भारत निर्वाचन आयोग ने बिहार विधान परिषद की खाली हो रही 9 सीटों के लिए द्विवार्षिक चुनाव और 1 सीट के लिए उपचुनाव के तारीखों का बिगुल फूंक दिया है। उच्च सदन (विधान परिषद) की ये 9 सीटें आगामी 28 जून को खाली होने जा रही हैं, जबकि 1 सीट पर होने जा रहा उपचुनाव बेहद खास है। यह सीट बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार के इस्तीफा देकर राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई है।
बिहार के इस बड़े राजनैतिक घटनाक्रम के बीच सीटों के गणित, उम्मीदवारों की दौड़ और चुनाव के संपूर्ण शेड्यूल को विस्तार से समझना जरूरी है।
चुनाव का पूरा कार्यक्रम और महत्वपूर्ण तिथियां
निर्वाचन आयोग की ओर से जारी आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, विधान परिषद की सभी 10 सीटों (9 द्विवार्षिक + 1 उपचुनाव) के लिए चुनावी प्रक्रिया जून महीने में संपन्न कराई जाएगी। चूंकि यह चुनाव बिहार विधानसभा के निर्वाचित विधायकों (MLAs) के मतों द्वारा होता है, इसलिए इसकी पूरी समय-सीमा बेहद कड़े नियमों के तहत तय की गई है
| चुनावी प्रक्रिया का चरण | निर्धारित तिथि |
| आधिकारिक अधिसूचना जारी होने की तिथि | 01 जून, 2026 |
| नामांकन (पर्चा दाखिल करने) की अंतिम तिथि | 08 जून, 2026 |
| नामांकन पत्रों की जांच (Scrutiny) | 09 जून, 2026 |
| नाम वापसी की अंतिम तिथि | 11 जून, 2026 |
| मतदान (Voting) की तिथि | 18 जून, 2026 (सुबह 9:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक) |
| मतगणना (Counting) और परिणाम | 18 जून, 2026 (शाम 5:00 बजे से) |
बिहार विधान परिषद का चुनावी गणित
बिहार विधानसभा में वर्तमान में विधायकों की कुल संख्या 243 है। विधान परिषद के इस आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाले चुनाव में एक सदस्य (MLC) को सीधे तौर पर निर्वाचित होने के लिए न्यूनतम 25 विधायकों के प्रथम वरीयता के वोटों की आवश्यकता होती है। इस संख्या बल के हिसाब से सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और विपक्षी महागठबंधन के बीच सीटों का बंटवारा बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा है।
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NDA का आंतरिक सीट-शेयरिंग फॉर्मूला
इस बार खाली हो रही 9 नियमित सीटों और 1 उपचुनाव वाली सीट को मिलाकर कुल 10 सीटों पर मुकाबला है। एनडीए खेमे में सीटों का समीकरण इस प्रकार बन रहा है
- जनता दल यूनाइटेड (JDU) – खाली हो रही सीटों में से 4 वर्तमान में जदयू के पास थीं। पार्टी अपने पुराने कोटे को बरकरार रखते हुए 4 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।
- भारतीय जनता पार्टी (BJP) – वर्तमान में भाजपा के 2 सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। विधानसभा के मजबूत संख्या बल के कारण इस बार भाजपा के खाते में 3 सीटें आ रही हैं।
- सहयोगी दल – भाजपा अपने कोटे से 1 सीट उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) और 1 सीट चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को देने पर सहमत हुई है।
महागठबंधन का नुकसान
विपक्षी खेमे में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस के कई सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव के बाद बदले समीकरणों के कारण राजद को इस बार सीटों का नुकसान उठाना पड़ रहा है। राजद अब सिर्फ 1 सीट आसानी से निकालने की स्थिति में है, जबकि कांग्रेस के डॉ. समीर कुमार सिंह का कार्यकाल खत्म होने के बाद कांग्रेस के लिए दोबारा सीट जीतना बिना अतिरिक्त समर्थन के असंभव सा दिख रहा है।
नीतीश कुमार की सीट और नए चेहरों की एंट्री
पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से जो सीट रिक्त हुई है, उसका कार्यकाल 6 मई, 2030 तक है। इस महत्वपूर्ण उपचुनाव वाली सीट को लेकर जदयू के भीतर बड़ी रणनीतिक तैयारी है।
निशांत कुमार की एंट्री – राजनैतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि बिहार के स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार को नीतीश कुमार की इसी खाली हुई सीट (कार्यकाल 2030 तक) से विधान परिषद भेजा जा सकता है। वर्तमान में वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं और संवैधानिक नियमों के अनुसार मंत्री पद पर बने रहने के लिए उनका 6 महीने के भीतर सदस्य बनना अनिवार्य है।
इसके साथ ही, रालोमो (RLM) कोटे से बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का विधान परिषद जाना लगभग तय माना जा रहा है। वहीं, चिराग पासवान की एलजेपी (आर) की ओर से युवाओं को मौका देते हुए उनके भांजे सीमांत मृणाल को उच्च सदन भेजने की पुरजोर चर्चा है।
भाजपा में भी सम्राट चौधरी के विधायक बनने और अन्य सीटों के खाली होने के कारण तीनों सीटों पर पूरी तरह से नए और चौंकाने वाले चेहरों को मौका मिलने की उम्मीद है, जिसमें सामाजिक संतुलन (सवर्ण, पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग) का विशेष ध्यान रखा जाएगा।
क्यों अहम है यह चुनाव?
बिहार विधान परिषद का यह चुनाव किसी आम चुनाव की तरह जनता के बीच नहीं लड़ा जाता, लेकिन राज्य की नीति निर्धारण और सरकार के मंत्रियों की रीढ़ मजबूत करने के लिए यह बेहद संवेदनशील है। आगामी 18 जून को होने वाले मतदान और उसी शाम आने वाले परिणाम बिहार की राजनीति में एनडीए के बढ़ते वर्चस्व और विपक्षी खेमे की नई घेराबंदी को स्पष्ट रूप से रेखांकित करेंगे।







