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मंत्री राव उदय प्रताप सिंह को कोर्ट का नोटिस यदि पाये‌ गये तो 3 साल की सजा का है प्रावधान

मंत्री राव उदय प्रताप सिंह को कोर्ट का नोटिस यदि पाये‌ गये तो 3 साल की सजा का है प्रावधान
नवजोत कौर सिद्धू
On: मार्च 8, 2026 7:39 अपराह्न
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 2024 की तिरंगा यात्रा से जुड़ा है मामला,एमपी-एमएलए कोर्ट ने मांगा जवाब डेलीबार्ता मध्य प्रदेश की राजनीति में एक नया कानूनी विवाद सामने आया है। जहां प्रदेश सरकार में स्कूल शिक्षा और परिवहन मंत्री (School Education & Transport Minister) राव उदय प्रताप सिंह पर राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का आरोप लगा है। इस मामले में विशेष न्यायालय एमपी-एमएलए कोर्ट (MP-MLA Court) ने उन्हें नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। विधि जानकारों कि मानें तो यदि अदालत (Court) में आरोप साबित होते हैं, तो तीन साल (3 Years) तक की सजा का प्रावधान है।

पूरा मामला बीते वर्ष 2024 से जुड़ा है, जब तिरंगा यात्रा निकाली गई थी। इस मामले में शिकायतकर्ता नें आरोप लगाते हुये बताया कि तिरंगा यात्रा के दौरान राष्ट्रीय ध्वज (National Flag) को जिस तरह से वाहन पर लगाया गया था, उससे उसकी गरिमा प्रभावित हुई और यह राष्ट्रीय गौरव का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के नियमों का उल्लंघन है।

कोर्ट में दायर हुआ परिवाद

इस मामले में नरसिंहपुर जिले के गोटेगांव निवासी कौशल नामक व्यक्ति की ओर से विशेष न्यायालय एमपी-एमएलए कोर्ट में परिवाद दायर किया गया था। परिवाद में आरोप लगाया गया कि मंत्री राव उदय प्रताप सिंह द्वारा राष्ट्रीय ध्वज का सम्मानजनक तरीके से उपयोग नहीं किया गया, जो कि कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है।

मामले की सुनवाई करते हुए विशेष न्यायाधीश डी.पी. सूत्रकार ने प्रारंभिक तथ्यों को देखते हुए मंत्री को नोटिस जारी किया है और उनसे इस मामले में जवाब प्रस्तुत करने को कहा है। अदालत ने शिकायत और प्रस्तुत साक्ष्यों को गंभीरता से लेते हुए अगली सुनवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

 तिरंगा यात्रा से जुड़ा है विवाद

परिवाद में बताया गया है कि 11 अगस्त 2024 को नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा में एक तिरंगा यात्रा का आयोजन किया गया था। इस यात्रा का नेतृत्व मंत्री राव उदय प्रताप सिंह कर रहे थे। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे और देशभक्ति के नारों के साथ यात्रा निकाली जा रही थी। शिकायत के अनुसार इस दौरान मंत्री राव उदय प्रताप सिंह एक खुली जीप के बोनट पर बैठकर लोगों को संबोधित कर रहे थे। आरोप है कि उसी जीप के बोनट पर राष्ट्रीय ध्वज को इस तरह लगाया गया था कि वह झुक रहा था और मंत्री के पैरों को स्पर्श कर रहा था। परिवादकर्ता का कहना है कि यह स्थिति राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा के विपरीत थी और इससे तिरंगे का सम्मान प्रभावित हुआ। इसी आधार पर इसे राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का मामला बताते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया।

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राष्ट्रीय गौरव का अपमान, निवारण अधिनियम का हवाला

शिकायत में राष्ट्रीय गौरव का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 का उल्लेख किया गया है। इस कानून के तहत राष्ट्रीय ध्वज के उपयोग और प्रदर्शन के लिए स्पष्ट नियम निर्धारित किए गए हैं।

कानून के अनुसार किसी भी वाहन के बोनट, छत या अन्य हिस्से को राष्ट्रीय ध्वज से ढकना या इस तरह लगाना कि उसकी गरिमा प्रभावित हो, प्रतिबंधित है। यदि कोई व्यक्ति इन नियमों का उल्लंघन करता है तो यह अपराध की श्रेणी में आता है।

इस अधिनियम के तहत दोषी पाए जाने पर अधिकतम तीन साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। यही कारण है कि अदालत ने इस मामले को गंभीर मानते हुए मंत्री से जवाब मांगा है।

कार्रवाई न किये जानें का पुलिस पर भी आरोप

परिवाद में यह भी कहा गया है कि इस मामले को लेकर पहले पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई थी। शिकायतकर्ता के अनुसार गाडरवारा थाने में घटना की जानकारी दी गई थी और एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई थी।

हालांकि शिकायतकर्ता का आरोप है कि मंत्री के पद और प्रभाव के कारण पुलिस ने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की। इसके बाद पुलिस अधीक्षक को भी कई बार लिखित शिकायत दी गई, लेकिन वहां से भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

इसी कारण अंततः शिकायतकर्ता ने अदालत का सहारा लिया और एमपी-एमएलए कोर्ट में परिवाद दायर किया।

पेश किये वीडियो और फोटो 

शिकायतकर्ता ने अपने दावे को मजबूत करने के लिए अदालत में कुछ साक्ष्य भी प्रस्तुत किए हैं। इनमें तिरंगा यात्रा के वीडियो और तस्वीरें शामिल हैं। इन तस्वीरों और वीडियो में कथित रूप से वह दृश्य दिखाया गया है जिसमें जीप के बोनट पर राष्ट्रीय ध्वज लगा हुआ है और मंत्री वहीं बैठकर लोगों को संबोधित कर रहे हैं।

अदालत ने इन साक्ष्यों को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की सुनवाई शुरू की है। अब मंत्री राव उदय प्रताप सिंह को नोटिस के माध्यम से अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है।

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Supreme Court के फैसले का भी दिया हवाला

परिवाद में सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण निर्णय का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि यदि किसी संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को दी जाती है, तो एफआईआर दर्ज करना पुलिस का कर्तव्य होता है।

शिकायतकर्ता का कहना है कि इस सिद्धांत के बावजूद पुलिस ने मामले में एफआईआर दर्ज नहीं की, इसलिए न्याय पाने के लिए उन्हें सीधे अदालत में परिवाद दायर करना पड़ा।

आगे की सुनवाई पर टिकी निगाहें

एमपी-एमएलए कोर्ट (MP MLA Court) द्वारा नोटिस (Notice) जारी होने के बाद अब इस मामले पर सबकी नजरें टिक गई हैं। अदालत में मंत्री की ओर से क्या जवाब दिया जाएगा और प्रस्तुत साक्ष्यों की जांच के बाद अदालत क्या फैसला सुनाएगी, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।

फिलहाल यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों दृष्टि से चर्चा का विषय बना हुआ है। यदि अदालत में आरोप साबित होते हैं, तो कानून के अनुसार मंत्री के खिलाफ सख्त कार्रवाई भी संभव है।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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