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“किसकी वजह से टूटी बातचीत?” इस्लामाबाद वार्ता पर आरोप-प्रत्यारोप तेज

“किसकी वजह से टूटी बातचीत?” इस्लामाबाद वार्ता पर आरोप-प्रत्यारोप तेज
नवजोत कौर सिद्धू
On: अप्रैल 14, 2026 12:52 अपराह्न
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इस्लामाबाद में हुई अमेरिका और ईरान के बीच बहुप्रतीक्षित वार्ता भले ही बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई हो, लेकिन इसके बाद शुरू हुआ कूटनीतिक विवाद अब नए मोड़ ले रहा है। वार्ता की विफलता के बाद ईरान ने सीधे तौर पर इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर आरोप लगाया है कि उन्होंने पर्दे के पीछे हस्तक्षेप कर पूरी बातचीत को पटरी से उतार दिया। हालांकि नेतन्याहू ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है और वार्ता के टूटने के लिए ईरान खुद जिम्मेदार है।

उम्मीदों का शोर और जमीनी हकीकत

बातचीत शुरू होने से पहले माहौल में एक अजीब सी हलचल थी। इस्लामाबाद को इस ऐतिहासिक मिलन का गवाह बनाने के पीछे मकसद था—एक ऐसी जगह चुनना जो दोनों के लिए तटस्थ हो। शुरुआती दौर की बातों से लगा कि दोनों देश वाकई कुछ ठोस चाहते हैं। चेहरे पर मुस्कान थी और बयानों में नरमी। लेकिन जैसे-जैसे घड़ी की सुइयां आगे बढ़ीं और असल मुद्दों पर बात आई, तो वह मुस्कान गायब हो गई।

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ईरान के परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे संवेदनशील मुद्दों पर आकर सुई अटक गई। ईरान अपनी शर्तों पर अड़ा था और अमेरिका अपनी सुरक्षा चिंताओं को लेकर सख्त था। पर असली तमाशा तो तब शुरू हुआ जब बातचीत खत्म हुई और आरोपों का दौर शुरू हुआ।

 क्या इजरायल ने बिगाड़ा काम? 

ईरान ने इस बार डिप्लोमेटिक भाषा का इस्तेमाल करने के बजाय सीधे तौर पर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को घेरा। ईरान के विदेश मंत्रालय के करीबियों का कहना है कि जब इस्लामाबाद में बातचीत एक समझौते के ड्राफ्ट की तरफ बढ़ रही थी, तब अचानक अमेरिकी टीम का रुख बदल गया। ईरान का दावा है कि उसी वक्त एक ‘गुप्त हस्तक्षेप’ हुआ।ईरान का आरोप है कि नेतन्याहू ने पर्दे के पीछे से अपनी बिसात बिछाई और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से संपर्क साधा। 

तेहरान का मानना है कि इजरायल कभी नहीं चाहता कि अमेरिका और ईरान के बीच कोई भी समझौता हो। उनके मुताबिक, इजरायल को लगता है कि अगर ईरान पर से आर्थिक पाबंदियां हट गईं, तो वह इस क्षेत्र में और ताकतवर हो जाएगा, जो इजरायल के लिए खतरा है। इसलिए, ईरान की नजर में नेतन्याहू ने “एक फोन कॉल” से पूरी बाजी पलट दी,मामले ने जैसे ही तूल पकड़ा, बेंजामिन नेतन्याहू खुद सामने आए। 

उन्होंने बहुत ही सधे हुए लेकिन कड़े शब्दों में इन बातों को बकवास करार दिया। उनका कहना था, “यह मेरा फैसला नहीं था।” उन्होंने साफ किया कि अमेरिका एक संप्रभु देश है और वह अपने फैसले खुद लेता है।हालांकि, उन्होंने इस बात को नहीं छुपाया कि उनकी बात उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से हुई थी।  

नेतन्याहू का तर्क है कि ईरान अपनी कमियों को छुपाने के लिए और दुनिया की सहानुभूति बटोरने के लिए इजरायल का नाम बीच में घसीट रहा है। उनके अनुसार, वार्ता टूटने की असली वजह ईरान का वो अड़ियल रवैया है, जिसमें वह अपने परमाणु कार्यक्रम पर कोई भी पारदर्शी जांच कराने को तैयार नहीं था।

क्या था जेडी वेंस वाले कॉल का रहस्य?

राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर बंटे हुए हैं। कुछ का मानना है कि अमेरिका और इजरायल के बीच रणनीतिक साझेदारी इतनी गहरी है कि वे हर बड़े कदम से पहले एक-दूसरे की राय लेते हैं। अगर वेंस और नेतन्याहू के बीच बातचीत हुई भी, तो इसमें नया क्या है? लेकिन दूसरा पक्ष कहता है कि कॉल की टाइमिंग बहुत कुछ बयां करती है। अगर बातचीत समझौते की तरफ बढ़ रही थी और ऐन वक्त पर अमेरिका पीछे हटा, तो कहीं न कहीं बाहरी दबाव की बात में दम नजर आता है।

आगे की राह: क्या दरवाजे बंद हो गए हैं?

भले ही आज दोनों पक्ष एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हों, लेकिन कूटनीति की दुनिया में दरवाजे कभी पूरी तरह बंद नहीं होते। पर्दे के पीछे की बातचीत अभी भी जारी रह सकती है। आने वाले महीनों में शायद हम देखें कि किसी दूसरे देश—जैसे ओमान या कतर—के जरिए फिर से संपर्क साधने की कोशिश की जाए।

लेकिन एक बात तो तय है, इस्लामाबाद वार्ता ने यह साबित कर दिया कि शांति का रास्ता सिर्फ मेज पर बैठने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति नजरिया बदलने से निकलेगा। जब तक इजरायल की सुरक्षा चिंताएं, ईरान की आर्थिक जरूरतें और अमेरिका की ग्लोबल लीडरशिप के बीच संतुलन नहीं बनेगा, तब तक ऐसी वार्ताएं सिर्फ सुर्खियां बटोरेंगी, नतीजे नहीं।

इतिहास क्या कहेगा?

इतिहास इस वार्ता को एक ‘खोए हुए अवसर’ के रूप में याद रखेगा। यह वह समय था जब दुनिया एक बड़े युद्ध के मुहाने पर खड़ी थी और कूटनीति उसे बचा सकती थी। लेकिन आपसी आरोपों और “उसने किया, मैंने नहीं किया” के खेल ने सब गुड़-गोबर कर दिया। फिलहाल, इस्लामाबाद की गलियों से शांति का कारवां रुखसत हो चुका है और अब सबकी नजरें इस बात पर हैं कि आने वाले हफ्तों में तेहरान और वाशिंगटन का अगला कदम क्या होगा।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment

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