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लेबनान में थमी तोपों की गूंज- इजरायल और हिजबुल्लाह में युद्धविराम अमरीकी दबाव आया काम

लेबनान में थमी तोपों की गूंज- इजरायल और हिजबुल्लाह में युद्धविराम अमरीकी दबाव आया काम
नवजोत कौर सिद्धू
On: जून 20, 2026 1:38 अपराह्न
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बेरूत/यरुशलम। हफ्तों से जारी खून-खराबे, चीख-पुकार और आसमान से बरसते बारूद के बीच आखिरकार लेबनान और इजरायल की सीमा पर सन्नाटा पसरा है। चौबीसों घंटे रॉकेटों, मिसाइलों और हवाई हमलों से दहल रहे इस पूरे इलाके को थोड़ी राहत मिल गई है, क्योंकि इजरायल और हिजबुल्लाह युद्ध रोकने की शर्तों पर पूरी तरह सहमत हो गए हैं। इस पूरे समझौते को अमरीका ने परदे के पीछे रहकर बेहद गुपचुप तरीके से अंजाम दिया है। इस बड़ी राहत के बाद सुलगते हुए पूरे मध्य पूर्व ने चैन की सांस ली है। यह युद्धविराम ऐसे नाजुक मोड़ पर हुआ है जब दुनिया भर के कूटनीतिक दिग्गजों को लगने लगा था कि यह चिंगारी अब काबू से बाहर हो चुकी है और पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लेने वाली है।

अमरीकी सूत्रों का साफ कहना है कि दोनों पक्षों ने फिलहाल हथियार डालने और अपनी-अपनी सेनाओं को पीछे हटाने की कड़ी शर्तें मान ली हैं। अगर पिछले कुछ दिनों का हाल देखें तो सीमा पर सचमुच कयामत मची हुई थी। इजरायली लड़ाकू विमान हिजबुल्लाह के अड्डों और उनके कमान सेंटरों को मटियामेट करने में दिन-रात जुटे थे, तो जवाब में हिजबुल्लाह भी इजरायल के शहरों पर दनादन रॉकेट और आत्मघाती ड्रोन दाग रहा था। इस खूनी खेल ने लेबनान के निचले हिस्से और उत्तरी इजरायल के रिहायशी इलाकों को नरक बना दिया था। लोग घरों और बंकरों में कैद रहने को मजबूर थे और मौत का खौफ हर वक्त उनके सिर पर मंडरा रहा था।

तबाही का खेल और आम जनता की बेबसी

देखा जाए तो पिछले कुछ दिनों में यह लड़ाई पूरी तरह हाथ से निकल चुकी थी। इजरायल का दावा था कि उसने हवाई हमलों में हिजबुल्लाह के बड़े कमांडरों को ढेर कर दिया है और उनके हथियारों के भूमिगत गोदामों को मलबे में तब्दील कर दिया है। उधर, हिजबुल्लाह भी घुटने टेकने को बिल्कुल तैयार नहीं था और इजरायली सेना की अग्रिम चौकियों पर सीधे वार कर रहा था। इस आर-पार की जंग के चलते सीमा से सटे सैकड़ों गांवों में जिंदगी पूरी तरह ठप हो चुकी थी।मगर इस पूरी सियासी जंग और वर्चस्व की लड़ाई की सबसे बड़ी कीमत वहां के बेकसूर और लाचार लोगों को चुकानी पड़ी। हजारों हंसते-खेलते परिवार रातों-रात बेघर हो गए और उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं। स्कूल, कॉलेज, दफ्तर और बाजार सब बंद पड़े हैं। अस्पतालों में दवाइयों का टोटा है और पीने के साफ पानी तक की भयंकर किल्लत हो गई है। हालात इस कदर बदतर हो चुके थे कि दुनिया भर की राहत एजेंसियां चिल्ला-चिल्लाकर बड़े मानवीय संकट की चेतावनी दे रही थीं और तुरंत मदद की गुहार लगा रही थीं।

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कैसे बनी बात? वाशिंगटन का भारी दबाव

अंदर की खबर यह है कि इस युद्धविराम की राह इतनी आसान नहीं थी जितनी ऊपर से दिखाई दे रही है। अमरीकी राजनयिकों ने दोनों तरफ इतना तगड़ा दबाव बनाया कि आखिरकार उन्हें झुकना ही पड़ा। असल में सबसे बड़ा डर इस बात का था कि अगर यह जंग हफ्ता-दस दिन और खिंच जाती, तो ईरान भी इसमें सीधे कूद पड़ता। और अगर ईरान आता तो अमरीका को भी मजबूरी में अपनी फौज उतारनी पड़ती। इसी विनाशकारी महायुद्ध के डर ने दोनों कट्टर दुश्मनों को एक मेज पर आने के लिए मजबूर किया।रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि इसके पीछे सिर्फ लेबनान का संकट नहीं है, बल्कि इस पूरे इलाके की जियोपॉलिटिक्स अब बदल रही है। अमरीका और ईरान के बीच पिछले कुछ समय से ओमान और अन्य देशों के जरिए चल रही गुपचुप बातचीत का असर भी इस बड़े फैसले में साफ दिख रहा है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इसे सिर्फ एक कामचलाऊ या अस्थाई समझौता नहीं मान रहे, बल्कि इसे इलाके में परमानेंट शांति की शुरुआत के तौर पर देख रहे हैं।

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बंदूकें शांत, पर उंगलियां अभी भी ट्रिगर पर

भले ही कागजों पर दस्तखत हो गए हों और सीजफायर का आधिकारिक ऐलान हो चुका हो, लेकिन जमीन पर अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि कोई भी अपनी चौकसी ढीली नहीं कर रहा है। दोनों तरफ की सेनाएं हाई अलर्ट पर हैं। ग्राउंड रिपोर्टर्स का कहना है कि यह समझौता तभी कामयाब होगा जब दोनों तरफ के लड़ाके जमीन पर संयम बरतें। इतिहास गवाह है कि पश्चिम एशिया में पहले भी ऐसे कई समझौते हुए, जो किसी एक सिरफिरे की गोलीबारी या छोटे से उकसावे की वजह से चंद घंटों में ही टूट गए और फिर भयानक तबाही मची।सीमावर्ती इलाकों से खबरें आ रही हैं कि समझौते के समय के बाद भी कुछ सुदूर देहाती इलाकों में छिटपुट गोलाबारी हुई है, जो यह बताती है कि हालात अभी भी कांच की तरह नाजुक हैं। खैर, दुनिया भर के प्रमुख देश इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र और अमरीका ने भी कहा है कि बंदूक के बजाय बातचीत से ही बड़े मसले हल होते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि सीमा पर रहने वाले आम लोग बस यही दुआ कर रहे हैं कि उनके आशियानों पर फिर कभी बम न गिरें। शांति का रास्ता बेशक बहुत लंबा और पथरीला है, लेकिन इस वक्त यह समझौता बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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