यह जानकारी हाल ही में 22 जनवरी 2026 को दिल्ली में आयोजित हुए ‘राष्ट्रीय मनरेगा श्रमिक सम्मेलन’ से संबंधित है। कांग्रेस पार्टी ने केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा (MGNREGA) कानून को बदलकर नया ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी VB-G RAM G Act लाए जाने के विरोध में यह ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ शुरू किया है।
राष्ट्रीय मनरेगा श्रमिक सम्मेलन – कार्यक्रम का आयोजन कहाँ और कब?
यह भव्य सम्मेलन 22 जनवरी 2026 को दिल्ली के जवाहर भवन में आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में देश के लगभग 25 राज्यों से 400 से अधिक मनरेगा श्रमिक और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए।
- सांकेतिक विरोध – श्रमिक अपने-अपने कार्यस्थलों से ‘एक मुट्ठी मिट्टी’ लेकर दिल्ली पहुंचे थे, जिसे एक बड़े पात्र में एकत्रित कर एकता का संदेश दिया गया।
- प्रतीकात्मक वेशभूषा – कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सिर पर साफा (गमछा) बांधकर और हाथों में फावड़ा लेकर मंच पर प्रवेश किया। यह दृश्य श्रमिकों के साथ उनकी एकजुटता और ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ के आगाज़ का प्रतीक था।
कांग्रेस ने क्यों किया ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ का आगाज़
कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार ने मनरेगा की “आत्मा” को खत्म कर दिया है। मुख्य आपत्तियां निम्नलिखित हैं-
- कानूनी अधिकार का अंत – कांग्रेस के अनुसार, मनरेगा एक ‘अधिकार-आधारित’ कानून था जहाँ काम मांगना श्रमिक का हक था। नए कानून (VB-G RAM G) में इसे सरकार की दया पर निर्भर एक ‘योजना’ बना दिया गया है।
- नाम से गांधी का हटना – नए कानून से ‘महात्मा गांधी’ का नाम हटाए जाने को विपक्ष ने बापू का अपमान बताया है।
- राज्यों पर बोझ – पहले मनरेगा की मजदूरी का 100% केंद्र देता था। अब नए नियमों के तहत राज्यों को 40% हिस्सा देना होगा, जिससे विपक्षी राज्यों में फंड की कमी हो सकती है।
- ठेकेदारी प्रथा की वापसी – राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि अब पंचायतों के बजाय ठेकेदार और ब्यूरोक्रेसी तय करेंगे कि काम कहाँ होगा, जिससे भ्रष्टाचार बढ़ेगा।
राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के प्रमुख हमले
सम्मेलन को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने भाजपा पर तीखे सवाल उठाए-
- मोदी जी पीछे हट जाएंगे – राहुल गांधी ने कहा कि जैसे किसानों ने एकजुट होकर तीन कृषि कानूनों को वापस कराया, वैसे ही यदि श्रमिक एकजुट हो जाएं तो मोदी सरकार को यह नया कानून वापस लेना होगा।
- पूंजीपतियों का साथ – उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार गरीबों का पैसा छीनकर अपने मित्र उद्योगपतियों (अडानी-अंबानी) को देना चाहती है।
- शक्तियों का केंद्रीकरण – खड़गे ने कहा कि दिल्ली में बैठकर यह तय नहीं किया जा सकता कि किस गाँव में कौन सा गड्ढा खुदेगा; यह अधिकार ग्राम पंचायतों का होना चाहिए।
भाजपा का पलटवार और कार्यवाही
कांग्रेस के इस आंदोलन के बाद भाजपा ने भी आक्रामक रुख अपनाया है। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कांग्रेस के आरोपों को “भ्रामक” करार दिया।
भाजपा के प्रमुख तर्क
- 125 दिन का रोज़गार – भाजपा का कहना है कि उन्होंने मनरेगा के 100 दिनों को बढ़ाकर अब 125 दिन कर दिया है, जो श्रमिकों के हित में है।
- भ्रष्टाचार पर रोक – सरकार के अनुसार, पुराने मनरेगा में बहुत फर्जीवाड़ा था, जिसे डिजिटल हाजिरी और पारदर्शिता के जरिए सुधारा जा रहा है।
- संपत्ति का निर्माण – शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि मोदी सरकार के दौरान मनरेगा से स्थायी संपत्तियां (तालाब, सड़कें) अधिक बनी हैं, जबकि कांग्रेस के समय सिर्फ ‘गड्ढे’ खोदे जाते थे।
भाजपा नेताओं के बयान
कांग्रेस झूठ फैलाकर गरीबों को गुमराह कर रही है। हमने मनरेगा को खत्म नहीं किया, बल्कि उसे ‘विकसित भारत’ के संकल्प के साथ और अधिक सशक्त बनाया है।” — शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री।
आंदोलन की अगली रूपरेखा
कांग्रेस ने इस संग्राम को केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रखा है
- जनवरी अंत तक – ब्लॉक और पंचायत स्तर पर ‘चौपाल’ और विरोध प्रदर्शन।
- फरवरी 7-15 – देश भर की विधानसभाओं का ‘घेराव’।
- फरवरी 16-25 – चार राज्यों में बड़ी रैलियां और आंदोलन का समापन।
दिल्ली का यह सम्मेलन महज एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी रोज़गार गारंटी योजना पर छिड़ी एक बड़ी वैचारिक जंग का हिस्सा है। जहाँ कांग्रेस इसे ‘हक की लड़ाई’ कह रही है, वहीं भाजपा इसे ‘सुधार और विकास’ का नाम दे रही है।
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