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अरुणाचलम मुरुगनन्थम- मासिक धर्म स्वच्छता के जननायक जिन्होंने लाखों महिलाओं के जीवन में  लाया बदलाव

अरुणाचलम मुरुगनन्थम- मासिक धर्म स्वच्छता के जननायक जिन्होंने लाखों महिलाओं के जीवन में  लाया बदलाव
नवजोत कौर सिद्धू
On: जून 10, 2026 2:11 अपराह्न
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​अरुणाचलम मुरुगनन्थम भारत के एक दूरदर्शी सामाजिक उद्यमी हैं जिन्होंने ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य और मासिक धर्म स्वच्छता (Menstrual Hygiene) के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व क्रांति की नींव रखी। उन्हें दुनिया भर में ‘पैडमैन’ (Padman) के नाम से जाना जाता है।

​उन्होंने एक ऐसी कम लागत वाली सैनिटरी पैड बनाने वाली मशीन का आविष्कार किया जिसने न केवल गरीब महिलाओं को गंभीर बीमारियों से बचाया बल्कि ग्रामीण भारत में महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए। मासिक धर्म जैसे सामाजिक रूप से वर्जित विषय (Taboo) पर खुलकर काम करना और समाज की सोच को बदलना ही उन्हें सबसे विशेष और महत्वपूर्ण बनाता है।

​प्रारंभिक जीवन-गरीबी, संघर्ष और प्रेरणा

  • जन्म तिथि और स्थान-अरुणाचलम मुरुगनन्थम का जन्म वर्ष 1962 में तमिलनाडु के कोयंबटूर में हुआ था।
  • पारिवारिक पृष्ठभूमि और बचपन-उनका बचपन अत्यधिक गरीबी में बीता। उनके पिता एस. अरुणाचलम एक हथकरघा बुनकर थे जिनका मुरुगनन्थम के बचपन में ही एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था। उनकी मां वनियाम्मल ने खेतों में मजदूरी करके परिवार को पाला।
  • शिक्षा-तंगहाली के कारण उन्हें मात्र 14 वर्ष की आयु में कक्षा 10वीं में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
  • शुरुआती संघर्ष-परिवार की मदद के लिए उन्होंने कम उम्र में ही विभिन्न प्रकार के काम किए जैसे बुनकरों के लिए सूत की आपूर्ति करना मशीन टूल्स की दुकान पर काम करना और वेल्डिंग करना। वे एक बेहद साधारण और गरीब पृष्ठभूमि से थे लेकिन उनमें चीजों को बारीकी से समझने और नए प्रयोग करने की अद्भुत ‘प्रतिभा’ थी।
  • बदलाव की वो एक घटना (प्रेरणा)-वर्ष 1998 में उनकी शादी शांति से हुई। एक दिन मुरुगनन्थम ने देखा कि उनकी पत्नी कपड़े के कुछ गंदे, बदबूदार चिथड़े छिपाकर ले जा रही थी। पूछने पर पता चला कि वह मासिक धर्म के दौरान उसका उपयोग करती थी। जब मुरुगनन्थम ने पूछा कि वह बाजार से पैड क्यों नहीं खरीदती तो शांति ने कहा कि अगर वह पैड खरीदने लगेगी तो घर के राशन के लिए पैसे कम पड़ जाएंगे। इसी घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

व्यक्तिगत चुनौतियाँ-सामाजिक बहिष्कार और विपरीत परिस्थितियाँ


​मुरुगनन्थम का सफर आसान नहीं था। जब उन्होंने अपनी पत्नी के लिए खुद सैनिटरी पैड बनाने का फैसला किया तो उन्हें भयंकर सामाजिक और व्यक्तिगत चुनौतियों का सामना करना पड़ा

  • आर्थिक तंगी-बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पैड महंगे क्यों हैं यह जानने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। उन्होंने कच्चे माल (सेल्युलोज) और मशीनरी को समझने में अपनी जमा-पूंजी लगा दी।
  • स्वयं पर प्रयोग और सामाजिक कलंक-ग्रामीण महिलाओं और मेडिकल कॉलेज की छात्राओं द्वारा उनके बनाए पैड का फीडबैक देने से मना करने पर मुरुगनन्थम ने खुद पर पैड का परीक्षण करने का फैसला किया। वे मूत्राशय (Bladder) के रूप में एक फुटबॉल की रबर ट्यूब में बकरी का खून भरकर अपनी कमर से बांधते थे और चलते-फिरते साइकिल चलाते समय उसे दबाते थे ताकि पैड की सोखने की क्षमता जांची जा सके।
  • अपनों का साथ छूटना-जब उनके कपड़ों पर खून के धब्बे दिखने लगे तो गांव वालों ने उन्हें “सनकी” या “तांत्रिक” समझ लिया। अंधविश्वास और सामाजिक शर्म के कारण उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर चली गईं और कुछ समय बाद उनकी मां ने भी उनका साथ छोड़ दिया। वे समाज में पूरी तरह एकाकी हो गए  लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

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​करियर और मुख्य जीवन यात्रा-आविष्कार से बड़ी सफलता तक

