नई दिल्ली / वाशिंगटन ।कूटनीति की बिसात पर बिछी चालें जब तेल की पाइपलाइनों का गला घोंटने लगें, तो समझ लीजिए कि आर्थिक चुनौतियां दस्तक दे रही हैं। वॉशिंगटन से आई एक रिपोर्ट ने भारत के गलियारों में हलचल तेज कर दी है—वजह है रूस और ईरान से मिलने वाले सस्ते तेल पर अमेरिकी ‘वीटो’। पिछले एक माह से जिस रूसी डिस्काउंट ने भारतीय अर्थव्यवस्था को एक सुरक्षा कवच दे रखा था, अब उस पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
यह सिर्फ दो देशों की अदावत नहीं है, बल्कि भारत के लिए उस ‘एनर्जी सिक्योरिटी’ की परीक्षा है, जिससे हमारी रसोई से लेकर फैक्टरियों के पहिये तक जुड़े हैं।लेकिन अब अमेरिका ने साफ कर दिया है कि वह रूस और ईरान पर दबाव बनाए रखना चाहता है, इसलिए यह छूट खत्म की जा रही है।
भारत की धड़कनें क्यों बढ़ीं?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है। हम दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल खरीदार हैं। पिछले एक-दो साल में रूस हमारा सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया था। वजह साफ थी— रूस हमें बाजार भाव से काफी कम कीमत पर तेल दे रहा था। इस सस्ते तेल की वजह से ही सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल के दाम बहुत ज्यादा नहीं बढ़ाए।
अब जब छूट खत्म हो रही है, तो भारत को नए विकल्प तलाशने होंगे। खाड़ी देशों, अफ्रीका या अमेरिका से तेल खरीदना संभव है, लेकिन यह विकल्प अपेक्षाकृत महंगे हो सकते हैं। इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
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वैश्विक अनिश्चितता
ऊर्जा विशेषज्ञों की मानें तो अगर बाजार से रूस और ईरान का तेल पूरी तरह गायब हो गया, तो दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई चेन टूट जाएगी। जब आपूर्ति कम होगी और मांग वैसी ही बनी रहेगी, तो कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने में वक्त नहीं लगेगा। यह स्थिति न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया की रिकवरी को पटरी से उतार सकती है।
डीजल महंगा हुआ, तो थाली से गायब होगी दाल
भारत जैसे देश में तेल की कीमतें सिर्फ गाड़ियों तक सीमित नहीं रहतीं। यहाँ जब डीजल के दाम में एक रुपये का भी इजाफा होता है, तो उसका असर खेत से लेकर मंडी तक दिखने लगता है।
- महंगा परिवहन: देश का 70% सामान ढुलाई ट्रकों के जरिए होती है। अगर तेल महंगा हुआ, तो ट्रक मालिक किराया बढ़ाएंगे और अंततः फल-सब्जियों और राशन के दाम आपकी पहुंच से दूर हो जाएंगे।
- किसानी पर मार: भारत का अन्नदाता आज भी सिंचाई और ट्रैक्टरों के लिए डीजल पर निर्भर है। लागत बढ़ने का मतलब है कि खेती अब और भी घाटे का सौदा बन जाएगी।
- बचत पर डाका: मध्यमवर्गीय परिवार, जो अपनी पुरानी बाइक या कार से दफ्तर जाते हैं, उनके लिए यह ‘पेट्रोल-पंप शॉक’ किसी बुरे सपने जैसा होगा।
क्या हैं विकल्प?
भारत सरकार इस वक्त ‘प्लान-बी’ पर काम कर रही है, लेकिन ये रास्ते इतने आसान नहीं हैं:
नया बाजार, नई दोस्ती: हम वेनेजुएला और अफ्रीकी देशों की तरफ देख रहे हैं। लेकिन वहां से तेल लाना मतलब ट्रांसपोर्ट का खर्चा और बढ़ जाना।
रुपये की ताकत: भारत कोशिश कर रहा है कि हम रूस को रुपये में पेमेंट करें। अगर ये सिस्टम पूरी तरह कामयाब हो गया, तो हमें अमेरिकी डॉलर की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। लेकिन रूस को भी तो रुपये का कहीं इस्तेमाल करना होगा, यही सबसे बड़ा पेच है।
रिजर्व स्टॉक: भारत के पास अपना एक गुप्त तेल भंडार है, जो मुश्किल वक्त में कुछ दिनों तक देश को संभाल सकता है। लेकिन वो ‘परमानेंट’ समाधान नहीं है।
इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ दौड़: सरकार अब पूरी ताकत से ईवी (EV) को प्रमोट कर रही है। लेकिन क्या रातों-रात करोड़ों पेट्रोल गाड़ियाँ बदली जा सकती हैं? जवाब है—नहीं।
आगे का रास्ता
अमेरिका के इस एक फैसले ने पूरी दुनिया के तेल बाजार में ‘अनिश्चितता’ का जहर घोल दिया है। अगर मिडिल-ईस्ट में तनाव और बढ़ा और अमेरिका अपनी जिद पर अड़ा रहा, तो कच्चा तेल 110 डॉलर प्रति बैरल को पार कर जाएगा।भारत के लिए ये समय बहुत ही नाजुक है। हमें अपनी कूटनीति के साथ-साथ अपनी घरेलू इकोनॉमी को भी बचाना है। फिलहाल, आम आदमी सिर्फ यही दुआ कर सकता है कि वॉशिंगटन और दिल्ली के बीच कोई ऐसा रास्ता निकल आए कि रूस का तेल आता रहे और हमारी जेब पर डाका न पड़े।
बड़े मुल्कों की लड़ाई में हमेशा छोटे और विकासशील देश ही पिसते हैं। अमेरिका की इस ‘ऑयल पॉलिटिक्स’ ने भारत के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या हम अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए किसी एक महाशक्ति के गुलाम बने रहेंगे या अपना रास्ता खुद बनाएंगे? आने वाले कुछ हफ्ते भारत की आर्थिक सेहत के लिए बेहद निर्णायक होने वाले हैं।







