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विदेशी मुद्रा भंडार में बड़ी गिरावट दो सप्ताह में 15 अरब डॉलर से अधिक कम हुआ रिजर्व

विदेशी मुद्रा भंडार में बड़ी गिरावट दो सप्ताह में 15 अरब डॉलर से अधिक कम हुआ रिजर्व
नवजोत कौर सिद्धू
On: जून 1, 2026 12:40 अपराह्न
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मुंबई । भारतीय अर्थव्यवस्था के मोर्चे से एक ऐसी खबर आई है जो नीति-निर्माताओं और बाजार के जानकारों को थोड़ा सतर्क करने वाली है। देश के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार दूसरे हफ्ते एक बड़ी गिरावट देखने को मिली है। भारतीय रिजर्व बैंक की तरफ से जारी ताजा साप्ताहिक बुलेटिन के मुताबिक, 22 मई को खत्म हुए हफ्ते में देश का कुल फॉरेक्स रिजर्व 7.51 अरब डॉलर की भारी चपत के साथ 681.38 अरब डॉलर पर आ गया है।

यह झटका इसलिए बड़ा है क्योंकि इससे ठीक एक हफ्ते पहले भी भंडार में 8.09 अरब डॉलर की बड़ी सेंध लगी थी। अगर इन दोनों हफ्तों के आंकड़ों को जोड़कर देखें, तो महज 14 दिनों के भीतर देश के खजाने से 15 अरब डॉलर से ज्यादा साफ हो चुके हैं। हालांकि, इस गिरावट के बीच राहत की बात यह है कि आर्थिक पंडित इसे लेकर पैनिक की स्थिति में नहीं हैं। विशेषज्ञों का साफ कहना है कि उतार-चढ़ाव के इस दौर में भी भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बेहद मजबूत और सुरक्षित स्थिति में बना हुआ है। यह हमारे जरूरी आयात बिलों को चुकाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की देनदारियों को पूरा करने के लिए काफी है। लेकिन हां, यह आंकड़ा इस बात का साफ इशारा जरूर है कि दुनिया भर में चल रही उथल-पुथल और करेंसी मार्केट के उतार-चढ़ाव से भारतीय बाजार अछूता नहीं रह गया है।

फरवरी के रिकॉर्ड स्तर से काफी नीचे पहुंचा भंडार

अगर थोड़ा पीछे मुड़कर देखें, तो इसी साल फरवरी के आखिरी दिनों में भारतीय फॉरेक्स रिजर्व ने 728.49 अरब डॉलर का एक ऐसा ऐतिहासिक शिखर छुआ था, जिसने दुनिया भर के बाजारों में भारत की आर्थिक साख को चमका दिया था। तब इसे घरेलू अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ढाल माना जा रहा था। मगर, वक्त बदलते देर नहीं लगी। पश्चिम एशिया में अचानक भड़के भू-राजनीतिक तनाव, अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता का माहौल और दुनिया भर की मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की नई मजबूती ने भारतीय रिजर्व पर दबाव बनाना शुरू कर दिया।

नतीजा यह है कि आज हमारा विदेशी मुद्रा भंडार अपने उस लाइफ-टाइम हाई से 47 अरब डॉलर से भी ज्यादा नीचे खिसक आया है। इस मामले पर आर्थिक विश्लेषकों का नजरिया थोड़ा अलग है। उनका कहना है कि इस पूरी गिरावट को केवल रिजर्व बैंक द्वारा डॉलर बेचे जाने के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। इसमें एक बड़ा रोल ‘मूल्यांकन में बदलाव’ यानी रीवैल्युएशन का भी है, जिसके चलते परिसंपत्तियों की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कम हुई हैं।

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विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों और सोने के दाम टूटे

फंड के सबसे बड़े हिस्से यानी विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों पर नजर डालें, तो आलोच्य हफ्ते के दौरान इसमें 2.87 अरब डॉलर की कमी आई है और अब यह 543.03 अरब डॉलर के स्तर पर है। आपको बता दें कि इस कोटे में केवल डॉलर ही नहीं होता, बल्कि वैश्विक व्यापार में दबदबा रखने वाली अन्य मुद्राएं जैसे यूरो, ब्रिटिश पाउंड,जापानी येन भी शामिल होती हैं।केंद्रीय बैंक के पूर्व अधिकारियों के मुताबिक, जब भी रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड गिरावट की तरफ बढ़ता है, तो उसे सहारा देने के लिए आरबीआई को अपने बाजार दखल के तहत डॉलर बेचने पड़ते हैं। इसका सीधा असर एफसीए पर पड़ता है। इसके साथ ही, जब डॉलर बाकी वैश्विक मुद्राओं पर हावी होता है, तो आरबीआई के पोर्टफोलियो में मौजूद गैर-डॉलर संपत्तियों की वैल्यू डॉलर के टर्म में अपने आप घट जाती है।

दिलचस्प बात यह है कि इस बार फॉरेक्स रिजर्व को सबसे बड़ा नुकसान किसी कागजी मुद्रा से नहीं, बल्कि सोने से हुआ है। आंकड़ों के मुताबिक, देश के स्वर्ण भंडार का कुल मूल्य 4.53 अरब डॉलर की भारी गिरावट के साथ 114.79 अरब डॉलर पर सिमट गया। सर्राफा बाजार के जानकारों का कहना है कि वैश्विक मंच पर सोने की कीमतों में आई हालिया नरमी ने केंद्रीय बैंक के गोल्ड रिजर्व की वैल्यू को नीचे खींच दिया है।

आईएमएफ के कोटे में भी सुस्ती, पर उम्मीदें बरकरार

फॉरेक्स रिजर्व के बाकी छोटे घटकों की सेहत भी इस हफ्ते थोड़ी नासाज ही रही। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास मौजूद भारत का विशेष आहरण अधिकार 7.7 करोड़ डॉलर की मामूली गिरावट के साथ 18.75 अरब डॉलर रह गया। ठीक इसी तरह, आईएमएफ में देश की रिजर्व ट्रांच पोजीशन भी घटकर 4.82 अरब डॉलर के स्तर पर आ गई। 

भले ही इन दोनों मोर्चों पर नुकसान बड़ा न हो, लेकिन कुल आंकड़े को बिगाड़ने में इन्होंने भी अपनी भूमिका निभाई है।बाजार के जानकारों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रहे बदलाव और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की फूंक-फूंक कर कदम रखने की नीति के कारण रुपया लगातार दबाव में है। ऐसे में आरबीआई का प्राथमिक मकसद रुपये में किसी भी तरह की अनियंत्रित गिरावट को रोकना है, जिसके लिए वह फॉरेक्स किटी का इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हट रहा है।

आगे क्या?

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि फिलहाल खतरे की कोई घंटी नहीं बजी है, क्योंकि भारत के पास संकट से निपटने का पर्याप्त बफर मौजूद है। बहरहाल, आने वाले दिनों में कच्चा तेल, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले और भू-राजनीतिक हालात ही तय करेंगे कि हमारे खजाने की रौनक कब तक वापस लौटती है।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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