दुनिया की अर्थव्यवस्था एक बार फिर बड़े खतरे में नजर आ रही है। ईरान और अमेरिका के बीच जारी खींचतान ने अब ऐसा मोड़ ले लिया है कि पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया है। इस तनाव का सबसे बड़ा और सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल के दाम उछलकर 120 डॉलर प्रति बैरल के पार चले गए हैं। पिछले कई महीनों में यह सबसे ऊँचा स्तर है। जानकारों का कहना है कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो आम आदमी के लिए आने वाले दिन बहुत मुश्किल भरे हो सकते हैं।
क्यों अचानक बढ़ी तेल की कीमतें
इस पूरे संकट की शुरुआत अमेरिका की उस सख्त कार्रवाई से हुई है, जो उसने ईरान के तेल निर्यात को रोकने के लिए की है। अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों पर एक तरह से शिकंजा कस दिया है ताकि वहां से तेल बाहर न जा सके। ईरान दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों में से एक है, और जब वहां से सप्लाई रुकने की खबर आई, तो बाजार में खलबली मच गई। तेल खरीदने वाले देशों और कंपनियों को डर लग रहा है कि आने वाले दिनों में तेल की किल्लत हो सकती है। इसी डर और आशंका की वजह से कीमतों में आग लगी हुई है।
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हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ी चिंता की वजह
समुद्र के बीच एक छोटा सा रास्ता है जिसे हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य कहा जाता है। इसे दुनिया की ‘तेल वाली नस’ भी कहते हैं। दुनिया का करीब 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ईरान ने धमकी दी है कि अगर उस पर ज्यादा दबाव बनाया गया, तो वह इस रास्ते को बंद कर सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो दुनिया के कई देशों में अंधेरा छा सकता है और गाड़ियां खड़ी हो सकती हैं। फिलहाल इस इलाके में दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हैं, जिससे टैंकरों की आवाजाही पर बुरा असर पड़ा है।
माल ढुलाई और इंश्योरेंस का बढ़ा बोझ
जब भी किसी समुद्री रास्ते पर युद्ध जैसा माहौल होता है, तो वहां से जहाज गुजारना बहुत महंगा हो जाता है। जहाज चलाने वाली कंपनियों ने अपना किराया बढ़ा दिया है क्योंकि उन्हें अब ज्यादा जोखिम उठाना पड़ रहा है। इतना ही नहीं, जहाजों का बीमा करने वाली कंपनियों ने भी प्रीमियम की दरें कई गुना बढ़ा दी हैं। इसका नतीजा यह हो रहा है कि तेल की जो कीमत पहले से ज्यादा थी, वह भारत जैसे देशों तक पहुँचते-पूँछते और भी महंगी हो जा रही है। कई जहाजों को तो अपना रास्ता बदलकर हजारों किलोमीटर दूर से घूमकर आना पड़ रहा है, जिससे समय और पैसा दोनों ज्यादा खर्च हो रहे हैं।
भारत के लिए क्या है इसके मायने
भारत के लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं है। हमारे देश में जरूरत का ज्यादातर तेल बाहर से आता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढ़ते हैं, तो भारत सरकार और तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ जाता है। अगर कच्चा तेल 120 डॉलर पर बना रहता है, तो पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ना लगभग तय है। भारत में जब भी डीजल महंगा होता है, तो उसका असर सीधे आपकी थाली पर पड़ता है। ट्रक वाले किराया बढ़ा देते हैं, जिससे फल, सब्जी, अनाज और दूध जैसी रोजमर्रा की चीजें महंगी हो जाती हैं।
क्या बातचीत से निकलेगा कोई रास्ता
फिलहाल तो अमेरिका और ईरान, दोनों में से कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा है। दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत पूरी तरह बंद है। दुनिया के बाकी बड़े देश जैसे चीन, रूस और यूरोपीय देश इस कोशिश में लगे हैं कि मामला और न बिगड़े, लेकिन अभी तक कोई कामयाबी नहीं मिली है। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक दोनों देश मेज पर बैठकर बात नहीं करेंगे, तब तक बाजार में यह अनिश्चितता बनी रहेगी। व्यापारियों को डर है कि अगर एक भी छोटी सी हिंसक घटना हुई, तो तेल 140 डॉलर तक भी जा सकता है।
आगे क्या होगा
ईरान और अमेरिका का यह संकट केवल दो देशों की लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि यह एक वैश्विक आर्थिक युद्ध बन चुका है। पूरी दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या ओपेक (OPEC) देश अपना उत्पादन बढ़ाएंगे ताकि कीमतों को नीचे लाया जा सके। लेकिन फिलहाल इसकी उम्मीद कम ही दिख रही है। भारत जैसे देशों को अब अपनी रणनीति बदलनी होगी और सौर ऊर्जा या बिजली से चलने वाले वाहनों पर तेजी से काम करना होगा, ताकि भविष्य में ऐसे झटकों से बचा जा सके। फिलहाल, हम सबको एक महंगे दौर के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि तेहरान और वॉशिंगटन की इस लड़ाई का बिल दुनिया का हर नागरिक चुका रहा है।







