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रेयर अर्थ्स को लेकर अमेरिका की नई रणनीति- ‘पैक्स सिलिका’ के तहत 20 देशों का वैश्विक गठबंधन चीन की सप्लाई चेन चुनौती में

पैक्स सिलिका’ के तहत 20 देशों का वैश्विक गठबंधन चीन की सप्लाई चेन चुनौती में
नवजोत कौर सिद्धू
On: फ़रवरी 2, 2026 4:52 अपराह्न
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दुनिया की भू-राजनीति में अब ऊर्जा, रक्षा या व्यापार के साथ-साथ रेयर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल्स भी ताकत का बड़ा आधार बन चुके हैं। इन्हीं खनिजों को लेकर अमेरिका के नेतृत्व में एक नया वैश्विक गठबंधन आकार ले रहा है, जिसका नाम ‘पैक्स सिलिका’ रखा गया है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य चीन के उस वर्चस्व को चुनौती देना है, जो उसने दुर्लभ खनिजों की माइनिंग, प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन पर वर्षों में स्थापित किया है।

2 से 4 फरवरी के बीच बड़ी बैठक

इस गठबंधन की पहली बड़ी बैठक 2 से 4 फरवरी के बीच अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन में आयोजित की जा रही है। इसमें भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय यूनियन, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड समेत करीब 20 प्रमुख देश शामिल हो रहे हैं। यह बैठक ऐसे समय हो रही है, जब अमेरिका और उसके सहयोगी देश चीन पर अपनी रणनीतिक निर्भरता को कम करने के लिए ठोस विकल्प तलाश रहे हैं।

आखिर क्या है पैक्स सिलिका और क्यों है अहम?

पैक्स सिलिका मूल रूप से एक रणनीतिक ढांचा है, जिसके तहत अमेरिका अपने भरोसेमंद साझेदार देशों के साथ मिलकर क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ्स के लिए एक वैकल्पिक वैश्विक इको-सिस्टम खड़ा करना चाहता है। सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, स्वच्छ ऊर्जा, रक्षा तकनीक और हाई-टेक इंडस्ट्री में इन खनिजों की भूमिका बेहद अहम है।

फिलहाल, चीन रेयर अर्थ्स की माइनिंग के साथ-साथ प्रोसेसिंग में भी दुनिया का सबसे बड़ा खिलाड़ी है। कई मामलों में उसकी हिस्सेदारी 60 से 80 प्रतिशत तक मानी जाती है। यही कारण है कि किसी भी भू-राजनीतिक तनाव की स्थिति में सप्लाई चेन बाधित होने का खतरा बना रहता है। अमेरिका और उसके सहयोगी इसी जोखिम को कम करना चाहते हैं।

भारत की अहम भूमिका

भारत इस गठबंधन में एक महत्वपूर्ण भागीदार के तौर पर उभर रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है कि विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर इस बैठक में हिस्सा लेंगे। यह बैठक अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की ओर से बुलाई गई है।

अमेरिका में भारत के बढ़ते रणनीतिक महत्व को देखते हुए यह भागीदारी बेहद अहम मानी जा रही है। भारत के पास न सिर्फ खनिज संसाधनों की संभावनाएं हैं, बल्कि वह सेमीकंडक्टर, मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी सेक्टर में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। अमेरिका के लिए भारत एक ऐसा साझेदार है, जो चीन का व्यावहारिक विकल्प बन सकता है।

किन देशों की होगी भागीदारी?

वॉशिंगटन में होने वाली इस बैठक में शामिल देशों की सूची काफी व्यापक है। इसमें—

  • अमेरिका
  • भारत
  • यूरोपीय यूनियन
  • ब्रिटेन
  • जापान
  • ऑस्ट्रेलिया
  • न्यूजीलैंड
  • दक्षिण कोरिया
  • कनाडा
  • फ्रांस, जर्मनी, इटली (G7 देश)

सहित करीब 20 देशों के प्रतिनिधि शामिल होने की संभावना है।

खास बात यह है कि पाकिस्तान को इस गठबंधन में शामिल नहीं किया गया है, जबकि उसने पहले अमेरिका को अपने यहां दुर्लभ खनिजों के खनन का प्रस्ताव दिया था। यह फैसला अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं और भरोसेमंद साझेदारों की सूची को साफ तौर पर दर्शाता है।

