रायपुर। भारत में हॉकी सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि एक विरासत है जिसे पीढ़ियों से सहेजा गया है। आज जब आधुनिकता की चकाचौंध में कई खेल अपनी पहचान खो रहे हैं, तब देश का आदिवासी समाज अपनी रगों में बहते जुनून से इस खेल की मशाल को जलाए हुए है। रायपुर के मैदानों पर हाल ही में जो गूंज सुनाई दी, वह केवल गोल की खुशी नहीं थी; वह उन हाथों की हुंकार थी जिन्होंने अभावों को मात देकर अपनी किस्मत खुद लिखी है।
रायपुर में ओडिशा की बादशाहत
वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम में संपन्न हुए खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 ने यह साफ कर दिया है कि भारतीय हॉकी का भविष्य अब महानगरों के वातानुकूलित कमरों में नहीं, बल्कि बस्तर की झाड़ियों और सिमडेगा की लाल मिट्टी में पल रहा है।इस टूर्नामेंट में ओडिशा का दबदबा एक सुखद संदेश लेकर आया। पुरुष वर्ग के फाइनल में झारखंड जैसी मजबूत टीम को 4-1 से हराना यह दर्शाता है कि ओडिशा ने जमीनी स्तर पर कितनी मेहनत की है। वहीं, महिला वर्ग में मिजोरम के खिलाफ 1-0 की जीत ने पूर्वोत्तर की जुझारू खेल शैली और ओडिशा के संयम का बेहतरीन मेल दिखाया। छत्तीसगढ़ की मिट्टी पर खेलते हुए इन खिलाड़ियों ने साबित कर दिया कि जब प्रतिभा को थोड़ा भी खाद-पानी मिलता है, तो वह बरगद की तरह विशाल हो जाती है।
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आभाव : लेकिन हुनर की कमी नहीं
आदिवासी अंचलों में हॉकी का रिश्ता रूहानी है। यहाँ आज भी गरीबी की मार इतनी गहरी है कि कई बच्चों के पास जूते तक नहीं होते, लेकिन उनका लक्ष्य कभी नहीं डगमगाता।
जुगाड़ की स्टिक: जहाँ शहरों में हज़ारों की कार्बन स्टिक का इस्तेमाल होता है, वहीं यहाँ के बच्चे आज भी तेंदू या महुआ की टहनियों को आग में तपाकर उसे हॉकी का आकार देते हैं।
पत्थरों से प्रैक्टिस: गेंद के नाम पर पुराने कपड़ों की पोटली या गोल पत्थर होते हैं। यह संघर्ष ही है जो इन खिलाड़ियों को मानसिक रूप से इतना मजबूत बना देता है कि वे अंतरराष्ट्रीय दबाव में कभी नहीं टूटते।
“अब व्यवस्था की खामोशी टूट रही है। जमीनी कोचिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर के मेल ने आदिवासी खिलाड़ियों के भीतर छिपे उस ‘प्राकृतिक जादू’ को पेशेवर पहचान दी है।”
— अजीत लाकड़ा, पूर्व ओलंपियन
बदलती सोच और “ओडिशा मॉडल”
ओडिशा की इस दोहरी सफलता के पीछे कोई रातों-रात हुआ करिश्मा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। राज्य सरकार ने न केवल विश्व स्तरीय स्टेडियम बनाए, बल्कि पंचायतों के स्तर पर एस्ट्रोटर्फ बिछाने का साहसी कदम उठाया। यह मॉडल अब पूरे देश के लिए एक ‘ब्लूप्रिंट’ बन गया है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश भी अब इसी राह पर हैं, जिससे यह उम्मीद जागी है कि जल्द ही भारतीय टीम के ग्यारह में से आठ खिलाड़ी इन्हीं जनजातीय क्षेत्रों से होंगे।

महिलाओं का रूढ़ियों के खिलाफ ” रिवर्स फ्लिक”
इस बदलाव की सबसे सशक्त तस्वीर आदिवासी बेटियों ने पेश की है। सलीमा टेटे और निक्की प्रधान जैसी रोल मॉडल्स को देखकर अब सिमडेगा से लेकर सुंदरगढ़ तक की लड़कियां घर की चौखट लांघकर मैदान में उतर रही हैं। ‘अस्मिता लीग’ जैसी पहल ने इन लड़कियों को वह मंच दिया है, जहाँ वे केवल मैच नहीं जीत रहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ गोल भी दाग रही हैं। मैदान पर दौड़ती उनकी फुर्ती सदियों पुराने पिछड़ेपन के दावों को धता बता रही है।
लंबे सफर में चुनौतियां
इतनी सफलताओं के बावजूद, सच्चाई का एक स्याह पहलू भी है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता:
डाइट और पोषण: प्रतिभा होने के बावजूद, संतुलित आहार की कमी कई खिलाड़ियों के करियर को लंबा नहीं होने देती।
तकनीकी दूरी: डिजिटल युग में भी दूरस्थ गांवों के कोच आधुनिक वीडियो विश्लेषण और नई तकनीकों से महरूम हैं।
रोजगार की अनिश्चितता: खेल में मेडल जीतने के बाद भी कई खिलाड़ी दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करते देखे जाते हैं। सरकार को ‘खेलो और जीतो’ के साथ ‘खेलो और जीविका पाओ’ पर काम करना होगा।
एक नए भारत का उदय
रायपुर के इन खेलों ने यह संदेश दे दिया है कि भारतीय हॉकी का केंद्र अब खिसक चुका है। जयपाल सिंह मुंडा ने जो नींव 1928 में रखी थी, आज 2026 में वह एक विशाल मीनार बन चुकी है। यह केवल एक खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति है।
जब तक देश के आखिरी छोर पर बैठा आदिवासी बच्चा हाथ में लकड़ी की टहनी लेकर दौड़ रहा है, तब तक भारतीय हॉकी की विरासत सुरक्षित है। अब जरूरत बस इतनी है कि हम उनके जुनून को संसाधनों की कमी की भेंट न चढ़ने दें। यह उस भारत की जीत है, जो अब अपनी जड़ों पर गर्व करना सीख गया है।







