पश्चिम एशिया में जारी संकट के बीच अमरीका और ईरान की बयानबाजी जारी है ।अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दावा किया कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व के बीच मतभेद हैं और वहां सत्ता को लेकर स्पष्टता नहीं है, दूसरी ओर ईरानी नेतृत्व ने अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए कहा कि उनका देश “एक रूह” की तरह है। तेहरान के मुताबिक, इस तरह की बयानबाजी का मकसद सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मंच पर ईरान की छवि धूमिल करना और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना है।दरअसल, ट्रंप ने एक कार्यक्रम के दौरान संकेत दिया था कि ईरान में यह स्पष्ट नहीं है कि ‘कमान’ किसके हाथ में है। उन्होंने वहां के नेतृत्व के बीच भ्रम और सत्ता संघर्ष की बात कही थी। जानकारों की मानें तो ट्रंप का यह दांव ईरान के आत्मविश्वास को चोट पहुँचाने की एक सोची-समझी कूटनीति का हिस्सा है।
ईरान का पलटवार
ट्रंप के बयान के बाद ईरान के कई बड़े नेताओं और अधिकारियों ने लगभग एक जैसी भाषा में प्रतिक्रिया दी। सभी ने एक बात दोहराई—ईरान में कोई मतभेद नहीं है और देश मजबूत एकता के साथ खड़ा है।ईरान के वरिष्ठ अधिकारियों ने ट्रंप के दावों पर तंज कसते हुए कहा कि जो लोग खुद अपने देश में राजनीतिक टकराव का सामना कर रहे हैं, वे हमें एकता का पाठ न पढ़ाएं। ईरान का तर्क है कि उनका देश एक ऐसी व्यवस्था से चलता है जहां अंतिम निर्णय लेने की प्रक्रिया बहुत साफ है। वहां सर्वोच्च नेता का पद सबसे ऊपर है, जो सेना, सरकार और धार्मिक संस्थानों के बीच एक पुल का काम करता है। तेहरान के अनुसार, अमेरिका यह हजम नहीं कर पा रहा है कि दशकों के कड़े प्रतिबंधों के बावजूद ईरान न केवल स्थिर है, बल्कि क्षेत्रीय राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत बनाए हुए है।
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ट्रंप का बयान : मनोवैज्ञानिक दवाब बनाने की चाल?
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने बयान में संकेत दिया कि ईरान के भीतर असली पावर किसके पास है, इसे लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। उनके मुताबिक, ईरान की धार्मिक सत्ता, सुरक्षा बल और चुनी हुई सरकार के बीच तालमेल की भारी कमी है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान महज एक सामान्य टिप्पणी नहीं थी, बल्कि यह ईरान के भीतर असंतोष को हवा देने और वैश्विक स्तर पर उसकी साख को कमजोर करने की एक सोची-समझी रणनीति है। अमेरिका अक्सर अधिकतम दबाव की नीति पर चलता रहा है। जब किसी देश पर आर्थिक प्रतिबंध काम नहीं करते, तो वहां की जनता और नेताओं के बीच अविश्वास पैदा करना एक पुराना कूटनीतिक हथियार रहा है। ट्रंप के इस दावे को इसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है।
तेल की राजनीति
यह पूरा विवाद एक ऐसे समय में हो रहा है जब समुद्र से लेकर खाड़ी के देशों तक तनाव अपने चरम पर है। दुनिया की तेल सप्लाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी इलाके से गुजरता है। अगर अमेरिका और ईरान के बीच यह शब्दों की जंग बढ़ती है, तो इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल की वैश्विक कीमतों पर पड़ सकता है। ट्रंप का बयान उस समय आया है जब इजरायल और ईरान समर्थित गुटों के बीच टकराव चल रहा है। ऐसे में ईरान के लिए यह दिखाना बहुत जरूरी है कि वह अंदर से पूरी तरह एकजुट है, ताकि उसके सहयोगियों का मनोबल ऊंचा बना रहे।
क्या तनाव और बढ़ेगा ?
मौजूदा हालात को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि दोनों देशों के बीच यह तल्खी जल्द खत्म होगी। अमेरिका जहां आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ाना चाहता है, वहीं ईरान अपनी विरोध की नीति पर कायम है। तेहरान का संदेश बहुत साफ है कि वह अपनी शर्तों पर ही अंतरराष्ट्रीय संबंध तय करेगा और अपनी एकता को किसी भी बाहरी प्रचार की भेंट नहीं चढ़ने देगा। ट्रंप के बयान ने भले ही अखबारों की सुर्खियां बटोरी हों, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ईरान ने अपनी सुरक्षा और घेराबंदी को और ज्यादा सख्त कर लिया है।
कुल मिलाकर, ट्रंप का बयान और ईरान का पलटवार यह दिखाता है कि आज के दौर में लड़ाई सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि सूचनाओं और दावों से भी लड़ी जाती है। ईरान ने अपनी आंतरिक दरारों की बात को सिरे से नकार कर यह संदेश दिया है कि वह किसी भी दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं है। दूसरी ओर, अमेरिका की तरफ से ऐसे बयानों का आना भी बंद नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह चिंता की बात है क्योंकि बयानों की यह मामूली सी चिंगारी किसी भी वक्त एक बड़े विवाद को जन्म दे सकती है। फिलहाल, तेहरान ने अपना एकजुट चेहरा दिखाकर ट्रंप के इस कूटनीतिक दांव को नाकाम करने की पूरी कोशिश की है। ईरान के लिए उसकी एकता अब केवल राजनीति नहीं, बल्कि उसके वजूद की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि यह जुबानी जंग किसी समझौते पर खत्म होती है या फिर तनाव का यह सिलसिला और लंबा खिंचता है।







