नई दिल्ली / वाशिंगटन:वैश्विक व्यापार के मंच पर एक बार फिर बड़ी हलचल शुरू हो गई है। अमेरिका ने एक चौंकाने वाला कदम उठाते हुए भारत समेत दुनिया के 54 देशों से आने वाले सामान पर 12.5 प्रतिशत का अतिरिक्त सीमा शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने इन देशों पर आरोप लगाया है कि वे अपने यहाँ बलपूर्वक श्रम (बंधुआ मजदूरी) से बनने वाले उत्पादों के आयात को रोकने में नाकाम रहे हैं।यह फैसला ऐसे नाजुक समय पर आया है जब भारत और अमेरिका के बीच एक बड़े द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर बातचीत अपने अंतिम दौर में पहुंच चुकी है। जानकारों का मानना है कि अमेरिका के इस कदम से चल रही व्यापार वार्ताओं पर गहरा असर पड़ सकता है।
क्या है पूरा मामला और क्यों घिरे भारत-चीन?
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय की ताजा रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि भारत उन देशों की सूची में शामिल है, जिन्होंने बलपूर्वक श्रम से तैयार माल के आयात पर रोक लगाने और नियमों को कड़ाई से लागू करने में अपेक्षित कड़ाई नहीं दिखाई। इसी को आधार बनाकर भारत पर साढ़े बारह प्रतिशत अतिरिक्त कर लगाने की सिफारिश की गई है। इस लपेटे में सिर्फ भारत ही नहीं है, बल्कि चीन, जापान और कई अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी शामिल हैं।दरअसल, यह पूरी कार्रवाई अमेरिकी ‘व्यापार अधिनियम, 1974’ की धारा 301 के तहत की जा रही है। यह अमेरिकी कानून वहां के प्रशासन को यह अधिकार देता है कि अगर उसे किसी देश की व्यापार नीति अनुचित या भेदभावपूर्ण लगती है, तो वह उसके खिलाफ एकतरफा कार्रवाई या जांच कर सकता है। याद दिला दें कि मार्च 2026 में अमेरिकी प्रशासन ने दुनिया के 60 देशों के खिलाफ एक व्यापक जांच शुरू की थी, और यह नया प्रस्ताव उसी जांच का परिणाम है।
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अमेरिका की दलील: ‘अवैध प्रतिस्पर्धा स्वीकार्य नहीं’
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीयर ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि मजबूर और बंधुआ मजदूरों से बने सामान को वैश्विक बाजार में बिकने देना अमेरिकी श्रमिकों के साथ अन्याय है। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसे उत्पाद बेहद कम लागत में तैयार हो जाते हैं, जिससे अमेरिकी कंपनियों को बाजार में टिकने में कठिनाई होती है। अमेरिका चाहता है कि उसके जितने भी सहयोगी या व्यापारिक साझेदार देश हैं, वे इस तरह के उत्पादों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाएं।
भारत का रुख: ‘दबाव बनाने की रणनीति’
इस पूरे घटनाक्रम पर भारत सरकार ने काफी नपा-तुला और संभलकर बयान दिया है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, इस मामले पर अमेरिकी प्रशासन के साथ बातचीत का दौर चल रहा है और ‘धारा 301’ से जुड़े हर बिंदु पर चर्चा की जा रही है। भारत ने पहले भी इन आरोपों को सिरे से खारिज किया था और कहा था कि इस जांच को शुरू करने के लिए अमेरिका के पास कोई ठोस प्रमाण या आधार नहीं थे।बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह कदम भारत पर व्यापार समझौते के दौरान दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति भी हो सकता है। हालांकि, अगर दोनों देश जल्द ही किसी सहमति पर पहुंच जाते हैं, तो इन प्रस्तावित शुल्कों को टाला या कम किया जा सकता है।
सिर्फ भारत नहीं, निशाने पर अमेरिकी मित्र देश भी
यह कार्रवाई सिर्फ एशियाई देशों तक सीमित नहीं है। अमेरिका ने जिन 60 देशों की समीक्षा की थी, उनमें से अलग-अलग श्रेणियों के हिसाब से कुछ पर 10 प्रतिशत तो कुछ पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त कर लगाने का खाका तैयार किया गया है। आश्चर्य की बात यह है कि अमेरिका के सबसे करीबी माने जाने वाले यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया को भी इस दायरे में रखा गया है।
आगे क्या होगा?
राहत की बात यह है कि यह अमेरिका का अंतिम फैसला नहीं है, बल्कि सिर्फ एक प्रस्ताव है। अमेरिकी सरकार ने इस पर आम जनता और उद्योग जगत से सुझाव व आपत्तियां मांगी हैं। जुलाई के पहले सप्ताह में इस मुद्दे पर एक सार्वजनिक सुनवाई भी होने वाली है, जिसके बाद ही कोई आखिरी मुहर लगेगी। लेकिन अगर यह प्रस्ताव इसी रूप में लागू हो गया, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और भारत-अमेरिका के संबंधों में नया तनाव पैदा होना निश्चित है।