ट्रंप युग के रिश्ते और पैक्स सिलिका की भूमिका

डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान अमेरिका के कई पारंपरिक सहयोगियों के साथ रिश्तों में तनाव देखने को मिला था। ट्रैरिफ वॉर, स्टील और एल्युमिनियम पर शुल्क, और “अमेरिका फर्स्ट” नीति के चलते ट्रांसअटलांटिक संबंध कमजोर हुए।

ऐसे में पैक्स सिलिका को न सिर्फ चीन के खिलाफ रणनीतिक कदम, बल्कि सहयोगी देशों के साथ रिश्तों को दोबारा मजबूत करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। अमेरिका यह संदेश देना चाहता है कि वह अब भी वैश्विक साझेदारी और सामूहिक सुरक्षा में विश्वास रखता है।

ऑस्ट्रेलिया की बड़ी तैयारी

इस गठबंधन में ऑस्ट्रेलिया की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने हाल ही में घोषणा की है कि वह करीब 1.2 बिलियन ऑस्ट्रेलियन डॉलर की लागत से क्रिटिकल मिनरल्स का एक स्ट्रैटेजिक रिजर्व बनाएगी। इसका मकसद चीन से होने वाली किसी भी सप्लाई चेन रुकावट के असर को कम करना है।

ऑस्ट्रेलिया पहले ही लिथियम, एंटीमनी, गैलियम जैसे खनिजों के उत्पादन में खुद को चीन के विकल्प के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। जापान की तरह ऑस्ट्रेलिया भी लंबे समय के लिए स्टॉक तैयार करने की रणनीति पर काम कर रहा है।

क्या होगा बैठक का मुख्य एजेंडा?

पैक्स सिलिका शिखर सम्मेलन में कई अहम मुद्दों पर चर्चा की जाएगी—

  • रेयर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन में चीन पर निर्भरता कम करना।
  • लिथियम, कोबाल्ट और अन्य खनिजों की माइनिंग और प्रोसेसिंग के लिए साझा रणनीति।
  • सदस्य देशों में सेमीकंडक्टर चिप डिजाइन और निर्माण को बढ़ावा देना।
  • AI, डेटा सेंटर और कंप्यूटिंग पावर के लिए साझा नेटवर्क विकसित करना।
  • इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और क्लीन एनर्जी उपकरणों के लिए जरूरी खनिजों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  • आपात स्थिति में सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने के लिए स्ट्रैटेजिक रिजर्व की योजना।

न्यूनतम कीमत को लेकर विवाद

हालांकि इस गठबंधन को लेकर पूरी तरह सहमति नहीं है। कुछ देश चाहते हैं कि अमेरिका क्रिटिकल मिनरल्स के लिए न्यूनतम कीमत की गारंटी दे, ताकि निवेशकों और उत्पादक देशों को स्थिरता मिल सके। लेकिन ट्रंप प्रशासन इस मांग को लेकर अब तक सहमत नहीं दिखा है।

इसी असहमति का असर ऑस्ट्रेलिया के शेयर बाजार पर भी देखने को मिला, जहां खनिज क्षेत्र से जुड़े शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। यह मुद्दा बैठक में सबसे संवेदनशील विषयों में से एक माना जा रहा है।

चीन की रणनीतिक चिंता

पैक्स सिलिका की पहल से चीन की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। चीन पहले ही अमेरिका को कई रेयर अर्थ्स के निर्यात पर रोक लगा चुका है। अगर यह गठबंधन सफल होता है, तो लंबे समय में चीन की रणनीतिक पकड़ कमजोर हो सकती है।

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन की बराबरी करना आसान नहीं होगा, क्योंकि उसने दशकों में प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग का मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार किया है। फिर भी, अमेरिका और उसके सहयोगी इसे एक दीर्घकालिक निवेश के रूप में देख रहे हैं।

क्या होगा आगे का रास्ता

अमेरिकी विदेश विभाग का कहना है कि क्रिटिकल मिनरल सप्लाई चेन को मजबूत करना सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और तकनीकी नेतृत्व का भी सवाल है। अगर यह शिखर सम्मेलन सफल रहता है और एक संयुक्त बयान जारी होता है, तो इसे अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए एक अहम मील का पत्थर माना जाएगा। वहीं देखा जाये तो पैक्स सिलिका सिर्फ एक सम्मेलन नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति में खनिज कूटनीति का नया अध्याय है। आने वाले वर्षों में यह तय करेगा कि तकनीक और ऊर्जा की दुनिया में नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment

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