुनिया भर के बाजारों में अपनी पकड़ बना पाएगा।इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जो विदेशी बैंक अब तक हाथ खींच रहे थे, वे फिर से अडानी के प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाने को तैयार हो जाएंगे। अडानी के पास इस समय बिजली, पोर्ट्स और हवाई अड्डों के इतने बड़े काम हैं जिन्हें पूरा करने के लिए विदेशी निवेश बहुत जरूरी है। जब ये केस खत्म हो जाएंगे, तो निवेशकों का डर भी खत्म हो जाएगा और ग्रुप की गाड़़ी फिर से पटरी पर दौड़ पड़ेगी।
घर की राजनीति और भविष्य की तस्वीर
भारत में तो अडानी का नाम आते ही सियासी पारा चढ़ जाता है। अगर अमेरिका से क्लीन चिट मिलती है, तो इसका असर यहां की राजनीति पर भी पड़ना तय है। सरकार के लिए यह अपनी बात साबित करने का मौका होगा, वहीं विपक्ष को नए सिरे से अपनी रणनीति सोचनी पड़ेगी।कुल मिलाकर, पूरी दुनिया अब उस दिन का इंतजार कर रही है जब अमेरिका की तरफ से आधिकारिक तौर पर इस समझौते का ऐलान होगा। यह खबर न केवल एक कंपनी के लिए बल्कि भारत के औद्योगिक रसूख के लिए भी बहुत मायने रखती है। अब देखना यह है कि इस राहत के बाद गौतम अडानी अपने साम्राज्य को और कितनी ऊंचाई पर ले जाते हैं। फिलहाल तो इतना ही कहा जा सकता है कि अडानी के बुरे दिन अब पीछे छूटने वाले हैं।







