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पश्चिम एशिया संकट की तपिश- भारत का राजकोषीय घाटा बढ़कर 4.7% होने की आशंका

पश्चिम एशिया संकट की तपिश- भारत का राजकोषीय घाटा बढ़कर 4.7% होने की आशंका
नवजोत कौर सिद्धू
On: जून 3, 2026 2:54 अपराह्न
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नई दिल्ली। पश्चिम एशिया सुलग रहा भू-राजनीतिक तनाव अब भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भी मुश्किलें खड़ी करने लगा है। रेटिंग एजेंसी आईसीआरए ने आगाह किया है कि अगर कच्चे तेल के दाम इसी तरह आसमान छूते रहे और वैश्विक हालात जल्द न सुधरे, तो चालू वित्त वर्ष 2026-27 में केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़कर जीडीपी के 4.7 फीसदी तक जा सकता है। यह आंकड़ा सरकार द्वारा बजट में तय किए गए 4.3 प्रतिशत के लक्ष्य से कहीं ज्यादा है।

दरअसल, भारत अपनी जरूरत का तकरीबन 80-85 फीसदी कच्चा तेल बाहर से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाली हर हलचल का सीधा असर देश की तिजोरी, महंगाई और आर्थिक रफ्तार पर पड़ता है। अर्थशास्त्रियों का साफ कहना है कि पश्चिम एशिया के संकट ने क्रूड ऑयल की कीमतों में जो आग लगाई है, उसकी सीधी मार भारत के बजटीय गणित पर पड़ रही है।

पिछले साल दिखाया था दम, पर इस बार राह आसान नहीं

अगर पिछले वित्त वर्ष 2025-26 पर नजर डालें, तो केंद्र सरकार ने वित्तीय अनुशासन के मामले में शानदार प्रदर्शन किया था। शुरुआती सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल राजकोषीय घाटा करीब 15.2 लाख करोड़ रुपये रहा, जो संशोधित अनुमानों से भी लगभग 40 हजार करोड़ रुपये कम था।जाहिर है यह कामयाबी आसानी से नहीं मिली। इसके लिए सरकार को कई मंत्रालयों के खर्चों में भारी कटौती करनी पड़ी थी और कड़े वित्तीय फैसले लेने पड़े थे। हालांकि, इस दौरान फर्टिलाइजर सब्सिडी पर उम्मीद से ज्यादा पैसा खर्च हुआ और आर्थिक स्थिरता कोष के लिए भी मोटी रकम अलग रखनी पड़ी, फिर भी सरकार घाटे को काबू में रखने में सफल रही। लेकिन जानकारों का मानना है कि इस साल वैसी सख्ती बरत पाना सरकार के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होगा।

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टैक्स कलेक्शन का मोर्चे पर भी बढ़ रहा है दबाव

सरकार के लिए मुसीबत सिर्फ महंगी तेल कीमतें ही नहीं हैं, बल्कि टैक्स की सुस्त रफ्तार ने भी चिंता बढ़ा दी है। आईसीआरए की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर के मुताबिक, पिछले वित्त वर्ष में पर्सनल इनकम टैक्स से आने वाला राजस्व उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। यही वजह है कि चालू वित्त वर्ष में टैक्स कलेक्शन के बड़े लक्ष्यों को हासिल करना लोहे के चने चबाने जैसा हो गया है।सरकार ने इस साल के बजट में आयकर संग्रह में अच्छी-खासी बढ़ोतरी की उम्मीद जताई थी, लेकिन मौजूदा जमीनी हकीकत को देखते हुए यह डगर आसान नहीं दिखती। अगर आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार सुस्त पड़ती है, तो आने वाले दिनों में टैक्स कलेक्शन पर इसका और बुरा असर देखने को मिल सकता है।

पेट्रोल-डीजल पर टैक्स कटौती से तिजोरी को झटका

आम जनता को महंगाई से राहत देने के लिए केंद्र सरकार पहले ही पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटा चुकी है। इस कदम से आम आदमी की जेब को तो राहत मिली, लेकिन सरकारी खजाने को भारी चपत लगी है। अनुमानों के मुताबिक, इस टैक्स कटौती की वजह से सरकार को 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ सकता है।इसके ऊपर से यदि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊपर बनी रहीं, तो सरकार पर देश के भीतर ईंधन के दाम न बढ़ने देने का भारी दबाव होगा। 

95 से 100 डॉलर का क्रूड बढ़ाएगा मुश्किलें

बाजार विश्लेषकों का मानना है कि इस वक्त भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ा जोखिम कच्चे तेल की कीमतों का ही है। अगर ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में टिका रहता है, तो भारत का आयात बिल बेतहाशा बढ़ जाएगा।आईसीआरए की रिपोर्ट कहती है कि अगर इस पूरे साल कच्चे तेल की औसत कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास भी रहती है, तो सरकार पर भारी अतिरिक्त वित्तीय बोझ आएगा। तेल महंगा होने से माल ढुलाई बढ़ेगी और फर्टिलाइजर सब्सिडी का बिल भी सरकार को बढ़ाना पड़ेगा।

तेल कंपनियों और सब्सिडी का चक्रव्यूह

तेल के महंगे होने का असर केवल सरकार के आयात बिल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह देश की सरकारी तेल कंपनियों के मुनाफे को भी चट कर जाता है। अगर ये कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार की बढ़ी हुई कीमतें घरेलू उपभोक्ताओं पर नहीं डाल पाती हैं, तो उन्हें घाटा उठाना पड़ता है। इसका सीधा असर सरकार को मिलने वाले डिविडेंड और टैक्स पर पड़ता है। साथ ही, खेती की लागत न बढ़े, इसके लिए सरकार को किसानों के हक में फर्टिलाइजर सब्सिडी भी बढ़ानी होगी, जो वित्तीय दबाव को और ज्यादा बढ़ा देगा।

महंगाई और विकास दर पर दोहरी मार

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि पश्चिम एशिया का यह संकट सिर्फ सरकार के बही-खाते तक सीमित नहीं रहने वाला। महंगा ईंधन सीधे तौर पर ट्रांसपोर्टेशन और मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट को बढ़ाएगा, जिससे बाजार में हर चीज महंगी होगी। जब महंगाई बढ़ेगी, तो लोग खर्च कम करेंगे और इसका सीधा असर फैक्ट्रियों के प्रोडक्शन और देश की जीडीपी ग्रोथ पर पड़ेगा। खुद रिजर्व बैंक और तमाम वैश्विक संस्थाएं भी यह चेतावनी दे चुकी हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी यह अनिश्चितता भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए आने वाले दिनों में बड़ी परीक्षा साबित हो सकती है।अब देखना यह होगा कि पिछले साल वित्तीय अनुशासन की मिसाल पेश करने वाली सरकार, इस बार वैश्विक संकट के इस चक्रव्यूह से देश की अर्थव्यवस्था को कैसे बाहर निकालती है।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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