इस्लामाबाद।पश्चिम एशिया में लंबे समय से चल रहे तनाव के बीच आखिरकार वह पल आ ही गया, जिसका इंतजार पूरी दुनिया कर रही थी। अमेरिका और ईरान के बीच बहुप्रतीक्षित शांति वार्ता शनिवार को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शुरू हो गई। हालात इतने नाजुक हैं कि इस बातचीत को शांति की आखिरी उम्मीद भी कहा जा रहा है और संभावित टकराव से पहले की अंतिम कोशिश भी।
वार्ता ऐसे समय हो रही है जब दोनों देशों के बीच हाल ही में हुआ युद्धविराम अभी पूरी तरह स्थिर नहीं है। जमीन पर हालात सामान्य दिखते जरूर हैं, लेकिन अंदर ही अंदर अविश्वास और तनाव अब भी कायम है।
छावनी बना इस्लामाबाद
इस्लामाबाद की सड़कों पर आज खामोशी है, लेकिन यह खामोशी सुकून वाली नहीं, बल्कि तनाव वाली है। शहर को तीन परतों वाले सुरक्षा घेरे में रखा गया है। पाकिस्तानी रेंजर्स और सेना के जवानों ने उन तमाम रास्तों को सील कर दिया है जो वार्ता स्थल की ओर जाते हैं। विदेशी पत्रकारों के कैमरों की फ्लैश तो चमक रही है, लेकिन अंदर क्या पक रहा है, इसकी भनक किसी को नहीं है।
पाकिस्तान के लिए भी यह ‘डू और डाई’ वाली स्थिति है। एक तरफ उसकी अपनी आर्थिक बदहाली है और दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को एक ‘शांतिदूत’ के रूप में स्थापित करने की चुनौती। अगर इस्लामाबाद इस बातचीत को किसी अंजाम तक पहुँचाने में सफल रहता है, तो यह दक्षिण एशियाई कूटनीति के लिए एक ऐतिहासिक जीत होगी।
कौन कर रहा है अगुवाई
अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस वार्ता का नेतृत्व कर रहे हैं। उनके साथ वरिष्ठ कूटनीतिक अधिकारी भी मौजूद हैं। वहीं ईरान की तरफ से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर ग़ालिबाफ प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई कर रहे हैं।दोनों ही पक्षों के चेहरे बताते हैं कि यह सिर्फ औपचारिक मुलाकात नहीं, बल्कि बेहद गंभीर और निर्णायक बातचीत है।वार्ता से पहले वेंस ने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका बातचीत चाहता है, लेकिन “कोई चालबाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।” वहीं ईरान ने भी संकेत दिया है कि वह बातचीत के लिए तैयार है, मगर बिना सम्मानजनक समझौते के पीछे हटने वाला नहीं।
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बातचीत के केंद्र में बड़े मुद्दे
इस महा-पंचायत में चार ऐसे मुद्दे हैं जिन्होंने पूरी दुनिया की नींद उड़ा रखी है:
1. परमाणु कार्यक्रम: संप्रभुता बनाम सुरक्षा
अमेरिका का सीधा स्टैंड है कि ईरान को अपने यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) को पूरी तरह बंद करना होगा। लेकिन ईरान के लिए उसका परमाणु कार्यक्रम केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि उसकी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है। वार्ता के पहले सत्र में इसी मुद्दे पर सबसे ज्यादा गरमागरमी होने की खबर है।
2. लेबनान और इजरायल का त्रिकोण:
जब इस्लामाबाद में फाइलें खोली जा रही थीं, उसी वक्त लेबनान की सरहदों पर धमाके हो रहे थे। इजरायल और हिज़्बुल्लाह के बीच जारी खूनी संघर्ष इस वार्ता का सबसे बड़ा ‘स्पॉइलर’ साबित हो सकता है। ईरान हिज़्बुल्लाह को अपना रणनीतिक हाथ मानता है, जबकि अमेरिका इसे आतंकी गुट करार देकर ईरान से हाथ पीछे खींचने को कह रहा है।
3. तेल की राजनीति और होरमुज़ जलडमरूमध्य:
दुनिया की अर्थव्यवस्था की रगों में दौड़ने वाला तेल जिस ‘होरमुज़’ रास्ते से गुजरता है, वहां ईरान की मौजूदगी अमेरिका को हमेशा खटकती है। अगर यहां तनाव कम नहीं हुआ, तो वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जिससे भारत जैसे विकासशील देशों की कमर टूट जाएगी।
4. आर्थिक प्रतिबंधों का फंदा :
ईरान की जनता महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त है। ग़ालिबाफ की प्राथमिकता है कि किसी भी तरह अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील मिले। लेकिन अमेरिका इसे अपना सबसे बड़ा हथियार मानता है और वह इसे इतनी आसानी से नहीं छोड़ेगा।
भरोसे की कमी सबसे बड़ी बाधा
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती है—भरोसे की कमी।
दोनों देशों के बीच पिछले कई वर्षों की घटनाओं ने रिश्तों को बेहद कमजोर कर दिया है। अमेरिका का पुराने परमाणु समझौते से हटना और हाल के सैन्य तनाव ने इस दूरी को और बढ़ाया है।ईरान खुलकर कह चुका है कि वह बातचीत तो करेगा, लेकिन आंख मूंदकर भरोसा नहीं करेगा। वहीं अमेरिका भी सतर्क रुख अपनाए हुए है।
लेबनान बना नया संकट
जब वार्ता शुरू ही हुई थी, उसी दौरान लेबनान से आई खबरों ने चिंता बढ़ा दी। वहां इजरायल के हमले और हिज़्बुल्लाह की जवाबी कार्रवाई ने माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया है।
ईरान का मानना है कि अगर क्षेत्रीय संघर्ष जारी रहता है, तो किसी भी बड़े समझौते की नींव कमजोर पड़ सकती है।
पूरी दुनिया की नजर
इस वार्ता पर सिर्फ अमेरिका और ईरान ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।
तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, महंगाई का दबाव और वैश्विक बाजार की अनिश्चितता—ये सभी इस बातचीत के नतीजे से जुड़े हुए हैं।अगर समझौता होता है, तो बाजार को स्थिरता मिल सकती है। अगर नहीं, तो असर हर देश की अर्थव्यवस्था पर दिखेगा।
इस्लामाबाद में शुरू हुई यह वार्ता सिर्फ दो देशों के बीच बातचीत नहीं है, बल्कि यह पूरे विश्व के लिए अहम मोड़ साबित हो सकती है। एक तरफ शांति की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ टकराव का खतरा भी बना हुआ है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या कूटनीति हथियारों पर भारी पड़ेगी या नहीं।







