नई दिल्ली/तेहरान/वॉशिंगटन/इस्लामाबाद। दुनिया की कूटनीति के केंद्र में इस वक्त पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद है। वह शहर, जो अक्सर खुद अपनी आंतरिक राजनीति के लिए चर्चा में रहता है, इस शुक्रवार यानी 10 अप्रैल 2026 से एक ऐतिहासिक और शायद इस सदी की सबसे कठिन वार्ताओं में से एक का गवाह बनने जा रहा है। पश्चिम एशिया (Middle East) में महीनों से मंडरा रहे युद्ध के बादलों के बीच, ईरान और अमेरिका का आमने-सामने बैठना किसी चमत्कार से कम नहीं लगता।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह महज एक ” फोटो सेशन” रहेगा या वाकई शांति की कोई ठोस जमीन तैयार हो चुकी है?पिछले कुछ महीनों का घटनाक्रम किसी डरावनी फिल्म जैसा रहा है। लाल सागर से लेकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य तक, पानी की लहरों पर बारूद की गंध तैर रही थी। ईरान द्वारा किए गए मिसाइल परीक्षण और अमेरिकी ड्रोनों की जवाबी कार्रवाई ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी।
कच्चे तेल की कीमतें $120 प्रति बैरल को पार कर गई थीं, जिससे भारत जैसे विकासशील देशों में महंगाई का हाहाकार मच गया था।यही वह दबाव था, जिसने दोनों देशों को पीछे हटने पर मजबूर किया। सूत्रों की मानें तो यह बातचीत रातों-रात तय नहीं हुई। इसके पीछे स्विस दूतावास और मस्कट (ओमान) में हुई कई गुप्त बैठकों का हाथ है।
पाकिस्तान की भूमिका बनी निर्णायक
कई लोगों के लिए यह आश्चर्य की बात है कि जिनेवा या वियना के बजाय इस्लामाबाद को क्यों चुना गया? इसके पीछे पाकिस्तान की भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति है। ईरान के साथ पाकिस्तान की लंबी सीमा और अमेरिका के साथ उसके पुराने (भले ही उतार-चढ़ाव वाले) रक्षा संबंध, उसे एक आदर्श मध्यस्थ बनाते हैं।अंदरूनी सूत्र बताते हैं: “पाकिस्तान ने केवल अपनी जमीन नहीं दी, बल्कि एक ‘वर्किंग पेपर’ भी तैयार किया है। इस शांति प्रस्ताव में सबसे पहले ‘सक्रिय शत्रुता’ को समाप्त करने और फिर व्यापारिक गलियारों को खोलने की बात कही गई है।”
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वार्ता का एजेंडा- मेज पर रखे मुश्किल सवाल
10 अप्रैल से शुरू होने वाली यह वार्ता दो हफ्तों तक चलने की उम्मीद है। इसे ‘मैराथन सत्र’ कहा जा रहा है। मुख्य मुद्दे कुछ इस प्रकार हैं:
होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz)- ईरान इसे अपनी संप्रभुता का हिस्सा मानता है, जबकि अमेरिका इसे अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र। ईरान का प्रस्ताव है कि यदि उसे आर्थिक राहत मिलती है, तो वह यहां से तेल टैंकरों की आवाजाही को ‘सुरक्षा की गारंटी’ दे सकता है।
प्रतिबंधों का मकड़जाल- तेहरान की पहली शर्त है कि उसकी बैंकिंग प्रणाली और तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंध तुरंत हटाए जाएं। ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी के शब्दों में, “हम खाली पेट शांति की बात नहीं कर सकते।”
परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम- वॉशिंगटन के लिए ईरान की बढ़ती परमाणु क्षमता सबसे बड़ी चिंता है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपनी यूरेनियम संवर्धन की सीमा को 3.67% पर वापस लाए, जिस पर सहमति बनना फिलहाल टेढ़ी खीर लग रही है।
वैश्विक असर और बाजार की प्रतिक्रिया
जैसे ही इस्लामाबाद वार्ता की खबर ‘फ्लैश’ हुई, वॉल स्ट्रीट से लेकर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज तक एक राहत की लहर देखी गई। तेल की कीमतों में 5% की गिरावट दर्ज की गई है। निवेशकों को लग रहा है कि अगर ‘होर्मुज़ संकट’ टल जाता है, तो सप्लाई चेन फिर से पटरी पर आ जाएगी।हालाँकि, बाजार अभी भी ‘वेट एंड वॉच’ (Wait and Watch) की स्थिति में है। विश्लेषकों का कहना है कि जब तक औपचारिक हस्ताक्षर नहीं होते, तब तक अनिश्चितता बनी रहेगी।
चुनौतियां कम नहीं
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ी बाधा ‘अविश्वास’ है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से दोनों देशों के बीच जो खाई पैदा हुई, वह इस्लामाबाद के एसी कमरों में दो हफ्तों में नहीं भरी जा सकती। इसके अलावा, इजरायल और सऊदी अरब जैसे क्षेत्रीय खिलाड़ी भी इस वार्ता को संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। उनकी सुरक्षा चिंताएं इस समझौते को कमजोर कर सकती हैं।
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उम्मीद की एक नई शुरुआत
इस्लामाबाद की यह पहल एक जुआ भी है और एक उम्मीद भी। यदि यह सफल रही, तो 2026 को इतिहास में ‘शांति के साल’ के रूप में याद किया जाएगा। और यदि यह विफल रही, तो पश्चिम एशिया एक ऐसे युद्ध की ओर बढ़ जाएगा जिसकी चपेट में पूरी दुनिया आएगी।
फिलहाल, शुक्रवार की सुबह का इंतजार है, जब अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधिमंडल एक ही छत के नीचे होंगे। पूरी दुनिया दुआ कर रही है कि इस बार ‘बंदूकों की गड़गड़ाहट’ पर ‘संवाद की गूंज’ भारी पड़े।







