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समंदर के बीच बदला दांव- भारत आ रहा ईरानी तेल जहाज आखिर चीन की ओर क्यों मुड़ा? 

समंदर के बीच बदला दांव- भारत आ रहा ईरानी तेल जहाज आखिर चीन की ओर क्यों मुड़ा? 
नवजोत कौर सिद्धू
On: अप्रैल 4, 2026 1:43 अपराह्न
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नई दिल्ली।कूटनीति और व्यापार की दुनिया में कभी-कभी एक मामूली सा ‘यू-टर्न’ भी बड़े तूफान का संकेत दे देता है। कुछ ऐसा ही हुआ गुजरात के तट के पास, जहाँ भारत की ओर बढ़ रहे ईरानी कच्चे तेल से लदे एक बड़े टैंकर ने ऐन वक्त पर अपना रास्ता बदल लिया। यह जहाज वडिनार पोर्ट आने के बजाय अचानक चीन की ओर मुड़ गया। देखने में यह सिर्फ एक जहाज का रास्ता बदलना लग सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपी है—इंटरनेशनल प्रेशर, पेमेंट की सिरदर्दी और तेल के खेल की गहरी राजनीति।

उम्मीदों पर फिरा पानी

दरअसल, करीब 6 लाख बैरल कच्चा तेल लेकर आ रहा यह टैंकर सिर्फ एक खेप नहीं थी। इसे 2019 के बाद भारत और ईरान के बीच तेल व्यापार की ‘सेकंड इनिंग’ की शुरुआत माना जा रहा था। जब से ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे, भारत ने वहां से तेल लेना बंद कर दिया था। सात साल बाद जब इस टैंकर की चर्चा शुरू हुई, तो लगा कि भारत फिर से अपने पुराने और सस्ते भरोसेमंद साथी (ईरान) की ओर लौट रहा है। पर इस एक मोड़ ने फिलहाल इन उम्मीदों पर ब्रेक लगा दिया है।

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आखिर ‘लोचा’ कहां हुआ?

एक्सपर्ट्स की मानें तो इस पूरे ड्रामे के पीछे सबसे बड़ा रोड़ा ‘पेमेंट गेटवे’ है। ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की वजह से डॉलर में लेन-देन नामुमकिन है। बैंकिंग चैनल इतने सख्त हैं कि एक-एक पैसे की आवाजाही पर वॉशिंगटन की नजर रहती है। भारत जैसे देश के लिए, जो ग्लोबल नियमों का पालन करता है, बिना किसी पुख्ता ‘रुपया-रियाल’ सिस्टम के यह डील पूरी करना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। शायद आखिरी समय पर पेमेंट की इसी अनिश्चितता ने सौदे को लटका दिया।

चीन को क्यों नहीं है डर?

सवाल उठता है कि जो तेल भारत नहीं ले पाया, उसे चीन ने लपक कैसे लिया? जवाब सीधा है, चीन की अपनी पेमेंट प्रणाली और प्रतिबंधों को ठेंगा दिखाने की उसकी पुरानी जिद। चीन लंबे समय से ईरान का सबसे बड़ा ‘कस्टमर’ बना हुआ है। उसके पास न केवल वैकल्पिक रास्ते हैं, बल्कि वह इस व्यापार को अपनी राजनीतिक ताकत के रूप में इस्तेमाल करता है।

‘शैडो फ्लीट’ का रहस्यमयी नेटवर्क

इस कहानी का एक और दिलचस्प पहलू है ‘शैडो फ्लीट’ (Shadow Fleet)। ये उन जहाजों का बेड़ा है जो बिना किसी आधिकारिक पहचान या जीपीएस सिग्नल के प्रतिबंधों वाले देशों का तेल ढोते हैं। बताया जा रहा है कि यह टैंकर भी इसी नेटवर्क का हिस्सा था। ये जहाज गिरगिट की तरह अपना गंतव्य और पहचान बदलने में माहिर होते हैं, और जैसे ही इन्हें लगता है कि सौदा खतरे में है, ये तुरंत अपनी मंजिल बदल लेते हैं।

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भारत के लिए क्या है सबक?

पश्चिम एशिया (Middle East) में तनाव चरम पर है। लाल सागर से लेकर होर्मुज तक, समंदर में बारूद की गंध है। ऐसे में भारत के लिए अपनी ‘एनर्जी सिक्योरिटी’ को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है। ईरान भौगोलिक रूप से हमारे करीब है और वहां का तेल सस्ता भी पड़ता है, लेकिन अमेरिका के साथ रिश्तों और वैश्विक प्रतिबंधों के बीच संतुलन बनाना किसी ‘सुपरफास्ट एक्सप्रेस’ को पतली पटरी पर दौड़ाने जैसा है।

फिलहाल, समंदर की लहरों पर बदला यह रास्ता नई दिल्ली के नीति-निर्माताओं के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ गया है—क्या हम ईरान के साथ कोई ऐसा रास्ता (Alternative mechanism) निकाल पाएंगे जो वाशिंगटन को भी न चुभे और हमारी जरूरत भी पूरी हो जाए?

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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