थाईलैंड और कंबोडिया के बीच दशकों पुराना सीमा विवाद एक बार फिर उभर आया है। दोनों देशों की सेनाओं के बीच हाल ही में हुई झड़पों ने पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में चिंता का माहौल पैदा कर दिया है। लंबे समय तक शांत रहने वाले इस विवाद ने अचानक गति पकड़ी है, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। कई रिपोर्टों के अनुसार, सीमा के पास गोलाबारी और हल्की झड़पों की खबरें सामने आई हैं। हालांकि दोनों देशों की सरकारें आधिकारिक रूप से इसे “सीमित घटना” बता रही हैं, लेकिन जमीनी स्थिति इससे कहीं अधिक तनावपूर्ण दिखाई दे रही है।

विवाद की जड़: प्रेह विहियर मंदिर का इलाका
थाईलैंड–कंबोडिया विवाद की जड़ प्रेह विहियर मंदिर और उसके आसपास का इलाका है, जिसे लेकर दोनों देश अपनी-अपनी प्राचीन ऐतिहासिक दावेदारी प्रस्तुत करते रहे हैं।1962 में अंतरराष्ट्रीय अदालत ने यह मंदिर कंबोडिया का हिस्सा घोषित किया था, लेकिन सीमा रेखा, आसपास के गांवों और सुरक्षात्मक क्षेत्र को लेकर विवाद बना रहा।
वर्ष 2008 से 2011 के बीच भी इस क्षेत्र में कई बार सैन्य टकराव हो चुके हैं। अब एक बार फिर वही क्षेत्र तनाव की आग में झुलसता दिखाई दे रहा है। स्थानीय नागरिकों को सुरक्षा कारणों से अपने घर छोड़ने पड़े हैं, और दोनों देशों ने अतिरिक्त सैनिक तैनात कर दिए हैं।
अमेरिका की भूमिका: ट्रंप ने कराया था शांति समझौता
यह विवाद सालों तक चलता रहा, लेकिन 2018 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा कदम तब उठा जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की पेशकश की। ट्रंप प्रशासन के प्रयासों के बाद थाईलैंड और कंबोडिया ने एक सीमित शांति समझौते पर सहमति जताई थी। उस समय इसे दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थिरता की दिशा में एक सफलता माना गया था।
समझौते में सेना की सीमित तैनाती, संयुक्त सर्वेक्षण और सीमा के संवेदनशील इलाकों में संयुक्त गश्त जैसे प्रावधान शामिल थे। कुछ वर्षों तक यह समझौता प्रभावी भी रहा, लेकिन हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि तनाव एक बार फिर उस पुराने दौर में लौट रहा है।
क्या है नए तनाव की वजह?
विश्लेषकों का मानना है कि विवाद के दोबारा भड़कने की वजहें कई है। पहली, दोनों देशों की घरेलू राजनीति में उथल-पुथल चल रही है। सत्ता परिवर्तन, चुनावी दबाव और राष्ट्रवादी भावनाओं को उभारने की कोशिशें कई बार सीमा विवादों को हवा देती हैं। दूसरी, सीमांकन का काम अभी तक तकनीकी और राजनीतिक कारणों से पूरा नहीं हो पाया, जिससे बीच-बीच में भ्रम और आरोपों का दौर चलता रहता है। तीसरी, कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन मानेट और थाई नेतृत्व के बीच संवाद की कमी भी नई घटनाओं को शांत करने में बाधा बन रही है।
हाल ही में सीमा पर गश्त के दौरान एक झंडा हटाने को लेकर विवाद शुरू हुआ, जिसने दोनों सेनाओं के बीच तनाव को बढ़ा दिया। इसके बाद स्थिति सैन्य मोर्चे पर भी संवेदनशील बनी रही।
क्षेत्रीय स्थिरता की चिंता बढ़ी
आसियान (ASEAN) देशों की चिंता भी बढ़ गई है, क्योंकि संगठन पहले भी कई बार इन दोनों देशों के बीच मध्यस्थता कर चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि दक्षिण-पूर्व एशिया का पूरा भू-राजनीतिक संतुलन इस बात पर निर्भर करता है कि थाईलैंड और कंबोडिया जैसे पड़ोसी देश अपने विवादों को शांतिपूर्वक हल करें।
क्षेत्र में चीन, अमेरिका और अन्य शक्तियों की बढ़ती दखलअंदाजी पहले से ही तनाव का कारण बन रही है, ऐसे में किसी भी सीमा संघर्ष का असर पूरे क्षेत्र की कूटनीतिक दिशा को प्रभावित कर सकता है।
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दोनों देशों की सरकारों की प्रतिक्रिया
थाईलैंड ने दावा किया है कि उसकी सेना केवल अपनी सीमा की रक्षा कर रही है और किसी भी प्रकार की आक्रामक कार्रवाई में शामिल नहीं है। वहीं कंबोडिया का कहना है कि थाई सैनिक उसके इलाके में घुसपैठ कर रहे हैं और एकतरफा निर्माण कर रहे हैं। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं, लेकिन फिर भी दोनों सरकारों ने कहा है कि वे बातचीत के लिए तैयार हैं। यह संकेत सकारात्मक माना जा रहा है, लेकिन जमीन पर तैनात सैनिकों की बढ़ती गतिविधियों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि स्थिति नाजुक बनी हुई है।
अंतरराष्ट्रीय दबाव और मध्यस्थता की संभावनाएँ
अमेरिका, चीन और यूरोपीय देशों ने दोनों राष्ट्रों से संयम बरतने की अपील की है। कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि वाशिंगटन एक बार फिर पर्दे के पीछे मध्यस्थता के प्रयास कर रहा है, जबकि बीजिंग भी क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखने के लिए सक्रिय भूमिका निभा सकता है। ASEAN भविष्य में विशेष वार्ता तंत्र भी बना सकता है, क्योंकि इस तरह के संघर्ष संगठन की विश्वसनीयता को चुनौती देते हैं।
स्थिति पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि तनाव बढ़ता है, तो सीमा से लगे गांवों में मानवीय संकट गहरा सकता है। कृषि कार्य प्रभावित होगा और दोनों देशों के व्यापारिक संबंध भी कमजोर हो सकते हैं, क्योंकि प्रेह विहियर मंदिर एक यूनेस्को विश्व विरासत स्थल भी है, ऐसे में उसके आसपास किसी भी सैन्य गतिविधि से अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आपत्ति बढ़ सकती है।
हालांकि अभी स्थिति पूर्ण युद्ध जैसी नहीं है, लेकिन घटनाओं में तेजी यह बताती है कि समय रहते संवाद न होने पर हालात और गंभीर हो सकते हैं।






