गुजरात विधानसभा ने हाल ही में ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ (UCC) विधेयक को पारित कर दिया है। उत्तराखंड के बाद गुजरात ऐसा करने वाला भारत का दूसरा राज्य बन गया है। इस ऐतिहासिक कदम से राज्य में तलाक, विवाह, उत्तराधिकार और live-in रिलेशनशिप जैसे नागरिक मामलों के लिए एक समान कानून लागू हो जाएगा।
गुजरात UCC बिल 2026 – एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
गुजरात सरकार ने अक्टूबर 2022 में पहली बार UCC लागू करने के अपने इरादे की घोषणा की थी। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया था। समिति ने राज्य भर में व्यापक परामर्श किया जिसमें लगभग 20 लाख सुझाव प्राप्त हुए।
- पेश किया गया – 24 मार्च 2026 को मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल द्वारा।
- बहस का समय – विधानसभा में लगभग 7 से 8 घंटे तक तीखी बहस चली।
- परिणाम – कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) के कड़े विरोध और वॉकआउट के बावजूद बिल बहुमत से पारित हुआ।
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यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) क्या है?
समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) का अर्थ है सभी नागरिकों के लिए एक समान व्यक्तिगत कानून। वर्तमान में भारत में अलग-अलग धर्मों के अपने पर्सनल लॉ जैसे हिंदू मैरिज एक्ट, मुस्लिम पर्सनल लॉ आदि हैं। UCC का उद्देश्य इन धार्मिक कानूनों के लिए पूरे राज्य में एक समान कानून लागू करना है चाहे व्यक्ति किसी भी धर्म या जाति का हो।
गुजरात UCC विधेयक 2026 की मुख्य विशेषताएं
विधेयक के प्रमुख प्रावधानों को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है
विवाह और तलाक के नियम
- समान शर्तें – विवाह के लिए न्यूनतम आयु पुरुषों के लिए 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष निर्धारित की गई है।
- बहुविवाह पर रोक – एक जीवनसाथी के जीवित रहते हुए दूसरी शादी करना पूरी तरह प्रतिबंधित है। उल्लंघन करने पर कठोर दंड का प्रावधान है।
- पंजीकरण – धार्मिक या पारंपरिक तरीके से की गई शादियों का पंजीकरण अनिवार्य है।
- तलाक – तलाक के आधार जैसे क्रूरता, व्यभिचार, परित्याग सभी धर्मों के लिए समान होंगे। कोर्ट के बाहर होने वाले तलाक को अमान्य माना गया है।
लिव-इन रिलेशनशिप का कानूनी ढांचा
गुजरात UCC में लिव-इन रिलेशनशिप को पहली बार एक स्पष्ट कानूनी दायरे में लाया गया है
- अनिवार्य पंजीकरण – राज्य में रहने वाले लिव-इन जोड़ों को अपने संबंध का पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। पंजीकरण न कराने पर दंड या जुर्माने का प्रावधान है।
- भरण-पोषण – लिव-इन पार्टनर द्वारा छोड़े जाने की स्थिति में महिला भरण-पोषण (मेंटेनेंस) की हकदार होगी।
- बच्चों के अधिकार – ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों को कानूनी मान्यता दी गई है और उन्हें माता-पिता की संपत्ति में समान अधिकार प्राप्त होगा।
उत्तराधिकार और संपत्ति का अधिकार
- विधेयक का उद्देश्य बेटियों और महिलाओं को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार सुनिश्चित करना है ताकि लैंगिक समानता (Gender Equality) स्थापित की जा सके।
महत्वपूर्ण छूट
- अनुसूचित जनजाति (ST) – इस विधेयक के प्रावधान राज्य की अनुसूचित जनजाति (ST) आबादी पर लागू नहीं होंगे ताकि उनकी पारंपरिक संस्कृति और प्रथाओं को संरक्षित रखा जा सके।
UCC की आवश्यकता क्यों है?
- समानता और न्याय – यह कानून विशेष रूप से महिलाओं को धार्मिक कानूनों में मौजूद असमानताओं से मुक्ति दिलाने और उन्हें समान अधिकार देने के लिए बनाया गया है।
- कानूनी सरलीकरण – विभिन्न धर्मों के अलग-अलग कानूनों के कारण उत्पन्न कानूनी उलझनों को कम करना।
- राष्ट्रीय एकता – संविधान के अनुच्छेद 44 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) में समान नागरिक संहिता की परिकल्पना की गई है जिसे लागू करना राष्ट्रीय एकता की दिशा में एक कदम माना जा रहा है।
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विधानसभा में वोटिंग और बहुमत का गणित
गुजरात विधानसभा में इस बिल को पारित करवाने के लिए साधारण बहुमत (Simple Majority) की आवश्यकता थी क्योंकि यह एक राज्य स्तरीय विधेयक था।
वोटिंग का विवरण
- सदन की कुल सीटें – 182
- सत्ता पक्ष (BJP) – भाजपा के पास सदन में प्रचंड बहुमत है जिससे बिल का पारित होना तय था।
- विपक्ष का रुख – कांग्रेस ने इस बिल को “संविधान के अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता” का उल्लंघन बताते हुए इसे प्रवर समिति (Select Committee) को भेजने की मांग की। जब सरकार ने यह मांग नहीं मानी तो कांग्रेस और AAP के सदस्यों ने सदन से वॉकआउट कर दिया।
- वोटिंग प्रक्रिया – विपक्ष के अनुपस्थित रहने पर स्पीकर ने ध्वनि मत (Voice Vote) के माध्यम से वोटिंग कराई। ध्वनि मत में सत्ता पक्ष के “हाँ” के शोर के साथ बिल को बहुमत से पारित घोषित कर दिया गया।
उत्तराखंड और गुजरात – तुलनात्मक अध्ययन
यद्यपि दोनों राज्यों के बिल काफी हद तक समान हैं दोनों ही रंजना देसाई समिति की सिफारिशों पर आधारित हैं लेकिन गुजरात ने अपने स्थानीय भौगोलिक और जनसांख्यिकीय ढांचे के अनुसार कुछ मामूली तकनीकी बदलाव किए हैं।
| विशेषता | विवरण |
| पहला राज्य | उत्तराखंड (फरवरी 2024) |
| दूसरा राज्य | गुजरात (मार्च 2026) |
| मुख्य फोकस | महिला अधिकार और सामाजिक समानता |
| सजा का प्रावधान | बहुविवाह या धोखाधड़ी से विवाह पर 7 साल तक की जेल |
गुजरात का यह कदम भारत में ‘एक राष्ट्र, एक कानून’ की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। सरकार का तर्क है कि इससे विशेष रूप से अल्पसंख्यक महिलाओं को न्याय मिलेगा और कानून का सरलीकरण होगा। वहीं आलोचक इसे निजी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप मान रहे हैं। अब यह बिल राज्यपाल (governor) की मंजूरी के बाद कानून का रूप ले लेगा।
नोट – यह जानकारी वर्तमान (मार्च 2026) के घटनाक्रमों और उपलब्ध ड्राफ्ट रिपोर्टों के आधार पर तैयार की गई है।







