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महंगाई का नया अटैक- आंकड़ों में राहत पर मंडियों में लगी है आग

महंगाई का नया अटैक- आंकड़ों में राहत पर मंडियों में लगी है आग
नवजोत कौर सिद्धू
On: जून 17, 2026 3:10 अपराह्न
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नई दिल्ली। देश में महंगाई को लेकर रिजर्व बैंक (RBI) की कागजी रिपोर्ट भले ही ‘सब कंट्रोल में है’ का सिग्नल दे रही हो, लेकिन बाजारों का हाल कुछ और ही है। आने वाले दो-तीन महीने आम जनता की जेब पर भारी पड़ने वाले हैं। राशन से लेकर तेल-सब्जी तक, हर चीज के दाम जिस तरह भाग रहे हैं, उससे साफ है कि महंगाई का एक और तगड़ा झटका लगने वाला है। बाजार के जानकारों का कहना है कि अगर खाड़ी देशों (मिडिल ईस्ट) का तनाव नहीं थमा और मंडियों में सप्लाई का संकट ऐसे ही रहा, तो आने वाले दिनों में आम आदमी का बजट पूरी तरह बिगड़ना तय है।

मई में क्यों बिगड़ा खेल?

आंकड़ों की बात करें तो इसी साल अप्रैल में खुदरा महंगाई दर 3.48% पर थी, जो मई 2026 में उछलकर सीधे 3.93% पर पहुंच गई। पिछले कुछ महीनों से दाम थोड़े गिरे जरूर थे, जिससे लग रहा था कि राहत मिलेगी, लेकिन इस अचानक आई तेजी ने उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। कहने को तो यह आंकड़ा अभी भी आरबीआई के 4% वाले टारगेट के नीचे है, पर जमीनी हकीकत को देखते हुए इसे ‘राहत के दिन’ मानना बड़ी भूल होगी।

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रसोई का बजट हुआ बेपटरी, थाली से गायब हुआ स्वाद

इस बार आम आदमी को सबसे ज्यादा दर्द रसोई के बजट ने दिया है। पिछले कुछ हफ्तों में टमाटर, हरी सब्जियां, दालें और खाने वाला तेल अचानक महंगे हो गए हैं। मई में खाने-पीने की चीजों की महंगाई (फूड इन्फ्लेशन) का ग्राफ बढ़कर करीब 4.8% पर जा पहुंचा है। मुसीबत सिर्फ घर के राशन तक नहीं है; सब्जियां और तेल महंगे होने से होटल-रेस्टोरेंट ने भी खाने के दाम बढ़ा दिए हैं। हालत यह है कि चाहे शाकाहारी थाली हो या मांसाहारी, दोनों की ही लागत बढ़ चुकी है।

कच्चे तेल की मार और माल ढुलाई का चक्कर

घरेलू बाजारों में मची इस उथल-पुथल के पीछे एक बड़ा हाथ ग्लोबल मार्केट का भी है। मिडिल ईस्ट में जो युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं, उसकी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) लगातार महंगा हो रहा है। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल बाहर से इम्पोर्ट करता है, इसलिए वहां की छोटी सी हलचल भी हमारे यहां बड़ा संकट खड़ी कर देती है। जैसे ही डीजल के दाम बढ़ते हैं, ट्रकों का किराया यानी माल ढुलाई महंगी हो जाती है। फिर चाहे खेत की सब्जी हो या फैक्ट्री का सामान, हर चीज की कीमत अपने आप बढ़ जाती है।

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ईएमआई (EMI) कम होने की उम्मीदें टूटीं

महंगाई के इस नए तेवर ने रिजर्व बैंक (RBI) के नीति निर्माताओं को भी उलझन में डाल दिया है। लोग आस लगाए बैठे थे कि महंगाई कम होगी तो आरबीआई ब्याज दरों में कटौती करेगा, जिससे होम लोन और कार लोन की ईएमआई थोड़ी सस्ती हो जाएगी। लेकिन अब केंद्रीय बैंक ने साफ कर दिया है कि वित्त वर्ष 2026-27 में महंगाई का दबाव पुराना अनुमानों से कहीं ज्यादा रह सकता है। साफ है कि जब तक कीमतें काबू में नहीं आतीं, आरबीआई ब्याज दरों में कोई ढील नहीं देने वाला। यानी सस्ते कर्ज के लिए अभी और इंतजार करना होगा।

अब सिर्फ मानसून और शांति का भरोसा

आगे क्या होगा, यह बहुत हद तक इस साल के मानसून पर निर्भर करता है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर देश में बारिश अच्छी रही और खरीफ की फसलें बम्पर हुईं, तो खाने-पीने की चीजों के दाम नीचे आ सकते हैं। लेकिन अगर मौसम ने दगा दिया या अल-नीनो जैसी कोई स्थिति बनी, तो खाने के लाले पड़ जाएंगे। साथ ही, पश्चिम एशिया के तनाव का कम होना भी जरूरी है ताकि तेल का बाजार शांत हो सके। कुल मिलाकर, आने वाले दो-तीन महीने बहुत नाजुक हैं और सरकार से लेकर आम उपभोक्ता तक, हर किसी को फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment

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