पूर्व पीएम खालिदा जिया की अंतिम यात्रा-बांग्लादेश की राजनीति के एक लंबे और प्रभावशाली अध्याय का अंत हो गया। देश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की प्रमुख रहीं खालिदा जिया को पूरे राजकीय और धार्मिक सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया। उनके अंतिम संस्कार के मौके पर ढाका समेत देश के कई हिस्सों से लोग उमड़ पड़े। आम नागरिकों से लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं, वरिष्ठ नेताओं और सामाजिक हस्तियों तक, सभी ने नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी। खालिदा जिया का जाना केवल एक नेता का जाना नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की विदाई है जिसने बांग्लादेश की राजनीति को दशकों तक दिशा दी।
जनाज़े में उमड़ा जनसैलाब, सड़कों पर दिखा जनभावनाओं का सैलाब
खालिदा जिया के जनाज़े के दिन ढाका की सड़कों पर सुबह से ही भीड़ जुटने लगी थी। उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए जब लाया गया, तो हजारों लोग हाथों में फूल, पार्टी झंडे और बैनर लिए खड़े नजर आए। “खालिदा जिया अमर रहें” और “देश की नेता को सलाम” जैसे नारों से माहौल भावुक हो उठा। कई लोग अपने आंसू नहीं रोक पाए, वहीं कुछ बुजुर्गों को सहारा देकर आगे बढ़ाया गया ताकि वे अपने जीवन की सबसे प्रभावशाली नेता को आखिरी बार देख सकें।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे, लेकिन भीड़ का अनुशासन अपने आप में एक संदेश दे रहा था। लोग कतारों में खड़े होकर अंतिम दर्शन कर रहे थे। महिलाओं और युवाओं की बड़ी संख्या भी मौजूद थी, जो यह दर्शाती है कि खालिदा जिया की राजनीतिक विरासत केवल पुराने समर्थकों तक सीमित नहीं थी। जनाज़े की नमाज़ के बाद जब उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया, तो पूरे माहौल में सन्नाटा छा गया। यह सन्नाटा उस खालीपन को दर्शा रहा था, जो उनके जाने से बांग्लादेश की राजनीति में पैदा हुआ है।
सत्ता, संघर्ष और विवादों से भरा रहा खालिदा जिया का राजनीतिक सफर
खालिदा जिया का राजनीतिक सफर आसान नहीं रहा। एक सैन्य शासक की पत्नी से देश की सबसे ताकतवर महिला नेताओं में शामिल होने तक का उनका सफर संघर्ष, सत्ता और विवादों से भरा रहा। उन्होंने दो बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के रूप में देश की बागडोर संभाली और हर बार मजबूत फैसलों के लिए जानी गईं। उनके समर्थक उन्हें लोकतंत्र की आवाज मानते हैं, तो आलोचक उन पर कठोर राजनीति करने का आरोप लगाते रहे हैं।
उनका जीवन केवल सत्ता तक सीमित नहीं रहा। विपक्ष में रहते हुए उन्होंने कई कठिन दौर देखे—नज़रबंदी, कानूनी लड़ाइयां और लंबी राजनीतिक तनातनी। इसके बावजूद उन्होंने अपने समर्थकों से संपर्क बनाए रखा और पार्टी को संगठित रखने की कोशिश की। यही वजह है कि उनके अंतिम विदाई के समय पार्टी कार्यकर्ताओं में गहरा भावनात्मक जुड़ाव दिखा। उनके लिए खालिदा जिया केवल एक नेता नहीं, बल्कि संघर्ष और धैर्य की प्रतीक थीं।
खालिदा जिया और मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व के बीच टकराव भी बांग्लादेश की राजनीति का अहम हिस्सा रहा। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव ने देश की राजनीति को कई बार अस्थिर किया। इन सबके बावजूद खालिदा जिया ने अपने राजनीतिक अस्तित्व को बनाए रखा और समर्थकों के बीच अपनी पकड़ कायम रखी। उनके जाने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि बीएनपी उनकी कमी को कैसे पूरा करेगी और बांग्लादेश की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी।
देश और राजनीति पर छोड़ी गहरी छाप, विरासत पर जारी है बहस
खालिदा जिया की मौत के बाद बांग्लादेश में शोक की लहर है। देशभर से लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। कई राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने उनके योगदान को याद करते हुए कहा कि वे बांग्लादेश की राजनीति की सबसे प्रभावशाली महिलाओं में से एक थीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई नेताओं ने उनके निधन पर शोक जताया और उनके साथ बिताए गए राजनीतिक पलों को याद किया।
हालांकि, उनकी विरासत को लेकर बहस भी जारी है। कुछ लोग उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षक मानते हैं, तो कुछ उनकी राजनीति को टकरावपूर्ण बताते हैं। लेकिन इस बात से शायद ही कोई इनकार करेगा कि उन्होंने बांग्लादेश की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। उनका नेतृत्व, उनकी शैली और उनके फैसले आने वाले वर्षों तक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने रहेंगे।
आज जब उन्हें सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया, तो बांग्लादेश की अवाम ने यह साफ कर दिया कि राजनीति से परे, खालिदा जिया एक ऐसी शख्सियत थीं जिन्होंने लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाई। उनकी अंतिम विदाई केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उस इतिहास को सलाम थी, जो उनके साथ जुड़ा रहा। आने वाले समय में बांग्लादेश की राजनीति उनके बिना नई राह तलाशेगी, लेकिन खालिदा जिया का नाम और उनका असर लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा।
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