वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि जब तक ईरान के साथ हुआ समझौता पूरी तरह लागू नहीं हो जाता, तब तक अमेरिकी सेना क्षेत्र में तैनात रहेगी। ट्रंप के इस बयान ने न केवल पश्चिम एशिया में तनाव को फिर से बढ़ा दिया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता की लहर पैदा कर दी है।
ट्रंप ने अपने हालिया बयान में कहा कि अमेरिका किसी भी स्थिति के लिए तैयार है और यदि ईरान ने समझौते का उल्लंघन किया तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अमेरिकी सेना भविष्य की संभावित कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। उनके शब्दों में झलकती सख्ती यह बताती है कि अमेरिका इस बार किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है।
सख्त लहजा या सियासी मजबूरी?
ट्रंप का यह बयान उनकी उसी पुरानी ‘अमेरिका फर्स्ट’ वाली छवि का हिस्सा है। उन्होंने साफ कर दिया है कि अमेरिका किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। उनके शब्दों में जो कड़वाहट और सख्ती थी, वह यह बताने के लिए काफी है कि वाशिंगटन अब कूटनीतिक शिष्टाचार के पीछे छिपने के मूड में नहीं है। ट्रंप का कहना है कि अगर ईरान ने समझौते की लक्ष्मण रेखा लांघी, तो परिणाम ‘विनाशकारी’ होंगे।
लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि क्या यह वाकई सुरक्षा की चिंता है या फिर आने वाले चुनावों और घरेलू राजनीति का दबाव? इतिहास गवाह है कि जब-जब अमेरिका में नेतृत्व को खुद को मजबूत दिखाना होता है, तब-तब बाहरी दुश्मन का हौवा खड़ा करना सबसे आसान रास्ता होता है। हालाँकि, इस बार की सख्ती कुछ ज्यादा ही व्यक्तिगत और तीखी महसूस हो रही है
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युद्धविराम: एक राहत या सांस लेने की मोहलत?
करीब छह हफ्तों तक जब दोनों देशों की बंदूकें एक-दूसरे की ओर तनी हुई थीं, तब एक अस्थायी युद्धविराम की खबर आई। दुनिया ने राहत की सांस ली, स्टॉक मार्केट ऊपर चढ़े और लगा कि शायद कूटनीति जीत गई। लेकिन जब जमीनी हकीकत को देखें तो यह युद्धविराम किसी ‘शांति संधि’ जैसा नहीं, बल्कि मुक्केबाजी के खेल में दो राउंड्स के बीच मिलने वाले उस ‘ब्रेक’ जैसा है, जहाँ दोनों खिलाड़ी अपनी चोटें सहला रहे हैं और अगले राउंड में और जोर से प्रहार करने की रणनीति बना रहे हैं। अमेरिका अपने युद्धपोतों को री-पोजीशन कर रहा है, और ईरान अपनी मिसाइल यूनिट्स को ट्यून कर रहा है। यह शांति नहीं, बल्कि एक ‘स्ट्रेटेजिक पॉज’ है। विशेषज्ञों का तो यहाँ तक कहना है कि इस दौरान अविश्वास की खाई और गहरी हुई है।
परमाणु कार्यक्रम: वो जिन्न जो बोतल से बाहर है
इस पूरी जंग की असली जड़ वह ‘परमाणु जिन्न’ है जिसे कोई भी बोतल में बंद नहीं कर पा रहा। अमेरिका का सीधा और सरल तर्क है—ईरान को परमाणु हथियार बनाने का कोई हक नहीं है क्योंकि वह इस क्षेत्र की स्थिरता के लिए खतरा है। इसके विपरीत, ईरान का अपना एक अलग राग है। तेहरान का कहना है कि उसका कार्यक्रम केवल बिजली बनाने और मेडिकल रिसर्च के लिए है।
लेकिन राजनीति में ‘सच’ वही होता है जिसे ताकतवर देश सच मान लें। ईरान की दलील को अमेरिका ‘सफेद झूठ’ करार देता रहा है। अविश्वास का आलम यह है कि अगर ईरान एक कदम पीछे हटता भी है, तो अमेरिका को लगता है कि वह लंबी छलांग लगाने के लिए पीछे हटा है। जब तक ‘इंस्पेक्शन’ और ‘लिमिटेशन’ के बीच का यह गणित नहीं सुलझता, तब तक खाड़ी में बारूद की गंध आती रहेगी।
होरमुज: दुनिया की रग पर ईरान का हाथ
