वाशिंगटन ।अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में फंसे जहाजों को बाहर निकालने के लिए ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ नाम से एक विशेष अभियान शुरू करने की घोषणा की है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर कई देशों के जहाज फंसे हुए हैं और वहां हालात सामान्य नहीं हैं।ट्रंप ने कहा कि इस मिशन का मकसद फंसे हुए जहाजों और उनके नाविकों को सुरक्षित रास्ता देना है। उन्होंने यह भी बताया कि कई देशों ने अमेरिका से मदद की मांग की थी, जिसके बाद यह कदम उठाया है।
क्या है हॉर्मुज़ का संकट और क्यों फंसे हैं जहाज?
हॉर्मुज़ कोई आम समुद्री रास्ता नहीं है। यह दुनिया की ‘लाइफलाइन’ है। यह खाड़ी देशों को अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया का लगभग 20 से 30 प्रतिशत कच्चा तेल इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। पिछले कुछ हफ्तों से ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनातनी ने इस रास्ते को एक ‘ट्रैप’ में बदल दिया है।तनाव इतना बढ़ गया है कि दर्जनों मालवाहक जहाज और विशाल तेल टैंकर हॉर्मुज़ के मुहाने पर खड़े हैं। कुछ को सुरक्षा का डर है, तो कुछ को तकनीकी और कूटनीतिक पाबंदियों ने रोक रखा है। इन जहाजों पर मौजूद चालक दल की स्थिति अब बदतर होती जा रही है। यही वह पृष्ठभूमि है जहाँ ट्रंप ने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ के जरिए खुद को दुनिया के रक्षक के तौर पर पेश किया है।
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ईरान की जवाबी चेतावनी: ‘आग से न खेले अमेरिका’
जैसे ही वॉशिंगटन से प्रोजेक्ट फ्रीडम की खबर ईरान पहुंची, तेहरान की भाषा सख्त हो गई। ईरान के सैन्य अधिकारियों ने इसे अपनी समुद्री सीमा का उल्लंघन करार दिया है। ईरान का तर्क सीधा है—हॉर्मुज़ की सुरक्षा की चाबी उनके पास है और किसी भी विदेशी हस्तक्षेप को ‘आक्रामकता’ माना जाएगा।विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिकी बेड़े और ईरानी ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड्स’ की नौकाएं आमने-सामने आती हैं, तो एक छोटी सी चिंगारी भी पूरे इलाके को युद्ध की आग में झोंक सकती है। ईरान ने संकेत दिया है कि वह अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, जिससे प्रोजेक्ट फ्रीडम का रास्ता कांटों भरा नजर आ रहा है।
नाविकों की आपबीती: राशन खत्म, उम्मीदें कायम
हॉर्मूज़ में फंसे जहाजों पर भारत सहित कई देशों के हजारों नाविक सवार हैं। सैटेलाइट फोन के जरिए जो खबरें आ रही हैं, वे दिल दहला देने वाली हैं। कई जहाजों पर ताजे पानी की सप्लाई खत्म होने को है। भोजन का स्टॉक सीमित कर दिया गया है।महीनों से घर से दूर ये नाविक अब मानसिक तनाव के शिकार हो रहे हैं। ट्रंप का यह ऐलान उनके लिए उम्मीद की एक किरण जैसा है। एक भारतीय नाविक के परिजन ने बताया, “हमें नहीं पता कि राजनीति क्या है, हमें बस इतना पता है कि हमारे अपने सही-सलामत घर लौट आएं।” प्रोजेक्ट फ्रीडम को मानवीय मिशन कहना इसी दर्द को कम करने की एक कोशिश है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर ‘हॉन्टेड’ असर
हॉर्मुज़ में एक दिन की देरी का मतलब है करोड़ों डॉलर का नुकसान। कच्चे तेल की सप्लाई बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उछाल आने लगा है। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर हैं, उनके लिए यह खबर सीधे तौर पर महंगाई बढ़ने का संकेत है।अगर ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ के दौरान कोई सैन्य टकराव होता है, तो कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। यही वजह है कि शेयर बाजार से लेकर आम आदमी की रसोई तक, हर कोई इस खबर पर नजर गड़ाए बैठा है। व्यापारिक संगठन डरे हुए हैं कि अगर बीमा कंपनियों ने इस रूट को ‘वॉर ज़ोन’ घोषित कर दिया, तो जहाजों का आना-जाना पूरी तरह ठप हो जाएगा।
क्या यह स्थायी समाधान है?
रक्षा और विदेशी मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह कदम तात्कालिक तौर पर जहाजों को राहत दे सकता है, लेकिन यह घाव का इलाज नहीं बल्कि उस पर पट्टी बांधने जैसा है। असली समस्या वाशिंगटन और तेहरान के बीच का अविश्वास है। जब तक दोनों पक्ष बातचीत की मेज पर नहीं बैठते, तब तक हॉर्मुज़ में ऐसे प्रोजेक्ट्स की जरूरत पड़ती रहेगी। कुछ का तो यह भी कहना है कि ट्रंप इस मिशन के बहाने घरेलू राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं।
इतिहास के चौराहे पर खाड़ी
‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ केवल जहाजों को निकालने का नाम नहीं है, यह महाशक्तियों की मूंछ की लड़ाई बन चुका है। ट्रंप ने अपनी चाल चल दी है। अब दुनिया की सांसें थमी हुई हैं। क्या अमेरिकी बेड़े सुरक्षित तरीके से जहाजों को निकाल पाएंगे? क्या ईरान संयम बरतेगा? या फिर हॉर्मुज़ की लहरें खून से लाल होंगी?ये सवाल आज हर उस इंसान के जेहन में हैं जो शांति की उम्मीद करता है। फिलहाल, हॉर्मुज़ का समुद्री रास्ता एक ऐसे मुहाने पर खड़ा है जहाँ एक तरफ आजादी की उम्मीद है और दूसरी तरफ संघर्ष का गहरा साया। आने वाले 48 घंटे तय करेंगे कि दुनिया किस दिशा में जाएगी।







