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US-Israel Iran War – वैश्विक ऊर्जा संकट अमेरिका-इजराइल और ईरान संघर्ष का कच्चे तेल पर प्रभाव 2022 के बाद सबसे महंगा हुआ कच्चा तेल

वैश्विक ऊर्जा संकट अमेरिका-इजराइल और ईरान संघर्ष का कच्चे तेल पर प्रभाव 2022 के बाद सबसे महंगा हुआ कच्चा तेल
नवजोत कौर सिद्धू
On: मार्च 10, 2026 2:51 अपराह्न
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वर्तमान में वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य (Geopolitical Landscape) एक अत्यंत संवेदनशील मोड़ पर है। मार्च 2026 की शुरुआत में मध्य पूर्व में अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में हड़कंप मचा दिया है। आज 9 मार्च, को कच्चे तेल (Brent Crude) की कीमतें 116 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छू गई हैं जो 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद का उच्चतम स्तर है।

 संकट की पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति

  • 2022 में जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ था तब तेल की कीमतें 100 डॉलर के पार गई थीं, जिसने वैश्विक मुद्रास्फीति (Inflation) को जन्म दिया। लेकिन 2026 का यह मौजूदा संकट उससे कहीं अधिक गहरा होने की आशंका है।
  • कीमतों में उछाल –  महज कुछ ही दिनों के भीतर तेल की कीमतों में 25% की वृद्धि दर्ज की गई है।
  • प्रमुख ट्रिगर – ईरान द्वारा ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को बंद करने की धमकी और इजराइल-अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु और तेल बुनियादी ढांचे पर संभावित हमलों की खबरों ने बाजार में डर पैदा कर दिया है।

तेल की कीमतों में वृद्धि के मुख्य कारण

मध्य पूर्व को दुनिया का ‘ऊर्जा केंद्र’ माना जाता है। यहाँ होने वाली किसी भी हलचल का सीधा असर आपकी जेब और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

  • होर्मुज जलडमरूमध्य का सामरिक महत्व

दुनिया के कुल तेल उपभोग का लगभग 20% से अधिक हिस्सा इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। यदि ईरान और अमेरिका के बीच पूर्ण युद्ध छिड़ता है तो इस मार्ग की नाकेबंदी से वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह ठप हो सकती है।

  • ईरान का तेल उत्पादन

ईरान दुनिया के शीर्ष तेल उत्पादकों में से एक है। प्रतिबंधों के बावजूद वह वैश्विक बाजार में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना हुआ है। उसके तेल निर्यात पर किसी भी तरह का हमला या कड़ा प्रतिबंध बाजार में आपूर्ति की कमी (Supply Deficit) पैदा कर रहा है।

  • इजराइल और अमेरिका का गठबंधन

अमेरिका द्वारा इजराइल को दिया जा रहा सैन्य समर्थन और ईरान के खिलाफ सख्त रुख ने निवेशकों को डरा दिया है। “वार प्रीमियम” (War Premium) के कारण कच्चे तेल की सट्टेबाजी बढ़ गई है।

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वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव (The Domino Effect)

जब कच्चा तेल $116 के पार जाता है तो इसका असर केवल पेट्रोल पंपों तक सीमित नहीं रहता।

क्षेत्रप्रभाव की प्रकृति
परिवहनलॉजिस्टिक्स और माल ढुलाई की लागत में भारी वृद्धि।
कृषिउर्वरक उत्पादन (जो प्राकृतिक गैस/तेल पर निर्भर है) महंगा होगा, जिससे खाद्य कीमतें बढ़ेंगी।
विमाननएयरलाइन टिकटों के दामों में 15-20% की बढ़ोतरी की संभावना है।
मुद्रा बाजारडॉलर मजबूत होगा और विकासशील देशों (जैसे भारत) की मुद्राएं कमजोर होंगी।

 भारत के लिए इसके क्या मायने हैं?

  • भारत अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल आयात करता है। $116 प्रति बैरल की कीमत भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक “डबल झटका” है
  • राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) –  सरकार को तेल आयात के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी होगी।
  • महंगाई – पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने से रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी।
  • शेयर बाजार –  अनिश्चितता के कारण विदेशी निवेशक (FII) भारतीय बाजार से पैसा निकाल सकते हैं।

भारत सरकार और कीमतों पर असर

  • कीमतें नहीं बढ़ेंगी –  सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल पेट्रोल और डीजल के दामों में कोई बढ़ोतरी नहीं की जाएगी।
  • OMCs पर बोझ –  सरकार का कहना है कि तेल कंपनियां फिलहाल इस अंतरराष्ट्रीय बढ़त का भार खुद झेलेंगी यानी उनके मुनाफे में कमी हो सकती है  ताकि आम जनता पर बोझ न पड़े।
  • पर्याप्त स्टॉक –  सरकारी सूत्रों के अनुसार भारत की एनर्जी स्टॉक की स्थिति पहले से बेहतर हुई है और देश ने अपनी निर्भरता हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील रास्तों से घटाकर अन्य सुरक्षित रूट्स पर बढ़ा दी है अब करीब 70% तेल अन्य रास्तों से आ रहा है।

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क्या यह 1973 के तेल संकट की पुनरावृत्ति है?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष और लंबा खिंचता है तो हम 1970 के दशक जैसा ऊर्जा संकट देख सकते हैं। हालांकि अब अमेरिका खुद एक बड़ा तेल उत्पादक है और दुनिया ‘रिन्यूएबल एनर्जी’ की ओर बढ़ रही है लेकिन अल्पावधि (Short-term) में कच्चे तेल का कोई पूर्ण विकल्प नहीं है।

भविष्य का अनुमान और समाधान

  • आने वाले हफ्तों में बाजार की दिशा निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करेगी
  • OPEC+ का रुख –  क्या सऊदी अरब और अन्य देश उत्पादन बढ़ाकर कीमतों को नियंत्रित करेंगे?
  • राजनयिक वार्ता – क्या संयुक्त राष्ट्र या अन्य देश तनाव कम करने में सफल होंगे?

महत्वपूर्ण नोट –  यदि युद्ध बड़े पैमाने पर फैलता है तो कुछ विश्लेषकों का मानना है कि तेल 150 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को भी पार कर सकता है।

यह स्थिति वैश्विक नेताओं के लिए एक चेतावनी है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) पर निर्भरता कम करना और वैकल्पिक स्रोतों को अपनाना अब केवल पर्यावरण के लिए नहीं बल्कि आर्थिक स्थिरता के लिए भी अनिवार्य है।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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