नई दिल्ली।भारतीय खेल गलियारों से एक ऐसी सनसनीखेज खबर आ रही है जिसने आगामी राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों की चूलें हिलाकर रख दी हैं। देश के लिए पदकों की उम्मीद माने जाने वाले चार शीर्ष भारतीय वेटलिफ्टरों के डोप जाल में फंसने की सुगबुगाहट से खेल मंत्रालय से लेकर भारतीय भारोत्तोलन महासंघ तक हड़कंप मच गया है। शुरुआती जांच और अंदरूनी सूत्रों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, इन खिलाड़ियों के नमूनों में विश्व डोपिंग रोधी एजेंसी द्वारा प्रतिबंधित दवाओं या सप्लीमेंट्स के अंश मिले हैं, जिसने भारतीय खेल प्रशासन की नींद उड़ा दी है।
विभिन्न खेल सूत्रों और मीडिया हलकों में चल रही चर्चाओं की मानें तो इस पूरे मामले में सबसे बड़ा और हैरान करने वाला नाम स्टार वेटलिफ्टर नारायण अजित का सामने आ रहा है। एशियाई स्तर पर तिरंगा लहरा चुके नारायण अजित के अलावा इस सूची में महिला भारोत्तोलक वंशिता वर्मा और जूनियर सर्किट में अपनी धाक जमाने वाली होनहार खिलाड़ी संजना का नाम भी शामिल बताया जा रहा है। हालांकि चौथे खिलाड़ी की पहचान को लेकर अभी कयासों का दौर जारी है, लेकिन इस शुरुआती झटके ने ही खेल प्रेमियों को निराश कर दिया है।
पदक के सबसे बड़े दावेदार पर संकट के बादल
नारायण अजित का नाम इस विवाद में आना भारतीय वेटलिफ्टिंग के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं है। पिछले कुछ सालों में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी बेजोड़ तकनीक और ताकत का लोहा मनवा चुके अजित को आगामी राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए पदक का सबसे पक्का दावेदार माना जा रहा था। खेल विश्लेषकों से लेकर प्रशंसकों तक, हर कोई उनके इस डोप जाल में उलझने की खबर से स्तब्ध है। जानकारों का कहना है कि अगर आने वाले दिनों में उनके ‘बी’ सैंपल के नतीजे भी पॉजिटिव आते हैं, तो उन पर चार साल तक का लंबा प्रतिबंध लग सकता है, जो उनके शानदार करियर पर समय से पहले पूर्णविराम लगा देगा,फिलहाल, शुरुआती रिपोर्टों के आधार पर नारायण अजित, वंशिता वर्मा और जूनियर सनसनी संजना को अस्थाई रूप से राष्ट्रीय शिविर और प्रतियोगिताओं से दूर कर दिया गया है। खेल नियमों के तहत अब इन सभी के ‘बी’ सैंपल की बारीकी से जांच की तैयारी चल रही है, जिसके बाद ही इनके भविष्य और खेल महासंघ की अगली कार्रवाई की तस्वीर पूरी तरह साफ हो पाएगी।
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भारतीय वेटलिफ्टिंग और डोपिंग का पुराना नाता
देखा जाए तो भारतीय भारोत्तोलन के लिए डोपिंग का यह जिन्न कोई नया नहीं है। वैश्विक स्तर पर भारत के कई दिग्गज और नामी खिलाड़ी पहले भी प्रतिबंधित दवाओं के सेवन के चलते बैन का दंश झेल चुके हैं। यही सबसे बड़ी वजह है कि वाडा जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां हमेशा भारतीय वेटलिफ्टर्स को हाई रिस्क कैटेगरी में रखती हैं और उन पर पैनी नजर जमाए रखती हैं,अभी कुछ समय पहले ही दो बार की राष्ट्रमंडल खेल चैंपियन संजीता चानू का डोपिंग मामला बेहद चर्चा में रहा था, जिससे देश की काफी किरकिरी हुई थी। खेल विश्लेषकों का कहना है कि साल-दर-साल सामने आने वाले ये मामले केवल किसी एक खिलाड़ी की व्यक्तिगत गलती या बेईमानी नहीं हैं। यह हमारे पूरे खेल तंत्र, कोचिंग स्टाफ और मेडिकल मॉनिटरिंग सिस्टम की उस बुनियादी कमजोरी को उजागर करते हैं, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।
मिशन 2026 की उम्मीदों को करारा झटका
टोक्यो और पेरिस ओलंपिक में स्टार वेटलिफ्टर मीराबाई चानू की ऐतिहासिक सफलताओं के बाद भारत में इस खेल को लेकर एक नया दौर शुरू हुआ था। छोटे-छोटे गांवों और कस्बों से आने वाले युवाओं में वेटलिफ्टिंग के प्रति गजब का उत्साह देखा जा रहा था। सरकार भी इन पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही थी। लेकिन राष्ट्रमंडल खेलों के ठीक मुहाने पर खड़े इस बड़े विवाद ने पदक की उम्मीदों को तो तोड़ा ही है, साथ ही अंतरराष्ट्रीय खेल बिरादरी में भारत की साख को भी गहरी चोट पहुंचाई है।
व्यवस्था में बड़ी चूक और खिलाड़ियों की अज्ञानता
विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि हर बार सिर्फ खिलाड़ियों को सूली पर चढ़ा देने या उन पर प्रतिबंध लगा देने से यह गंभीर बीमारी खत्म नहीं होगी। हमें समस्या की जड़ को समझना होगा। भारत में आज भी ग्रामीण पृष्ठभूमि या आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले खिलाड़ियों के पास वैज्ञानिक प्रशिक्षण और सही सप्लीमेंट्स की पहचान करने की समझ नहीं होती है।कई बार खिलाड़ी अपनी रिकवरी तेज करने या ताकत बढ़ाने के लिए स्थानीय कोच या बाजार में मिलने वाले असुरक्षित सप्लीमेंट्स के जाल में फंस जाते हैं। खिलाड़ियों के पास कोई गाइड करने वाला नहीं होता कि कौन सी दवा बैन है और कौन सी सुरक्षित।
खेल मंत्रालय सामने साख बचाने की चुनौती
2026 कॉमनवेल्थ गेम्स के मुहाने पर खड़ा यह डोपिंग कांड भारतीय खेल प्रशासन के लिए एक आखिरी चेतावनी है। अब सबकी नजरें नाडा की फाइनल रिपोर्ट पर टिकी हैं, लेकिन एक बात साफ है—अगर अब भी कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय खेलों की छवि को सुधारना नामुमकिन हो जाएगा।







