तेहरान/इस्लामाबाद। पश्चिम एशिया में गहराते भू-राजनीतिक संकट और युद्ध के बादलों के बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर शुक्रवार को अचानक ईरान की राजधानी तेहरान पहुंचे। जनरल मुनीर का यह दौरा ऐसे बेहद नाजुक समय में हो रहा है जब अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य व कूटनीतिक तनातनी चरम पर है। इस दौरे के पीछे का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच रुकी हुई बातचीत को फिर से पटरी पर लाना और मध्यस्थ की भूमिका निभाना माना जा रहा है।
इस्लामाबाद के रणनीतिक गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, पाकिस्तान इस समय वाशिंगटन और तेहरान के बीच एक मजबूत सेतु बनने की कोशिश में जुटा है।पाकिस्तानी सैन्य और कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, जनरल आसिम मुनीर अपनी इस यात्रा के दौरान ईरान के शीर्ष सैन्य कमांडरों और सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व के साथ बंद कमरे में कई दौर की बैठकें करेंगे। इन बैठकों के एजेंडे में सबसे ऊपर क्षेत्रीय सुरक्षा, पश्चिम एशिया की मौजूदा अस्थिरता, खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियां और अमेरिका-ईरान के बीच संभावित शांति वार्ता की रूपरेखा तैयार करना शामिल है। जानकार इसे पाकिस्तान की ओर से क्षेत्रीय शांति के लिए उठाया गया एक बड़ा और जोखिम भरा कदम मान रहे हैं।
युद्ध जैसे हालात से बढ़ी चिंता
पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो अमेरिका और ईरान के बीच कड़वाहट अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच चुकी है। दोनों पक्षों के बीच विवाद की कई पुरानी और नई परतें हैं। एक तरफ जहां वाशिंगटन लगातार ईरान के परमाणु कार्यक्रम, यूरेनियम संवर्धन की गति और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल परियोजनाओं पर गंभीर आपत्ति जता रहा है, वहीं दूसरी तरफ तेहरान का रुख बेहद सख्त है। ईरान का स्पष्ट कहना है कि वह अपनी संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों के मामले में किसी भी बाहरी दबाव के आगे घुटने नहीं टेकेगा।इस खींचतान ने न केवल खाड़ी देशों बल्कि पूरी दुनिया की नींद उड़ा दी है।
कूटनीतिक हलकों में यह आशंका गहराई हुई है कि यदि दोनों देशों के बीच मामूली सी भी गलतफहमी हुई, तो यह पूरे क्षेत्र को एक बड़े सैन्य संघर्ष में झोंक सकती है। इस संभावित युद्ध का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। सबसे बड़ा संकट दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर पैदा होने वाला है, जिसकी वजह से कच्चे तेल के बाजारों में अभी से घबराहट देखी जा रही है।
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होर्मुज जलडमरूमध्य बना बड़ा मुद्दा
अमेरिका और ईरान के बीच जारी इस शह-मात के खेल का सबसे संवेदनशील केंद्र ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ बना हुआ है। समुद्री भूगोल और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिहाज से यह जलमार्ग पूरी दुनिया की जीवनरेखा माना जाता है। दुनिया के कुल तेल परिवहन का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है।यदि इस क्षेत्र में जरा सी भी सैन्य हलचल बढ़ती है या कोई हिंसक झड़प होती है, तो होर्मुज जलमार्ग के बंद होने या बाधित होने का खतरा पैदा हो जाएगा। इसका सीधा मतलब होगा कि दुनिया भर में पेट्रोल, डीजल और गैस की किल्लत हो जाएगी और कीमतें आसमान छूने लगेंगी। यही वजह है कि भारत समेत पूरा अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद बारीकी से नजर रखे हुए है। हाल के दिनों में इस इलाके में अमेरिकी नौसेना और उसके सहयोगियों की गश्त बढ़ी है, तो जवाब में ईरान ने भी अपनी नौसैनिक तैयारियों और मिसाइल तैनाती को कड़ा कर दिया है।
ट्रंप के बयान के बाद बढ़ी हलचल
इस पूरे घटनाक्रम में नया मोड़ तब आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ईरान को लेकर एक बेहद आक्रामक बयान जारी किया। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि ईरान बातचीत के टेबल पर सीधे तरीके से नहीं आता है और कूटनीतिक प्रयास विफल होते हैं, तो अमेरिका अन्य खतरनाक विकल्पों पर विचार करने से पीछे नहीं हटेगा।
इस बयान के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अचानक से बेचैनी और भागदौड़ बढ़ गई है।ट्रंप की इस खुली चेतावनी के जवाब में तेहरान के धार्मिक और सैन्य नेतृत्व ने भी अपनी स्थिति साफ कर दी है। ईरानी सरकार के प्रवक्ताओं ने कहा है कि ईरान किसी भी तरह की धमकी या दबाव की भाषा में बात नहीं करेगा। देश के सम्मान और आत्मरक्षा के अधिकारों पर किसी भी सूरत में समझौता नहीं किया जा सकता।
दुनिया की नजरें तेहरान पर
इन्हीं विपरीत और बेहद तनावपूर्ण परिस्थितियों के बीच जनरल आसिम मुनीर का तेहरान का यह दौरा रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। कूटनीतिक विशेषज्ञों का आकलन है कि इस दौरे के दौरान जनरल मुनीर ईरान के नेतृत्व को अमेरिका के साथ एक व्यावहारिक समझौते या कम से कम बातचीत का दौर शुरू करने के लिए मनाने का प्रयास करेंगे।यदि पाकिस्तानी सेना प्रमुख की यह शांति पहल थोड़ी भी कामयाब रहती है और दोनों पक्षों के बीच अगले दौर की बातचीत की तारीख तय हो जाती है, तो यह इस साल की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता मानी जाएगी। फिलहाल, वाशिंगटन से लेकर बीजिंग और दिल्ली तक, सभी महाशक्तियों की नजरें तेहरान की इन बैठकों से निकलने वाले आधिकारिक बयानों और संकेतों पर टिकी हुई हैं।