अगर परमाणु कार्यक्रम इस विवाद की आत्मा है, तो ‘होरमुज जलडमरूमध्य’ इसकी धड़कन है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। ईरान बखूबी जानता है कि उसके पास एक ऐसा बटन है जिसे दबाते ही पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था अंधेरे में डूब सकती है।ट्रंप की सैन्य तैनाती का एक बड़ा मकसद इस ‘चोक पॉइंट’ को ईरान के कब्जे से बचाना है। अमेरिका चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय जल सीमा में व्यापार बिना किसी रोक-टोक के चले, जबकि ईरान इसे अपनी ‘ढाल’ और ‘तलवार’ दोनों की तरह इस्तेमाल करता है। अगर यहाँ एक भी चिंगारी भड़की, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जिससे केवल अमेरिका या ईरान नहीं, बल्कि भारत जैसे विकासशील देशों की रसोई का बजट भी बिगड़ जाएगा।
बयानों का मायाजाल और जनता का भ्रम
अजीब बात यह है कि इस विवाद में दावों और प्रतिदावों का एक ऐसा मकड़जाल बुना गया है कि आम आदमी के लिए सच को पहचानना नामुमकिन हो गया है। एक तरफ वाशिंगटन से खबर आती है कि “हमने ईरान को घुटनों पर ला दिया है,” तो दूसरी तरफ तेहरान से खामनेई और सेना प्रमुख दहाड़ते हैं कि “अमेरिका की सैन्य शक्ति कागजी शेर है।
“यह ‘प्रोपेगेंडा वॉर’ कभी-कभी वास्तविक युद्ध से भी ज्यादा खतरनाक होती है क्योंकि यह जनता के मन में जहर भरती है। सोशल मीडिया के इस दौर में आधी-अधूरी जानकारियां आग में पेट्रोल का काम कर रही हैं। लोग यह नहीं समझ पा रहे कि शांति की बातें करने वाले नेता पर्दे के पीछे युद्ध की तैयारी क्यों कर रहे हैं।
इस्लामाबाद की मेज: आखिरी उम्मीद?
तनाव के इन काले बादलों के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद एक उम्मीद की किरण बनकर उभरी है। प्रस्तावित ‘इस्लामाबाद वार्ता’ को लेकर कूटनीति के गलियारों में काफी चर्चा है। पाकिस्तान का इस पूरे मामले में एक ‘मिडिएटर’ के रूप में उभरना दिलचस्प है।लेकिन क्या इस्लामाबाद में होने वाली चाय की चुस्कियां बरसों पुरानी कड़वाहट को खत्म कर पाएंगी?
वार्ता की मेज पर बैठना एक बात है और अपनी शर्तों में लचीलापन लाना दूसरी बात। अमेरिका चाहता है कि ईरान पूरी तरह सरेंडर कर दे, और ईरान चाहता है कि उस पर लगे सारे आर्थिक प्रतिबंध हटा लिए जाएं। ये दोनों माँगें उत्तर और दक्षिण ध्रुव की तरह हैं, जिनका मिलना फिलहाल नामुमकिन सा लगता है। फिर भी, “बातचीत से ही बात बनती है,” इसी उम्मीद पर दुनिया टिकी है।
वैश्विक असर
एक पुरानी कहावत है कि जब दो हाथी लड़ते हैं, तो नुकसान हमेशा घास का होता है। इस लड़ाई में अमेरिका और ईरान तो बड़े खिलाड़ी हैं, लेकिन इसका खामियाजा छोटे और विकासशील देश भुगत रहे हैं। सप्लाई चेन का टूटना, माल ढुलाई का महंगा होना और अनिश्चितता का माहौल—ये सब मिलकर एक ‘ग्लोबल मंदी’ की दावत दे रहे हैं।
यूरोपीय देश भी इस मामले में बंटे हुए नजर आ रहे हैं। कुछ अमेरिका के साथ खड़े हैं, तो कुछ को लगता है कि ट्रंप की नीतियां जरूरत से ज्यादा आक्रामक हैं। इस मतभेद का फायदा ईरान उठा रहा है। कुल मिलाकर, वैश्विक कूटनीति इस समय एक ऐसे दौर में है जहाँ कोई भी पक्ष हार मानने को तैयार नहीं है।
शांति या सर्वनाश ?
आज हम जिस मुकाम पर खड़े हैं, वहां से दो ही रास्ते निकलते हैं। पहला रास्ता इस्लामाबाद की वार्ता से होकर निकलता है, जहाँ दोनों पक्ष थोड़ा झुकें, थोड़ा समझौता करें और दुनिया को युद्ध की विभीषिका से बचा लें। दूसरा रास्ता ट्रंप की उस ‘सख्त चेतावनी’ का है, जो अगर कार्रवाई में बदली, तो पश्चिम एशिया को एक ऐसे दलदल में धकेल देगी जिससे निकलना दशकों तक संभव नहीं होगा।
यह समझना जरूरी है कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं होता, वह केवल नई समस्याओं को जन्म देता है। ट्रंप की सख्ती और ईरान की जिद के बीच पिस रही है वह निर्दोष जनता, जो केवल शांति और स्थिरता चाहती है। आने वाले कुछ हफ्ते यह तय करेंगे कि इतिहास हमें एक ‘शांतिपूर्ण समाधान’ के लिए याद रखेगा या फिर ‘एक और युद्ध’ की शुरुआत के लिए।