  • सफर की शुरुआत (2000-2004)-मुरुगनन्थम को यह समझने में 4 साल से अधिक का समय लगा कि व्यावसायिक पैड ‘लकड़ी के गूदे’ (Wood Pulp/Cellulose) से बनते हैं। उन्होंने इस गूदे को प्रोसेस करने के लिए चार सरल मशीनों का एक सेट तैयार किया।
  • महत्वपूर्ण मोड़ (2006)-उन्होंने अपनी पहली कम लागत वाली मशीन बनाई और उसे पेटेंट के लिए आईआईटी मद्रास (IIT Madras) भेजा। आईआईटी ने इस नवाचार को राष्ट्रीय नवाचार फाउंडेशन (NIF) के पुरस्कारों के लिए नामांकित किया।
  • प्रसिद्धि की ओर बढ़ता सफर-उनकी मशीन की कीमत बहुराष्ट्रीय कंपनियों की करोड़ों की मशीनों के मुकाबले मात्र ₹65,000 थी। इसके बाद उन्होंने ‘जयश्री इंडस्ट्रीज’ की स्थापना की और इन मशीनों को व्यावसायिक रूप से बेचने के बजाय ग्रामीण महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को देना शुरू किया।

​प्रमुख उपलब्धियाँ, पुरस्कार और सम्मान


​मुरुगनन्थम ने अपने आविष्कार से वैश्विक पटल पर भारत का नाम रोशन किया

  • राष्ट्रीय नवाचार फाउंडेशन पुरस्कार (2006)-तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया।
  • पद्म श्री (2016)-भारत सरकार द्वारा उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से नवाजा गया।
  • टाइम पत्रिका (2014)-‘टाइम’ मैग्जीन ने उन्हें दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया।
  • सामाजिक प्रभाव-आज उनकी मशीनें भारत के 29 से अधिक राज्यों और दुनिया के कई विकासशील देशों जैसे नाइजीरिया, केन्या, फिलीपींस में स्थापित हैं जिससे लाखों महिलाओं को रोजगार और सस्ता सैनिटरी पैड मिल रहा है।

व्यक्तित्व और चरित्र-एक दूरदर्शी और विनम्र नायक

  • विनम्र और सिद्धांतवादी-मुरुगनन्थम एक बेहद विनम्र और जमीन से जुड़े व्यक्ति हैं। बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों ने उनके इस आविष्कार के पेटेंट को खरीदने के लिए करोड़ों रुपये के ऑफर दिए लेकिन उन्होंने इसे बेचने से साफ इनकार कर दिया। उनका उद्देश्य मुनाफा कमाना नहीं बल्कि गरीब महिलाओं की सेवा करना था।
  • दूरदर्शी और साहसी-जिस समाज में ‘माहवारी’ शब्द बोलना भी पाप समझा जाता था  वहां एक पुरुष होकर इस पर काम करना उनके अदम्य साहस को दर्शाता है।
  • उनका प्रसिद्ध कथन-“दुनिया के महान लोगों ने बड़ी डिग्रियां लेकर केवल पैसा कमाना और सुख-सुविधाएं जुटाना सीखा है। मैं समाज में एक ऐसा बदलाव लाना चाहता था जो किसी किताब में नहीं लिखा।”

​समाज पर प्रभाव और विरासत (Legacy)

मुरुगनन्थम ने भारतीय समाज की सबसे बड़ी वर्जना (Taboo) को तोड़ा। उनके प्रयास से ग्रामीण क्षेत्रों में सैनिटरी पैड का उपयोग बढ़ा, जिससे महिलाओं में गर्भाशय के संक्रमण और कैंसर जैसी घातक बीमारियों में भारी कमी आई।

  • सिनेमा और पुस्तकें-उनके जीवन से प्रेरित होकर बॉलीवुड में अभिनेता अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म ‘पैडमैन’ (2018) बनी। साथ ही उनकी कहानी पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘पीरियड. एंड ऑफ सेंटेंस.’ ने 2019 में ऑस्कर पुरस्कार जीता।
  • स्थायी प्रभाव-आज वे दुनिया भर के शीर्ष बिजनेस स्कूलों जैसे हार्वर्ड, आईआईटी, आईआईएम में अतिथि वक्ता के रूप में व्याख्यान देते हैं। वह इस बात का साक्षात उदाहरण हैं कि बिना किसी बड़ी डिग्री के भी समाज में एक बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

कम ज्ञात तथ्य (Lesser-Known Facts)

  • ​मुरुगनन्थम को शुरुआत में अंग्रेजी बोलना नहीं आता था लेकिन आज वे टूटी-फूटी अंग्रेजी और अपने अनोखे ह्यूमर (हास्य) के दम पर वैश्विक मंचों जैसे TED Talks में लोगों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।
  • ​जब उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर गई थीं  तो उन्होंने कानूनी तौर पर तलाक नहीं लिया था। 5 साल बाद जब मुरुगनन्थम को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और टीवी पर उनका नाम आया तब उनकी पत्नी को उनकी सच्चाई का पता चला और वे वापस एक हो गए।

​अरुणाचलम मुरुगनन्थम की कहानी केवल एक आविष्कार की कहानी नहीं है बल्कि यह एक ऐसे व्यक्ति के अटूट संकल्प, संवेदना और निस्वार्थ सेवा की गाथा है जिसने समाज के तिरस्कार को सहकर भी आधी आबादी के स्वास्थ्य की चिंता की। उन्होंने साबित कर दिया कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता और सच्ची उद्यमशीलता वह है जो पैसे कमाने के बजाय इंसानी जिंदगी को बेहतर बनाए।

एक प्रभावशाली संदेश

​”सच्ची सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि आपके बैंक खाते में कितना पैसा है बल्कि इससे मापी जाती है कि आपने अपनी रूढ़ियों को तोड़कर कितने चेहरों पर मुस्कान बिखेरी है।”


Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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