मुंबई। अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर गहराती अनिश्चितता अब भारतीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों को सीधे तौर पर अपनी जद में लेने लगी है। गुरुवार का दिन घरेलू वित्तीय बाजार के लिए बेहद मायूस करने वाला रहा, जब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अपने सर्वकालिक निचले स्तर पर जा गिरा। इस गिरावट का सीधा असर दलाल स्ट्रीट पर भी देखा गया, जहां भारी उतार-चढ़ाव के बीच सेंसेक्स और निफ्टी की शुरुआत ही बड़ी गिरावट के साथ हुई। विदेशी फंडों की लगातार बिकवाली, कच्चे तेल के उबलते दाम और भू-राजनीतिक तनाव ने मिलकर बाजार का मूड पूरी तरह बिगाड़ दिया है।कारोबार के दौरान रुपये ने कमजोरी का नया रिकॉर्ड बनाया और यह प्रति डॉलर 96.90 के स्तर तक गोता लगा गया। इसे अब तक का सबसे निचला और चिंताजनक स्तर माना जा रहा है।
बाजार विश्लेषकों का साफ कहना है कि वैश्विक बाजार में डॉलर की मजबूती और महंगे होते कच्चे तेल का दोहरा दबाव भारत जैसे उभरते बाजारों पर भारी पड़ रहा है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक की नीतियों के कारण दुनिया भर के बाजारों से पैसा निकल रहा है, जिसका सीधा नुकसान भारतीय मुद्रा को उठाना पड़ा है।
क्रूड ऑयल की तेजी ने बढ़ाई देश की सिरदर्दी
भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब भी तेल की कीमतें भड़कती हैं, भारत का आयात बिल काफी बढ़ जाता है। डॉलर की इसी बढ़ती मांग के चलते रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतें नीचे आने का नाम नहीं ले रही हैं।आर्थिक जानकारों का मानना है कि यदि क्रूड की यह तपिश लंबे समय तक बनी रही, तो इसका सीधा असर देश में महंगाई के रूप में आम जनता की जेब पर पड़ेगा। तेल महंगा होने से देश का चालू खाता घाटा बढ़ने का भी खतरा पैदा हो गया है, जो अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना जाता।
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शेयर बाजार में चौतरफा बिकवाली से हाहाकार
कमजोर रुपये और वैश्विक संकेतों ने शेयर बाजार में निवेशकों के हौसले पस्त कर दिए। शुरुआती घंटों में ही सेंसेक्स सैकड़ों अंक टूट गया और निफ्टी ने भी अपने अहम सपोर्ट लेवल छोड़ दिए। सबसे ज्यादा मार बैंकिंग, सूचना प्रौद्योगिकी और मेटल सेक्टर के शेयरों पर पड़ी, जहां निवेशकों ने जमकर बिकवाली की। फिलहाल बाजार में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। निवेशक जोखिम लेने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं और कोई भी नया दांव लगाने से पहले वैश्विक हालात सामान्य होने का इंतजार कर रहे हैं। बाजार के बड़े ऑपरेटरों का भी मानना है कि जब तक कोई सकारात्मक वैश्विक संकेत नहीं मिलता, तब तक बाजार में बड़ी तेजी की उम्मीद करना बेमानी होगा।
विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार निकासी से बढ़ा संकट
भारतीय शेयर बाजार की रीढ़ माने जाने वाले विदेशी संस्थागत निवेशक पिछले कुछ समय से लगातार भारतीय बाजार से अपना पैसा खींच रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका में ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है और दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध जैसे हालात हैं। इसके चलते विदेशी निवेशक जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी बॉन्ड मार्केट की तरफ रुख कर रहे हैं। इसी बिकवाली ने भारतीय बाजार के बड़े और दिग्गज शेयरों पर दबाव दोगुना कर दिया है। घरेलू संस्थागत निवेशकों ने बाजार को संभालने की कोशिश जरूर की है, लेकिन विदेशी फंडों की भारी बिकवाली के आगे उनकी यह कोशिश नाकाफी साबित हो रही है।
मोर्चे पर मुस्तैद भारतीय रिजर्व बैंक
रुपये की इस बेकाबू रफ्तार को थामने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक पूरी तरह अलर्ट मोड में है। केंद्रीय बैंक ने स्थिति को संभालने के लिए समय-समय पर सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर की सप्लाई बढ़ाई है। आरबीआई का मकसद रुपये की गिरावट को पूरी तरह रोकना नहीं है, बल्कि बाजार में मची अफरातफरी और अचानक आने वाले बड़े उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना है ताकि भारतीय मुद्रा में स्थिरता बनी रहे। हालांकि, आर्थिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि जब तक वैश्विक मोर्चे पर शांति नहीं होती और कच्चे तेल के दाम स्थिर नहीं होते, तब तक रुपये पर यह दबाव लगातार बना रहेगा।
खुदरा निवेशकों के लिए बाजार दिग्गजों की सीधी सलाह
बाजार में लगातार आ रही गिरावट से छोटे और खुदरा निवेशक थोड़े सहमे हुए हैं। कई लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि इस उतार-चढ़ाव के दौर में क्या रणनीति अपनाई जाए और अपने पोर्टफोलियो को कैसे बचाया जाए। इस पर बाजार दिग्गजों की सीधी सलाह है कि घबराहट में आकर जल्दबाजी में कोई भी गलत फैसला न लें। अगर आपने मजबूत बुनियादी ढांचे वाली अच्छी कंपनियों में लंबी अवधि के लिए निवेश किया है, तो मौजूदा गिरावट से डरने की जरूरत नहीं है।
आने वाले दिनों में क्या रहेगी बाजार की चाल
आने वाले दिनों में भारतीय बाजार की दिशा मुख्य रूप से तीन चीजों पर टिकी होगी। इसमें अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले, कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों का रुख सबसे महत्वपूर्ण रहने वाला है। अगर आने वाले समय में वैश्विक मोर्चे पर भू-राजनीतिक तनाव कम होता है और कच्चे तेल की कीमतों में थोड़ी नरमी आती है, तभी भारतीय बाजारों को राहत की सांस मिलेगी। फिलहाल, हर किसी की नजरें रिजर्व बैंक की अगली रणनीति और वैश्विक घटनाक्रमों पर ही टिकी हैं, जिसके आधार पर निवेशक आगे की रणनीति तय करेंगे।







